रोम से वियेना की दूरी कम नहीं है, किन्तु ट्रेन के द्वारा जाने पर करीब १२ घण्टे लगे। शाम को कोई सात बजे रोम से चले और सुबह सातआठ बजे तक वियेना पहुँच गए। जब हवा में खुनक बढ़ गई तभी से महसूस होने लगा था कि हम आस्ट्रिया की सीमा रेखा में प्रवेश कर गए हैं। रोम में बेहद गर्मी थी, लेकिन आस्ट्रिया बाकि यूरोप की भाँति थोड़ा ठंडा था, फिर भी नोर्वे की अपेक्षा ठण्ड कम ही थी। यटँड़ सुखद रही, क्यों कि यूरोपीय रेल गाड़ियाँ भारतीय गाड़ियों की तरह ठसाठस नहीं भरी होती हैं। स्टेशन पर उतर कर मैं पीटर और हनाने का इंतजार करने लगी। थोड़ी देर में देखा कि पीटर और हनाने दोनों आ रहे हैं। पीटर इंगलिश है और हनाने लेबनान की कवयित्री हैं। पीटर पिछले दो वर्षों से कृत्या पोइट्री फेस्टीवल में भाग ले रहा है। हमामे पिछले उत्सव में आईँ थीं। दोनों ने पिछले साल ही शादी की थी।
पीटर हमसे मिल कर अपने इन्स्टीट्यूट ला गया, जहाँ वह पढ़ाया करता है, और हनाने हमे ट्रेन द्वारा घर तक ले आई। नया नया शहर कागज की पुड़िया की तरह तपाक से नहीं खुल जाता है, उसे प्याज की तरह परत दर परत उतारना पड़ता है। फिर सभी यूरोपीय शहर एक नजर में करीब करीब एक से लगते हैं। हम लोग घर पहुँच कर पीटर के आने का इंतजार करने लगे। हनाने नई दुल्हन थी,इसलिए घर में कहाँ क्या है कुछ ज्यादा परिचय नहीं था। हम लोग अपना सामन टिका कर काली चाय के साथ बाते कर रहे थे।
थोड़ी देर में पीटर आ पहुँचे, उन्हें तुरन्त दूसरी जगह पढ़ाने के लिए जाना है। पीटर करीब तीन जगहों पर पढ़ाते हैं, और साथ में जर्मन से अंग्रेजी में अनुवाद भी करते हैं। पीटर की विशेषता साउण्ड पोइट्री है, पहली नजर में यह कवि खिलन्दड़ी कविता करता सा लगेगा। अजीब अजीब सी आवाजों को कविता का नाम देता हुआ, लेकिन वियेना में आने के बाद मालूम हुआ कि पीटर कविता के लिए कितना समर्पित है, वे महिने में दो बार काफी हाउस में कविता का आयोजन करते हैं, और एक दो बार कविता लेखन की कार्यशाला भी चलाते हैं। कविता के साथ जितने भी प्रयोग संभव हैं, पीटर उन्हें करना चाहते है। हालांकि वे गंभीर कविताभी करते हैं, लेकिन साउण्ड कविता को छोड़ना नहीं चाहते।
थोड़ी देर में पीटर आए तो उन्होंने मेरे रहने के लिए कमरा खाली किया, पिछले दिनों वे एक बड़े अनुवाद कार्य में व्यस्त थे, अतः किसी और कार्य के लिए वक्त नहीं निकाल पाए थे। मै थोड़ा शर्मिन्दा सा महसूस कर रही हूँ कि मेरे आने से पीटर को समस्या हो गई होगी। लेकिन हनाने कहती हैं कि समस्या तुम्हारे कारण नहीं बल्कि सत्यपाल सहगल के कारण है। रोम आदि अन्य स्थानों पर सहगल के लिए अलग जगह पर रहने का इंतजाम हो गया था, लेकिन यहाँ पीटर व्यस्तता के चलते कोई इंतजाम नहीं कर पाया। हनाने अपने घर में किसी अजनबी की उपस्थिति सहन नहीं कर पा रही थी, विशेषरूप से इसलिए भी कि सहगल ठेठ भारतीय अतिथि के समान कुछ अधिक डिमाण्डिंग थे, दूसरे की सुविधा असुविधा का खयाल नहीं रख पा रहे थे। खैर पीटर ने सहगल का सामान डाइनिंग रूम में टिकाया और सोने के लिए ड्राइंग रूम का काउच में रहने को कहा। मेरा कमरा छोटाथा, लेकिन अच्छा था। सहगल तुरन्त बाथरूम गए, और बाथ टब में अपने कपड़े धो कर पानी टपकाते हुए कमरे में ले आए और पीटर से कपड़े फैलाने के लिए कहने लगे। पीटर यूरोपीय मनोवृत्ति वाला है जो अपने मनोभावों को छिपा सकता है लेकिन हनाने जरा बहुत एशियाई मनोवृत्ति वाली हैं , अपने भावों को छिपा नहीं सकतीं। यही नहीं वे एक सफल टी वी स्टार और विश्व प्रसिद्ध कवि हैं, इसलिए उनके लिए आम स्त्रियों के समान घर गृहस्थी को संभालना दुष्कर था। मैं परिस्थिति को भाँप कर कहती हूँ चलिए, हम लोग दुपहर का खाना बाहर खाते हैं, और सब अपना अपना पैसा देंगे। एक अन्य कवियित्री अवलीन, जिन्होंने कृत्या के उत्सव में भाग लिया था, वे भी हमसे मिलने आने वाली हैं।
हम सब बाहर जाकर एक रैस्त्रोरेण्ट के अहाते में बैठते हैं, लेकिन तभी हवा चलने लगती है, हम उठ कर दूसरे रेस्त्रोरेण्ट में चले जाते हैं। खाना का आर्डर देते वक्त फिर समस्या आती है। जहाँ भी पैसे खर्च करने की बात आती है सहगल अजीब सा व्यवहार करने लगते हैं, उन्हे मैन्यू सेलेक्ट करने में समस्या होती है। वे चाहते हैं कि उन्हें अण्डे उबाल कर दे दिए जाएँ, संभवतः उन्होंने यूरोपीय रेस्त्रोरेण्ट्स को पंजाब का ढाबा समझ लिया होगा। वियेना का पहला स्वाद अच्छा नहीं था। मुझे पहली बार लगा कि जो कुछ भी पकाया गया था, वह मन से नहीं पकाया गया है। लेकिन जरूरी तो नहीं कि हर बार सब कुछ अच्छा ही मिले। खाने के उपरान्त हम अवलिन से मिलते हैं जो हमें खोज रही थीं। अवलिन जर्मन यहूदी कवयित्री हैं, जो अकेले रहती हैं। उन्होंने भी पंजाब में आयोजित कवितोत्सव में भाग लिया था। अवलिन के आने के बाद हम लोगों ने आइसक्रीम खाने का विचार बनाया। मैंने सुना था कि वियेना में दो चीजें मशहूर हैं, आइसक्रीम और चाकलेट। खाने के बाद मुँह का जायका बदल गया सा था। इसलिए एक आइसक्रीम पार्लर में घुस गए। जैसा सोचा था, आइसक्रीम उससे भी ज्यादा स्वादिष्ट थी। आइसक्रीम पार्लर में एक वेटर बकायदा नाक छिदाए हुए , बिन्दी लगाए हुए थी। चेहरे पर भारतीय प्रभाव दिखाई दे रहा था। हमे देखते ही उसने पूछा कि क्या हम इण्डिया से आए हैं? हमारे हाँ कहने पर बताने लगी कि वह हर साल भारत जाती है, वहाँ उसने एक गुरु भी बनाया है जिनसे योग आदि सीखती है। मैं यह अनुभव कर रही थी कि पश्चिमी देशों के अमीर यात्री नोर्वे, वियेना आदि यूरोपीय देशों की यात्रा करते हैं, लेकिन कामगार, मजदूर किस्म के लोग भारत, पाकिस्तान आदि आते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत इन देशों के मुकाबले काफी सस्ता है, और कम पैसों में ज्यादा सुविधा प्राप्त की जा सकती है़। बर्गन में होटल के जिस कमरे के लिए 90 यूरो प्रतिदिन देने थे, वैसा कमरा भारत में 500- 1000RS में आसानी से मिल जाएगा। निसन्देह यह किराया यूरोपीय मापदण्ड में काफी कम होगा।
शाम को मैं और हनाने झील के किनारे सैर के लिए निकल गए। वियेना नदियों या झीलों का शहर कहा जा सकता है। दरअसल वियेना शहर किनारे दानुबे नदी तट पर बसी संस्कृति है। वियेना नदी इस शहर की प्रमुख नदी है। नदियों के तीर पर संस्कृतियों का जमना अति प्राचीन काल से चल रहा है। कहा जाता है कि यहाँ मानववास तो काफी पुराने समय से था. लेकिन करीब दो हजार साल पहले रोम साम्राज्य ने इस स्थान पर सैनिक छावनी बनाई। इस छावनी का उद्देश्य रोमवासियों को जर्मन आदिवासियों से बचाने और रोम की सुरक्षा के तहत की गई थी। बाद में छावनी तो नष्ट हो गई, लेकिन शहर की रूपरेखा काफी कुछ सैनिक छावनी सी बनी रही। यहाँ पर हंगेरियन डच और जर्मन , सभी ने थोड़े थोड़े समय के लिए राज्य किया। ११५६ में हेनरिच ने इस इलाके की समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। पूनः अनेक राज्य परिवर्तनों के उपरान्त Habichtsburg के राजा Rudolf 1 के साथ Habsburg राज्य का आरंभ हुआ जो 1918 तक चला। वियेना की समृद्धि और वृद्धि में अनेक राजाओं का योगदान रहा, विशेष रूप से यह स्थान यूरोपीय देशों को तर्क आक्रमणों से रोकने का प्रमुख केन्द्र बना रहा। तुर्कों के आक्रमणों और ब्लेक प्लेगआदि से जूझने वाले इस प्रान्त को 1683 में तुर्कों को पूरी तरह पराजित करने का अवसर मिला, तत्पश्चात ब्लेक प्लेग बराख Baroque खड़ा किया गया, जो कि शिलपकला का अद्भूत नमूना है। इस बराख का उद्देश्य था, स्वर्ग को जमीं पर उतार लाने की कोशिश। इसके उपरान्तवियेना शहर अद्भुत खूबसूरत इमारतों से भर गया , ऐसा लगने लगा कि वस्तुतः स्वर्ग धरा पर उतर आया है।
इस शहर की सबसे बड़ी विशेषता है यहाँ की इमारतों का शिल्प कौशल, हर इमारत किसी ना किसी खास ओहदेकार द्वारा बनवाई गई है। ये उनके सार्वजनिक महत्व को साबित करने का एकसुन्दर उपाय भी है। मुझे बीकानेर की हवेलियाँ याद आती हैं, जिन्हे सेठों ने बनवाया है। संकरी गलियों में खड़ी ये हवेलियाँ अपने विदेश मेंबसने वाले स्वामी सेठों की समृद्धि का भी बखान करती हैं। यही स्थिति वियेना की रही होगी, राज्य का हर बड़ा ओहदेकार अपनी हैसियत के बखान के लिए अपनी इमारत को अधिक से अधिक सुन्दर बनवाने की कोशिश करता होगा। मैंने अधिकतर इमारतों के स्तम्भों पर देवदूतों जैसी आकृतियाँ देखी। स्वर्ग की कल्पना हर किसी के मानस में रही होगी। धीरे धीरे यह इलाका यूरोपीय संभ्रान्त लोगो के घूमने फिरने का स्थान बन गया। आज भी वियेना का प्रमूख उद्योग पर्यटन है।
झील के किनारे घूमते वक्त हनाने अपने जीवन के बारे में बात तो कर ही रही थी, साथ ही लेबनान के बारे में भी चिन्ता जाहिर कर रही थी। लेबनान राज्य वर्षों से युद्ध की विभीषिका से जूझ रहा है। राजनैतिक अस्थिरता यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है। हनाने ईसाई हैं, और बताती हैं कि लेबनान में ईसाई और मुस्लिम समाज प्रेम से जीवन बिता रहा था, लेकिन राजनैतिक घटकों ने धार्मिक भेदभाव को हवा देकर अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया। हनाने अपने देश में एक सफल टी वी स्टार रही हैं, इसलिए राजनैतिक घटनाओं से खूब वाकिफ हैं। अपने देश के बारे में बात करते हुए हनाने की आवाज में अजीब सा दर्द उभर आता है। बातों ही बातों में हनाने स्त्री कलाकारों और लेखकों की स्थापना के सम्बन्ध में भी बात करती हैं। वे बताती हैं कि उनके अपने देश में भी कुछ स्त्री कलाकार अपने पुरुष मित्रों के बलबूते पर अपने लिए खास स्थान बनाने में रुचि रखती है, जो हनाने जैसी खुद्दार औरत को पसन्द नहीं है। वे एक बेहद शाइस्ता कवि है, अपनी कविता के बलबूतेपर ही आगे आना चाहती हैं। अपना आधार स्वयं बनाना चाहती हैं। मैं सोचती हूँ कि इस तरह की स्थिति पूरे विश्व में समान ही है। भारतीय स्त्री लेखकों के सम्मुख भी यही समस्या है, यदि कोई स्त्री अपने कलाकौशल के बलबूते पर आगे बढ़ती भी है तो उसे नजर अन्दाज किया जाता है। हनाने अपने संघर्ष और अपने देश के संघर्ष के साथ इतनी आत्मीयता से जुड़ी हैं कि उनकी कविताएँ दोनों के बीच अभेद्यात्मक लकीर खींचती हैं।
वियेना में भी गर्मियों के दिनों में काफी देर तक सूरज चमकता है, रात कब हुई पता ही नहीं चलता।
हम वापिस लौटेतो करीब नौ बज गए थे, पीटर अभी तक लौटे नहीं थे। तभी पीटर का फोन आता है कि आज उनकी आखिरी क्लास है, इसलिए आज रात उन्हें छात्रों के साथ डिनर लेना पड़ेगा। हनाने के चेहरे पर लकीरे साफ दिखाई देतीं है, उसका दर्द यही है कि अभी उसकी शादी को छ महिने भी नहीं गुजरे। पहले तीन महिने उन्हे अलग रहना पड़ा, क्यों कि वीसा नहीं मिला था। और अब आई हैं तो पीटर सुबह से देर रात तक व्यस्त हैं। हनाने वियेना के लिए नईं हैं। वे यहाँ की भाषा भी सही तरीके से नहीं सीख पाई हैं, उनका अपना मित्र मंडल भी नहीं बन पाया है। यहीनहीं वे एक वक्त काफी व्यस्त भी रही थीं। इसलिए नए माहौल में बिना व्यस्तता के वे काफी अकेलापन महसूस करती होंगी।
हम लोग रात का खाना घर पर ही खाते है, ब्रेड और सलाद के साथ तरह तरह की चीज। वियेना की चीज भी बेहद स्वादिष्ट होती है।
दूसरे दिन सुबह 10 बजे तक घर में कोई हलचाल सुनाई नहीं देती, मैं वक्त पर उठ जाती हूँ, लेकिन खटपट नहीं करती। सोचती हूँ कि घर के लोगों की नीन्द ना खुल जाए। करीब ग्यारह बजे पीटर उठकर आते हैं और चाय आदि के लिए पूछते हैं। वे बताते हैं कि अवलिन हम लोगों को घुमाने के लिए ले जाएगी। थोड़ी देर में अवलिन भी आ जाती है।वियेना की रेल सेवा बेहद महत्वपूर्ण है, अन्डर लाइन रेल और सड़कों पर ट्राम आदि के कारण लोगोंको निजी वाहन की जरूरत भी नहीं पड़ती। रेल सेवा के लिए तीन दिन से लेकर एक साल तक के टिकिट वाजिब दामों में मिलते हैं। मैंने पीटर के कहने पर कल ही तीन दिन का टिकिट खरीद लिया था, लेकिन सहगल ने आनाकानी की, कहा कि वे फिर ले लेंगे। पीटर जानते हैं कि यूरोपीय देशों में यूँ तो टिकिट चेकर घूमते नहीं फिरते, लेकिन यदि पकड़े जाएँ तो कस कर जुर्माना हो सकता है। सहगल अपनी देसी बुद्धि का इस्तेमाल कर ग्यारह यूरों खर्च नहीं करना चाह रहे थे। इसलिए पीटर ने अवलिन से कहा कि यदिसहगल पैसा ना दें, तो भी वे टिकिटखरीद दें। वे दोनों आधा आधा पैसा बाँट लेंगे। सहगल कृत्या के तत्वाधान में यूरोप यात्रामें शामिल हुए थे। इस तरह के व्यवहार से कृत्या का नाम खराब हो सकता है, इसलिए जब अवलिन के कहने पर सहगल ने बहाना बनाया कि उनके फिलहाल पास पैसे नहीं हैं , वेघर जाकर दे देंगे तो मैंने उनके हिस्से के पैसे दिए और कहा कि आप घर जाकर मुझे पैसे लौटा दें। मेरे 500 यूरों खो चुके थे लेकिन इन बेगैरत आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वेकिसी ना किसी तरह पैसा बचाने और मुफ्त का माल उड़ाने की कोशिश में लगे रहे। मुझे मालूम था कि उनका यह व्यवहार पीटर और उनके साथियों के बीच चर्चा का विषय बना था, मुझे शर्म आ रही थी कि कृत्या ने किस तरह के व्यक्तित्व को सहयोग दिया। मैंने अब से निश्चय कर लिया कि भविष्य में कृत्या ठोंक बजा कर ही लोगों को सहयोग देगी।
हम लोग शहर के बीचो बीच सेन्टपीटर चर्च पहुँचे, और वहाँ से गलियों में होते हुए मोजार्ट के म्यूजियम गए। यूरोप में प्रवेश शुल्क काफी है, रोम में भी मैंने कई जगहों पर मैंने प्रवेश फीस नौ डालर दिए। यहाँ भी प्रवेश शुल्क नौ यूरो था। अवलिन ने कहा कि क्या आप म्यूसियम देखना चाहते हैं? मैंने कहा तो फिर आए किसलिए हैं? सहगल तुरन्त बोले,नहीं मुझे नहीं देखना इतना पैसा देकर.मैंने और अवलिन दोनों ने अपने अपने टिकिट खरीद लिए, और भीतर चले आए. अवलिन भूनभुना रही थी कि -- मैं अनुवाद के द्वारा ही पैसा कमाती हूँ, ये तो प्रोफेसर है फिर अपना खर्च क्यों नहीं उठा सकता?मुझे बेहद शर्म महसूस हुई... क्या सोचेंगे ये लोग भारतीयों के बारे में? दो चार लोग ही एक मुल्क को बदनाम कर सकने में समर्थ होते हैं।
मोजार्ट म्यूजियम उनके अपने घर में ही बनाया गया है। यह घर वियेना के समृद्धों के घरों के समान कई मंजिला है। टिकिट खरीदते ही हमें इयरफोन मिलता है, जिसके बटन दबा कर कमरे या कमरे में स्थित चित्र की जानकारी मिलती है। Wolfgang Amadeus Mozart छह वर्ष की उम्र में सन् 1762 में अपने पिता के साथ वियेना आए थे। उनका वियेना में आगमन म्यूजिकल वण्डर काइण्ड के रूप में जाना गया। बारह वर्ष की उम्र में वे आरफेन्ज मास का आयोजन करने में समर्थ थे। 1781 में उन्होंने वियेना में रह स्वतंन्त्र रूप से संगीत कम्पोजिशन का का्र्य शुरु कर दिया। उन्होंने करीब 300 संगीत कम्पोजिशन तैयार कर लिए। मोजार्ट के संगीत की विशेषता थी मानवीयता और स्वतंन्त्रता। मोजार्ट के म्यूजियम में उनके जीवन सम्बन्धी सभी वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है। उनके घर में कितने कमरे थे, कितने नौकर रहते थे, वे किस कमरे में अभ्यास करते थे से लेकर उनके कम्पजिशनों के बारे में रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी हमें यहाँ मिल जाती है। कोई सन्देह नहीं कि वे एक महान कलाकार थे। काफी कुछ कमाने के बावजूद भी वे जीवन के अन्त तक आकर बेहद तंगहाली की स्थिति में आ गए थे। मैं सोच रही थी रवीन्द्रनाथ ठाकुर के अलवा शायद ही कोई कलाकार होगा जिसकों हमने इतने महत्व के साथ प्रस्तुत किया हो। क्या हम अपने कलाकारों के लिए कुछ नहीं कर सकते? मन के सावलों को दबा कर हम बाहर आए। अठारहवीं सदी में वियेना यूरोपियन संगीत का केन्द्र था। Haydn, Mozart, Beethoven, Schubert, Brucker, Brahms and Strauss आदि विश्वचर्चित नाम वियेना से जुड़े हैं।
मोर्जार्ट म्यूजियम के उपरान्त हम लोग काफी हाउस में खाना खाने गए। यूरोप के काफी हाउस की अपनी अलग कहानी है, यहाँ कोईभी व्यक्ति कितने भी समय के लिए काफी हाउस में बैठ सकता है। यहाँ काफी के अतिरिक्त मिलता है जो अन्य स्थानों की अपेक्षा सस्ता और स्वादिष्ट है। काफी हाउस काफी साफ और सुसज्जित रहते हैं। मैंने काफी हाउस में वृद्धों की उपस्थिति को ज्यादा पाया। संभवतया यह उनके समय बिताने का अच्छा स्थान होगा। भारत में भी एक समय काफी हाउस साहित्यकारों के अड्डे हुआ करते थे। विष्णुप्रभाकर जी के पास काफीहाउस सम्बन्धी काफी यादें थीं। केरल में मैंने इस परम्परा को नहीं पाया। यहाँ काफीहाउस तो हैं, लेकिन वे सिर्फ भोजन प्रदान करने का काम करते हैं।
शाम को काफ्का कैफे में हमारा कविता पाठ था। कृत्या के तत्वाधान में मैंने सभी स्थानों पर कवि मित्रों के साथ कविता पाठ का आयोजन का इन्तजाम करवा लिया था। पीटर कृत्या से बेहद जुड़े हैं, इसलिए इतने व्यस्त होने के बावजूद उन्होंने कविता पाठ का आयोजन किया। मोन्जा के अतिरिक्त, जहाँ मुझे कविता पाठ के लिए विशेष रूप से आमन्त्रित किया गया था, हर जगह आयोजित कविता पाठ कृत्या के मित्रों द्वारा ही आयोजित थे।
काफ्का कैफे, काफी हाउस की तर्ज पर एक छोटा सा रैस्त्रोरेन्ट था, जिसके मालिक साहित्यिक रुचि वाले थे। अवलिन कुछ कविताओं का जर्मन में अनुवाद किया था, मैंने एक दो कविताएँ हिन्दी में पढ़ कर बाकी का अंग्रेजी में पाठ किया। छोटी जगह में भी अच्छे श्रोता थे। यह यूरोप यात्रा का अन्तिम पाठ था, इसलिए मैं काफी फ्री महसूस कर रही थी।
रात बीते हम घर लौटे तो मैं पीटर के बारे में सोच रही थी, जो कि सुबह दस बजे घर से निकल कर रात बीते लौट रहा था। दूसर दिन शनिवार था, इसलिए छुट्टी थी। पीटर ने अपने कुछ साहित्यिक मित्रों को बुलाया था। हालांकि पीटर को उस दिन भी काम पर जाना ही था। मैं हनाने के साथ बातों में लग गई तो वक्त का जायजा ही नहीं ले पाई, शाम होने पर पीटर लौटकर आए और रात के खाने के बारे में सोच विचार करने लगे। मैंने कहा कि यदि वे चाहे तो मैं कुछ भारतीय खाना बना सकती हूँ। सुनते ही पीटर खुश हो गए,मैं और पीटर पास के स्टोर में सामान खरीदने के लिए गए। नोर्वे में रोटी बनाने के अनुभव ने यह सिखा दिया था, रोटी बनाने की जगह सब्जी के साथ ब्रेड खाना अच्छा रहेगा। हमने मुर्गी, टमाटर, ब्रेड और दही खीरा खरीदा। दूध का पैकेट देख कर लगा कि खीर भी बनाई जा सकती है। घर आकर मैंने चिकन बनाने की तैयारी की और साथ ही चावल पकाने भी रख दिया। वहाँ का चावल देख कर मुझे अन्दाजा हो गया था कि जल्दी नहीं पकेगा। इसलिए चावल को दूध मेंडालने से पहले हीपकाना शुरु कर दिया। साथ ही खीरे का रायता भी बनाती रही। पीटर और हनाने घर की सफाई में लगे थे। करीब सात बजे तक हमारा काम निपट गयाऔर हम नहा धोकर तैयार हो गए। धीरे धीरे अतिथियों का आगमन शुरु हो गया। सभी अपने साथ कुछ ना कुछ पकवान लाए थे। समूहों में बातचीत का दौर शुरु हो गया तो पीटर ने सबको खाने के लिए आमन्त्रित किया। सबसे पहले इण्डियन चिकिन करि खाई गई, मैंने देखा कि किसी ने भी चिकिन के साथ रोटी नहीं ली, सभी आराम से सब्जी खा रहे थे।
खाते खाते दस तो बज गया होगा, क्यों कि कई कोर्स में खाना खाया गया। अन्त पीटर की मित्र विक्की द्वारा बनाई आइसक्रीम के साथ हुआ।
अभी हम लोगों की बातें चल रही थीं, अधिकतर लोग भारत के बारे में जानना चाहते थे। कुछ सवालो का हमारे पास जवाब था, कुछ का नहीं। मुझेलगा कि मेरा भारतीय इतिहास का ज्ञान काफी लाभप्रद साबित हुआ।
रात के करीब एक बजे अतिथियों ने विदा ली। पीटर ने सहगल का इंतजाम बाबी नाम के मित्र के घर कर दिया था, अतः वे भी विदा हो गए। हनाने ने चैन की साँस भरी।
लेकिन एक मित्र तो अभी जमे ही थे, ये पीटर के आर्कीटेक्ट मित्र ..... हैं। इस बार उन्होंने भारतीय संस्कृति, भारतीय जाति प्रथा से लेकर कामसूत्र धर्मशास्त्र आदि के विरोध पर सवाल करने शुरु कर दिए। वे जानना चाहते थे कि इतनी गहन सांस्कृतिक विरासत वाले देश में इतनी अराजकता क्यों है। मुझे उनकी बातों का जवाब देते देते सबह हो गई। इस वक्त सुबह के तीन बजे थे। मुझे फिर से भूख लगने लगी थी। .... दो बार दरवाले तक पहुँचे और फिर लौट आए। अब तो मेरे लिए सहन करना मुश्किल हो गया तो मैं कमरे में जा कर सो गई। सुबह छह बजे बुलावा आया कि वे जा रहे हैं।
निसन्देह मैं ग्यारह बजे से पहले नहीं उठ पाई। उठी तो देखा तो पीटर और हनाने सो रहे थे। मैं चुपचाप नहा धोकर तैयार हुई, तब तक पीटरबाहर आ गए थे। मैंने पीटर को कहा कि मैं बाहर जाना चाहती हूँ, मेरे पास पास तो है ही। पीटर ने मुझे काफी कुछ समझाया, लेकिन कुछ खास समझ नहीं आया। लेकिन में निकल ही पड़ी थी। कहाँ चली, कैसे चली कुछ याद नहीं, कुछ वक्त के बाद में एक बाजार जैसे स्थान पर पहुँची जहाँ पर चौराहे पर खाने की दूकाने थी, जहाँ खड़े खड़े कवाब और पीत्जा आदि खाया जा सकता था। पास ही माल जैसा शापिंग प्लेस था, जिसमें बहुमंजिला पुस्तको की दूकान और पुस्तकालय था। यहाँ कोई भी घण्टो बैठ कर पुस्तकें पढ़ सकता था। बच्चों के लिए अलग सैक्शन था, जिसकी सजावट बच्चों की रुचि के अनुरूप की गई थी। हर जगह बैठने की बड़ी अच्छी व्यवस्था की गई थी। जगहजगह पर खाने के स्टाल भी थे, जिसमें से सामान खरीद के खाने का लुफ्त भी लिया जा सकता था। सबसे बड़ी बात यह कि दूकान होते हुए भी यहाँ बेहद शान्ति थी। ये दूकान सहित पुस्तकालय कई मंजिला था। नीचे के हिस्से में जरमनी आदी भाषा की किताबें थी। स्थानीय भाषा का पुस्तकालय काफी बड़ा था। अंग्रेजी भाषा के पुस्तकालय कुछ छोटा था, लेकिन लोगों की कमी यहाँ भीनहीं थी। मैं काफी देर तक कविता की किताबें खोजतीरही, अन्त में सहायिका की मदद से एक अलमारी में कविता की करीब तीस चालीस पुस्तके मिलीं। कथा साहित्य का यहाँ भी बोल बाला था। साइंस की किताबों की भी कमी नहीं थी।
मुझे यह देख कर खुशी हुई कि इन दूकानों में बड़ी संख्या में लोगबाग किताबें पढ़ रहे थे। मैं काफी देर इस पुस्तकालय में बैठी रही, अन्ततः नीचे उतर कर सड़क के किनारे बनीदूकानो में खाने का कुछ सामान खरीदने चली गई।
वियेना की चाकलेट अच्छी मानी जाती है, इसलिए मैंने चाकलेट के कुछ पैकेट खरीदे। पास ही फलों की दूकान से स्टाबेरी भी खरीदी, लेकिनमैंने पाया कि करीब करीब आधी स्टाबेरी खराब थी।
मैं सड़क के किनारे किनारे चलती रही, तो एक ऐसे बाजार में जा पहुँची, जहाँ फैशन के कपड़े और पर्स , आभूषण आदि सामान थे। हर दूकान म्यूजियम सी सजाई हुई थी। एक चाकलेट की बड़ी सी दूकान में घुसी तो एक वृद्धा स्त्री को दूकानदार के रूप में पाया। वह महिला अंग्रेजी नहीं जानती थी, इसलिए मेरी बात नहीं समझ पा रही थी। वहाँ एक युगल भी खड़ा था। युवा ने मुझसे पूछा कि क्या वह मेरी मदद कर सकता है? , मैंने उसे बतायाकि मैं कुछ चाकलेट इण्डिया ले जाने के लिए खरीदना चाहती हूँ, इसलिए ऐसी चाकलेट खरीदने में मेरी मदद करे जो रास्तेमें पिघल ना जाए। वृद्ध महिला से कहकर तीन चार तरीके की चाकलेट पसन्द करवा दीं।
मैं घूमती फिरती कहाँ पहुँच रही थी, मुझे मालूम ही नहीं पड़ रहा था। मैंने पीटर का दिया कागजपढ़ने की कोशिश की, लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। तभी एक दूकान में ॓क सांवली सी लड़की दिखाई दी। मुझे देखते ही समझ में आ गया कि वह केरलीय है। मैंने उससे सेन्ट पीटर चर्च का पता पूछा। अवलिन के साथ में चर्च आ चुकी थी और जानती थी कि उसके करीब भूगर्भ रेलवे स्टेशन है। मैं स्टेशन में पहुँच कर सोच रही थी कि किस तरफ की ट्रेन पकड़नी चाहिए कि पीटर का फोन आया कि वह और हनाने आ रहे हैं, मैं उन्हे सेन्ट पीटर चर्च के पास मिलूँ।
सेन्ट पीटर चर्च और सेन्ट स्टीफन केथेड्रल शहर केन्द्र में हैं। सेन्ट पीटर चर्च मीटर ऊँचा यह चर्च न केवल आस्था का केन्द्र है बल्कि पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र भी हैं। चर्च की दीवारों का कुछ हिस्सा काफी पुराना सा लगता है तो वहीं कुछ हिस्सा काफी नया है। रोम में रोबर्टो ने एक बात बताई थी कि अधिकतर चर्चों में प्राचीन रोमन मन्दिरों के भग्नावेश हैं। युद्ध में धर्म की अहम भूमिका को इतिहास कब नकारता है? इस चर्च में Emperor Frederik- III समाधि भी है। चर्च का हिस्सा हिस्सा उत्तम कलाकारी से अलंकृत है। पीटर बताते हैं कि इन चर्चों का सबसे खूबसूरत हिस्सा छत पर की गई कलकारी होती है, क्यों कि छत को स्वर्ग की कल्पना क अनुरूप बेहद सुन्दर बनाने की कोशिश की जाती है। सेन्ट स्टीफन केथेड्रल का निर्माण 1137-1147 में गया था, लेकिन आग और युद्ध से इस चर्च को कई बार हानी पहुँची। यह शिल्प का खूबसूरत नमूना है। ऐसे लगता है कि मोमबत्तियाँ नीचे की ओर नहीं बल्कि ऊपर की ओर पिघल रही हैं। यही चौराहे पर बग्घियाँ चलती हैं, जिनमें यात्रा करने के लिए काफी पैसा देना पड़ता है।
चर्च के बाहर बड़ा सा चौगान है, जिसमें लघु प्रदर्शिनियाँ लगाई जाती हैं, करतब दिखाए जाते हैं। और एक बात जो मैंने रोम और वियेना दोनों जगह देखी थी, वह थी कि कुछ लोग पैसा कमाने के लिए ग्रीक मूर्ति या किसी रोमन योद्धा का मेकअप कर अपने को पूरी तरह से कपड़ों से ढ़ँक के मूर्ति से बने खड़े रहते हैं, यह भीख माँगने का कलात्मक तरीका है। लोग उनके साथ फोटो खिंचवाना चाहते हैं और एक दो यूरों दे देते हैं। मैंने उन्हे रोम में कड़ी धूप में सिर से पाँव तक ढँके, स्टेचू से खड़े देखा तो मन भर आया। गरीबी आदमी को क्या नहीं करने को सिखाती। यूरोप में भी भीखारी दिखाई दिए, अन्तर बस इतना कि वे अपने देश के भीखारियों जैसे फटेहाल नहीं दिखते। नोर्वे में , रोम में और वियेना में सभी जगह दिखाई दिए भिखारियों के बारे में कहा गया कि वे रोमानिया से आते हैं, बस भीख माँगने के लिए। वे सब अच्छे कपड़े पहने होते हैं और देखने में भले चंगे लगते हैं।
मुझे मोन्जा का किस्सा याद आया कि जब मुझे थियेटर जाना था तो मैंने एक दो लोगों से रास्ता पूछने की कोशिश की, लेकिन अंग्रेजी ना जानने के कारण अधिकतर लोगों ने रास्ता बताने में असमर्थता दिखाई। मैंने एक उपाय सोचा कि कार्यक्रम के कार्ड को हाथ में लेकर इशारे से पता पूछा। कार्ड इतालवी में भी था। एक दो बार तो लोगों ने कुछ सहायता भी की। लेकिन एक बार कार्ड देखते ही मुझे आगे बढ़ने को कह दिया.. मुझे हँसी आ गई। मैं समझ गई थी कि उस व्यक्ति ने मुझे माँगने वाला समझा होगा।
थोड़ी देर में हनाने और पीटर आ गए। पीटर को मालूम था कि पिछले दो दिनों से मैं कुछ घूम नहीं पाई हूँ, इसलिए आते ही वियेना की इमारतों का इतिहास बताने लगे। यहाँ भी यही समस्या थी, मैं कुछ हजम नहीं कर पा रही थी। मुजे एक से बढ़ कर एक भव्य इमारते दिखाई दे रहीं थीं। सभी आकर्षक थी। मेरा कैमरा रोम में ही खराब हो गया था, इसलिए फोटो भी नहीं ले पा रही थी। यह साइंस म्यूजियम है, इसके तुरन्त सामने आर्ट्स म्यूजियम है। ofburg Museum के भीतर अनेक म्यूजियम हैं। - Art History Musium, Natural History Musium, Musium of modern art, Leopold Musium, hildern Musium, Tobocco Musium, Dance Centre. पीटर बता रहे हैं - यह Danubius Fountain, यह औपरा हाउस है, और यह पुराने मन्दिर का भग्नावेश है। हम लोग पहले यहाँ कविता की बैठक किया करते थे। मुझे याद आया कि रोम में रोबर्टों ने भी यही बताया कि वे केलोसियम के अहाते में नदी के तीर पर कविता की बैठक लगाया करते थे। मुझे कविता पाठ का यह तरीका बेहद अच्छा लगा। तभी हनाने ने याद दिलाया कि शाम हो रही है, और पीटर ने आज की रात कविता रचना की बैठक बुलवाई थी। वे लोग हर महिने किसी के घर मिलते हैं और किसी विषय पर कविता लिखते हैं। मैंने पीटर को कहा कि अच्छा होगा कि मैं पर्यटक विभाग का कोई टूर ले लूँ, जिससे थोड़ा बहुत वियेना देख लूँ। हालाँकि यह काफी महंगा पड़ेगा, लेकिन फिर भी सरल तरीका है। मैंने चर्च के सामने ही पर्यटन विभाग का आफिस देखा था, लेकिन भाषा की समस्या के चलते मैंने बुक नहीं कया। पीटर ने मेरे लिए ३५ यूरो का दो घण्टे वाला टूर बुक करवा दिया।
हम लोग जल्दी से ट्रेन पकड़ कर घर लौटे। आज रात की तैयारी कोई खास नहीं थी। पीटर ने ब्रेड निकाली और लकड़ी के पटे काट काट कर सजाईं, साथ में टमाटर , शिमला मिर्च और कुछ फल सजा दिए। मैंने देखा कि यहाँ पर खाने को पकाने की जगह सजाने पर अधिक जोर दिया जाता है। सजावट में रंग और बनावट दोनों का ख्याल रखा जाता है। भारत में यदि दस लोगों का खाना करना हो तो पूरी दुपहरी कढ़ाई में मसाला भूनते ही बीत जाती है। शीघ्र ही लोगों का आना शुरु हो गया। आज कविता रचना का विषय इण्डिया था। सबसे पहले उन्होंने कम्पूटर पर बाबी के खींचे चित्रों को दिखाया। ये चित्र पीटर के मित्र बाबी ने अट्ठारह बरस की उम्र में खींचे थे। इस वक्त बाबी बेहद स्थूलकाय हो गया है, ज्यादातर वक्त वह सोता या खाता रहता है। मुझे लगा कि समृद्धि भी कई बीमारियों को जन्म देती है। जैसा कि प्राय होता है, इन चित्रों में भीखारी, साधु, गरीबी रेखांकित किए गए थे। यह उस इण्डिया की कहानी दिखाता है जो ज्यादातर पब्लिक स्थानों पर दिखाई देता है। विदेशी कैमरों को इसी में आनन्द मिलता है। इसके बाद पीटर के द्वारा खिंचे गए चित्र दिखाए गए। इनमें विषय करीब वे ही थे, लेकिन कलात्मकता अधिक थी। मैं जानती हूँ कि सड़कों पर लगे कचरे के ढेर यह समझने का मौका भी नहीं देते कि भारत में दुनिया में पढ़े लिखे समजडार लोग भी रहते हैं। अवलिन पिछले कृत्या उत्सव में पंजाब आई थीं तो वहीं से राजस्थान के दौरे पर गई थी। हमारे यहाँ पर्यटन स्थानों पर भिखारियों भीर उमड़ती रहती है। इससे वे हमेशा ये ही कहती रही कि .. भारत में बेहद गरीबी है, लोगों को सौ यूरों तक महिने में नहीं मिलता है आदि आदि..
इसके बाद किसी बंगल डायरेक्टर द्वारा बनाई गई आर्ट फिल्म बनाई जो कोलकत्ता की जिन्दगी बयान करती है। मुझ से फिलम के हर दृश्य को समझाने के लिए कहा गया। मैंने चाट, पानी पूरी से लेकर काली पूजा तक का अर्थ समझाया और कहा कि यह भारत की संस्कृति की छोटी सी झलक है।
अवलिन लगातार इण्दिया की जनसंख्या के बारे में कमेण्ट दे रही थी, मेरे लिए बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया तो मैंने पूछा-- तो क्या करना चाहिए, सभी को मार देना चाहिए? जन संख्या तानाशाही द्वारा खत्म तो नहीं होती। हम चीन की तरह तानाशाही हुक्म नहीं दे सकते थे। दुनिया का सबसे बड़ा लोक तन्त्र है भारत में। मैं जानती हूँ कि हमारे यहाँ जो मुसीबते हैं, उनकी जड़ों में जनसंख्या का प्रभाव है, हम देख रहे हैं कि भारत के मध्यमवर्गीय घरों में दो या तीन से ज्यादा किसी के बच्चे नहीं हैं, फिर भी जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, हो सकता है यह हमारे पारीवारिक संघटना के कारण है, क्यों कि भारत में विवाह, और परिवार को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। फिर हमारे यहाँ एक तबका है जिसे हम मध्यम वर्गीय कहते हैं. चिंतकों ने उसे नकारा है लेकिन उसी वर्ग ने दुनिया सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, इंजीनियर , डाक्टर आदि दिए हैं। हमारे यहाँ का बबच्चा आधी जिन्दगी यूँ ही नहीं भटकता फिरता, माता पिता उसकी उंगली तब तक थामते हैं, जब तक वह उरान ना भरना सीख ले। वही बच्चा माता पिता की देख रेख कर यह कर्ज भी चुकता देता है। कुछ लोगों को विशेष रूप से अवलिन को यह बात समझ में नहीं आ रही थी। एक कारण यह भी हो सकता है कि हमारे प्रफेसर महोदय सत्यपाल सहगल जी पैसा खर्च करने में जिस तरह की मक्कारी दिखा रहे थे उससे अवलिन की धारण यही थी कि बेचारे भारतीय... इन्हें इतना मिलता ही कहाँ है कि पैसा खर्व कर सकें। उसने बहस करनी शुरु कर दी कि राजस्थान यात्रा में उसके ड्राइवर को बहुत कम पैसा मिलता था आदि आदी। मैंने उन्हे बताया कि पैसा कम है तो यूरोप के मुकाबले में सस्ताई भी है। आप के यहाँ पाँच यूरो में चाय मिलती है, हमारे यहाँ तीन रुपये में चाय मिल जाती है जो एक यूरों बींसवा हिस्सा है।
अब उन लोगों ने अपनी कविताएं जो इण्डिया विषय पर लिखी गई थीं, पढ़नी शुरु की।.. कविताएँ काफी सपाट बयानी सी लगीं। मैंने कहा कि हम भारतीय कविता में जिन्दगी का पेंच लाते हैं, स्थिति को बयान करने के लिए शब्दों मे रस लाते हैं। मैंने कुछ कविताएँ पढ़ कर सुनाईं, और भारतीय कविता में भावों के महत्व की बात बताई। मुझे जरा बहुत सन्तोष हुआ कि मैं अपने देश के लिए बोल पाई, स्लम डाग मिलिनियर की बात हर जगह हुई, मेरा यही कहना था कि स्लम हर जगह नहीं हैं। केरल में शायद ही कोई स्लम होगा, फिर इस सिनेमा का उज्जवल पक्ष यह है कि यह जिन्दगी की किताब से पढ़ने को कहता है, कागजी विद्या से ज्यादा महत्वपूर्ण जिन्दगी की सिलेट पर लिखा ज्ञान होता है।
आज फिर रात के बारह एक बज गए। मैं सुबह का अलार्म लगा कर सोने चली गई, मुझे सुबह नौ बजे पर्यटन बस पकड़नी थी। पीटर ने मुझे बता दिया था कि जैसे ही मैं तैयर हूँ उसे आवाज दे दूँ, वह मुझे पिक अप स्थान आएगा।मैं सुबह यथा समय तैयार हो कर निकल गई। हमे छोटी गाड़ियों से पिक अप कर के बड़ी बस के पास ले जाया गया, जहाँ पर अंग्रेजी और जर्मनी के लिए अलग अलग बस थी। मेंने देखा कि अधिकतर यात्री जापानी, या यूरोपीय थे, शायद मैं ही अकेली एशियायी यात्री थी। गाइड सामान्य गाइडों जैसी स्मार्ट थी, और बीच में बीच में हँसा भी रही थी। इस टूर में ज्यादातर जानकारी रिंग रोड का चक्कर लगा कर ही दी जानी थी, हमे केवल Schonbrunn Palace दिखाया जाना था, बाकि स्थानों के बाहर से दर्शन भर होने थे।
गाइड वियेना की कहानी सुना रही थी, कैसे रोमन सम्राटों ने इस स्थान को चुना और कैसे यूरोप के रईस रजवाड़ों ने इस जगह को अपनी शान शौकत दिखाने का स्थान बनाया। ससैनिक छावनी के रूप में बसा यह शहर अनायास ही दुनिया का सबसे दौलतमन्द और खूबसूरत देश शहर बन गया। हर इमारत एक कहानी कहती है, और हर कहानी में खूबसूरती है। चाहे वह ओपेरा हाउस हो या Mucical Clock, चाहे Baroque Holy Trinity Memorial यानी कि काले प्लेग की याद में बनाया गया खूबसूरत बराख हो या फिर रईसी की शान Grabenhof हो। Hofburg राजकीय इमारतों के अद्भूत सौन्दर्य को याद तक रख पाना आसान नहीं है। यहीं पर विश्वप्रसिद्ध स्पेनिश अश्य संचालन ( riding School) जिसमें अश्वों को संचालित करते देखना अद्भुत एवं रोमांचक होता है। मारिया टेरेसा का चौराहे पर बनी सुन्दर मूर्ति अपने शिल्प के कारण ध्यान आकर्षित करती है। हमारा असली पड़ाव महारानी मारिया के राजभवन का अवलोकन करना था। यह महल बेहद विशाल और खूबसूरत था़,मारिया महारानी के सोलह बच्चों की कहानी कहने वाले चित्र भी थे। यह भिजनालय था, यह शयनागृह...
सामान्यतया जब हम राजमहलो में जाते हैं तो उन्हीं चीजों को देखते हैं तो भव्यता की कथा कहती हों। मुझे याद आया कि जब कृत्या फेस्टीवल का आयोजन केरल में किया गया था तो मैं उन्हे केरल के पमहा कवि आशान के जन्म स्थान पर ले गई। आशान भारतीय परिवेश में खाते पीते घर के थे, लेकिन केरलीय परिवेश सादगी को पसन्द करता है, पुराने घर नारियल के पत्तों से छाये होते थे। लोगों का खानपीन और पहनावा भी बेहद सहज हुआ करता था। इसलिए यूरोपीय कवियों को यह भ्रम हुआ कि आशान बेहद गरीब रहे होंगे क्योंकि उनके जीवन में प्रकृति के प्रति निकटता थी, वैभव का प्रदर्शन नहीं।
मारिया एक शक्तिशाली स्रामाज्ञी थीं, जिन्होंने सोलह बच्चों के होने के बावजूद राज्य के लिए काफी काम किया। वियेना में वैभव लाने में भी उनकी विशेष भूमिका रही। लेकिन गाइड मजाकिया लहजे मे अपनी बात प्रस्तुत कर रही थी, जिससे यूरोप उस तबके की जानकारी मिल रही थी जो वैभव से काफी दूर रहे हैं।
टूर ौपरा हाउस के करीब खत्म हो गया। पीटर वहाँ इंताजार कर रहे थे़ वे मुझे लेकर म्यूजियम छोड़ गए। और हनाने को लेने चले गए। मैं म्यूजियम का टिकट लेकर भीतर गई तो वहीं अटक कर रह गई, कला और पैंन्टिंग का इतना बड़ा खजाना मैंने कहीं नहीं देखा। यूरोपीय कला के बारे जानकारी पाने का मुझे कभी मौका नहीं मिला था, मैं तो एक एक पेन्टिंग में ही अटक कर रह जाती। पूरा इतिहास शृंखला को बड़ी बारीकी से समझया गया था। दो कमरे देखते ही म्यूजियम बन्द होने का वक्त हो गया। मुझे लगा कि मुझे सुबह से यहाँ होना चाहिए़। खेर यह मेरा आखिरी दिन था, दूसरे दिन सुबह पाँच बजे मेरी फ्लाइट थी।
हनाने और हमे रात को विक्की के घर खाने पर बुलाया गया था। विक्की कलाकार और कवि है, अकेली रहती है और अनेक बिल्लियाँ पाली हुई हैं। हम उसके गर जाते है, मैं बेहद थक गई हूँ....हम खाना खाते बाते करते हैं, और रात को एक बजे लौटते हैं। पीटर को अनायास याद आता है कि उसे कुछ अनुवाद पूरे करने थे। मैं उससे कहती हूँ कि वे मेरी चिन्ता ना करे, मेरे लिए टैक्सी मंगवा दे, मैं अकेली चली जाऊँगी। टैक्सी महँगी है, वे कहते हैं, पर मैं पीटर को परेशान नहीं करना चाहती हूँ।
मैं जल्दी जल्दी सामान बाँधती हूँ, और स्नान भी कर लेती हूँ कि सुबह समय ना मिले तो भी कपड़े बदल कर जाया जा सकता है। करीब तीन बजे सो पाती हूँ, पीटर और हनाने जगे हैं। सुबह चार बजे के अलार्म से उठती हुँ तो देखती हूँ कि हनाने रसोई में काफी बना रही थीं, और पीटर सोफ में उँग रहे थे। मैं तैयार होकर बाहर आती हुँ, कि टेक्सी आ जाती है..
विदा हनाने, धन्यवाद पीटर।कृत्या के इन मित्रों के कारण मेरी यूरोप यात्रा सम्पूर्ण हुई
आमीन!
2009/09/21
2009/08/08
रोम बस रोम है
इतिहास रोमन संस्कृति के बारे में जिस तरह से चीख चीख कर कहता है, रोम अनजाने में हमारे मन में प्रवेश कर जाता है। मेरे मन में यदि किसी जगह को देखने की इच्छा थी तो वह जगह थी रोम। मोन्जा तक की यात्रा काफी अच्छी रही, इसलिए रोम के प्रति उत्सुकता बढ़ती गई। मोन्जा से रोम की यात्रा हमने रेल से की। यूरोपीय रेले, बड़ी सुखद होती हैं, मेरे सामने एक महिला अपने किशोर बेटे के साथ बैठी थी, मेरी बगल वाली सीट में उनकी कोई प्रोढ़ा मित्र बैठी थी। किशोर बड़ा नटखट और बातूनी था, माँ बेटे जिस तरह से हँसी मजाक कर रहे थे, मन प्रफ्फुलित हो उठा, महिला को अंग्रेजी नहीं आती थी, लेकिन किसोर स्कूल में अंग्रेजी सीख रहा था, इसलिए वह दुभाषिया बना था। सारे रास्ते माँ बेटे बतियाते हँसते दिखाई दिए। मुझे अपने देश की याद आ गई, उन लोगों को देख कर कुछ ऐसा ही लग रहा था कि अपने देश के ही लोग हैं।
पूरा रास्ता हँसते हँसते पार हो गया, रोम आया तो पता ही नहीं चला। रोम में उतर कर मैं रोबर्टों का इंतजार करने लगी। थोड़ी देर में रोबर्टों आते दखाई दिए, रोबर्टौ करीब चौहत्तर बरस के हैं, लेकिन बेहद चुस्त दुरस्त लगते हैं। वे मुजे ापने घर ले गए। उनकी पत्नी पोला समाज सेविका और समाजशास्त्री हैं। उम्र उनकी भी कम नहीं होगी लेकिन जिस तरह से वे तैयार थीं, मुझे काम्लेक्स होने लगा। वे पूरे मेकअप, और बेहद फैसनेबिल कपड़ों में थी। मेरे घर आते ही उन्होंने मुझे मेरा कमरा दिखाया और खाना परस दिया। रोम में खाने का तरीका काफी अलग है़ यहाँ कई कोर्स में खाना परसा जाता है। एक के ऊपर एक तश्तरी रखी हुई थी। एक कोरस खत्म होते ही उस तश्तरी को हटा दिया जाता और दूसरे कोर्स के लिए नई तश्तरी में परोस लिया जाता है। पहले सूप, फिर सलाद , फिर पात्जा.. ।
मेरी तबियत अभी तक पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी। खाना काफी भारी हो गया। खाने के बाद रोबर्टों ने कहा कि कमरे मं आराम कर लो, कुछ देर बाद हम घूमने जाएँगे। मैं कमरे में जाते ही सो गई, शाम को उठी तो हम घूमने चल दिए थे।
रोबर्टों ने अपनी जीवन यात्रा गाइड के रूप में शुरु की थी, इसलिए वे जैसे ही सड़क पर पहुँचते कुछ ना कुछ बताने लगते। रोबर्टों के पास बताने को काफी कुछ था भी , ना जाने कितनी पीढ़ियों से वे त्रस्तेवर में रह रहे थे। शिशु जनम के साथ ना जाने कितनी जानी अनजानी स्मृतियों को लेकर आता है, बीज बनने की गाथा स्मृतियों के संघटित होने की गाथा भी तो है। जिस बिल्डिंग में वे रहते हैं वे सौ बरस से ज्यादा पुरानी है, उनके फ्लैट में सामान है वह सदियों से संकलित किया गया है, भव्य पैन्टिंग्स, क्राकरी फर्नीचर, सभी बेहद पुराने और अपने भीतर कोई ना कोई कहानी लिए हुए। रोबर्टो ने एक ऐसी पैन्टिग दिखाई जो थोड़ी अधूरी थी, लेकिन वक्त के अपउनके पिता ने किसी बड़े पकाकाल द्वारा बनाई गई थी, आज मैं लिखते वक्त उस कलाकार का नाम तो भूल रही हूँ, लेकिन पैंन्टिंग का अधूरापन मन में अभी टंगा है। त्रस्तेवर रोम की प्रमुख सड़क है, जिसमें भव्य इमारते हैं, जो काफी पुरानी हैं। आश्चर्य की बात यह है कि कोई भी इमारत पुरानी सी नहीं लगती। तेवरे ( Teverre rivers ) उस नदी का नाम है, जिसके किनारे रोम बसा है, इसलिए नदी पार बस्ती को त्रस्तेवरे कहा गया है। रोबर्टो यहूदी हैं, इसलिए उनकी कथा यात्रा अनजाने यहूदी समाज के आसपास घूमती है। वे बताते हैं कि इसी जर्मन यहूदियों की तलाश में उनके घर तक पहुँचे थे। उस वक्त उनके माता पिता और अन्य कुछ रिश्तेदार घर छोड़ के अलग अलग जगहों में पनाह ले रहे थे। घर को बूढ़ी बीमार दादी और उनकी एक बहन जो कि उनके परवार की एकमात्र ईसाई धर्म मानने वाली सदस्या थीं, के भरोसे छोड़ गए। लोगों का विचार था कि जर्मन बूढ़ों को परेशान नहीं करेंगे। लेकिन उन की क्रूरता की सीमा की कोई रेखा नहीं थी, उनकी इमारत तक पहुँचने वाले थे , कि उनके नीचे की मंजिल में रहने वाली एक महिला ने चतुराई से बूढ़ी दादी को लिफ्ट से पलंग सहित अपनी बिल्डिंग में ले गई। किसी ने सोचा भी नहीं था कि ईसाई धर्म मानने वाली वृद्ध महिला को किसी तरह का खतरा हो सकता है, लेकिन जर्मन सैनिक किसी तरह की छूट देने वाले नहीं थे। रोबर्टों की आण्टी को जेल में डाल दिया गया, बाद में त्रस्तेवरे के चर्च के पोप के द्वारा दखल देने पर छोड़ा गया। इस बीच पाँच वर्षीय रोबर्टौ अपनी माँ के साथ किसी चर्च में पनाह लिए हुए थे, और पिता कहीं और छिपे थे। चर्च के द्वारा यहूदियों को पनाह देने के पीछे कारण यह था कि तत्कालीन पोप को आरंभ में तो हिटलर पर भरोसा था कि वह कम्युनिस्टों के खिलाफ चर्च का साथ देगा, लेकिन ने पोप को भी ज्यादा भाव नहीं दिया तो पोप ने चर्चों को यहूदियों की चोरी छिपे सहायता करने का गुप्त आदेश दे दिया। इसी कारण रोबर्टो के परिवार जैसे कई यहूदी परिवार ईसाई नाम से चर्च तहखाने में रहने लगे।
रोबर्टो बता रहे थे कि उस उम्र में उनके लिए सबसे मुश्किल काम था, अपने नाम को याद रखना, क्यों कि उन्हे दो नाम बताए गए थे़, एक उनके जन्म का नाम जो माता पिता ने दिया था, दूसरा ईसाई नाम जो चर्च ने दिया। रोबर्टौं अपनी माँ के साथ उसी चर्च में करीब एक साल तक रहे। उन्हे ईसाई नाम दे दिया गया था, और ईसाई प्रार्थनाएँ भी सीखाई गई थी, लेकिन उनका अधिकतर वक्त चर्च के तहखाने में चुपचाप बैठे हुए बीतता था।
"तुम सोच सकती हो कि एक बच्चे को खेलने की मनाही हो, उसे दो दो नाम याद रखने हो तो कैसा लगता होगा। " रोबर्टों की आवाज में अभी तक दर्द था।
नाम याद रखना कितना कठिन है
उसने समझ लिया था
पाँच बरस की उम्र में ही
वह भी जब कि
नाम एक से ज्यादा हों,
और यह जानना भी जरुरी हो कि
पूछने वाला कौन है
नाम से भी ज्यादा मुश्किल था,
प्रार्थनाएँ रटना
मन को यह समझाते हुए कि
यह उसकी अपनी नहीं है
प्रार्थना बहुत सी हों,
कोई फरक नहीं पड़ता
जरूरी है कि
वह नाम की तरह किसी दूसरे से
उधार ना ली गई हों
चलने से पहले मैंने अपने पर्स में एक फोल्डर रखा जिस में पाँच सौ यूरों का नोट औरपासपोर्ट और स वीसा भी था़ हालाँकि चलने से पहले मेरे मन में एक विचार आया कि इतने पैसे एक साथ रखने चाहिए कि नहीं, पर मेरे पास खुल्ले यूरो नहीं थे, और मैंने सोचा कि नोट खुला लूंगी। रोबर्टों हमें ट्राम से ले गए। वे लगातार कुछ ना कुछ दिखाते बताते जा रहे थे, अतः मेरा ध्यान उनकी बात में लगा था। रोबर्टौ रोम दिखाने के लिए बड़े उत्साहित थे, लेकिन अभी हम सेन्टर में खड़े ही थे कि मुझे लगा कि मेरा बैग कुछ हल्का सा है। मैंने देखा तो बैग की जिप खुली थी, और फोल्डर गायब... कुछ पल के लिए सुन्न रह गई, पैसे गए तोो अलग बात है, लेकिन यहाँ तो वीसा पासपोर्ट ही गायब है। रोबर्टों ने कहा कि हो सकता है कि घर में भूल आई हो , मुझे मालूम था कि मैंने फोल्डर साथ रखा था, लेकिन घर आना ही पड़ा, लेकिन कुछ नहीं, फिर तो रोम की इमारते देखने की जगह हम पुलिस डिपार्टमेन्ट के चक्कर लगाने लगे। रोबर्टो के सा्थ होने के कारण भाषा की समस्या नहीं थी, लेकिन मैं मन में बेहद अजीब सी शर्म महसूस कर रही थी कि इस उम्र में रोबर्टौं को परेशान कर रही हूँ। दूसरे दिन शाम तक हमे पास पोर्ट तो नया मिल गया. लेकिन वीसा बनने की समस्या बरकरार थी। लेकिन इस बीच काफी कबायत हो चुकी थी। पासपोर्ट बनने के बाद हम पासपोर्ट आफिस की गली से लगी दूसरी सड़क में खाना खाने आए तो रोबर्टों ने थर्राने वाली बात बताई।
रोबर्टौ बताने लगे कि यह VIA RASELLA है जहाँ यहूदियों के कत्ले आम की नींव रखी गई थी। जर्मन सेना इस गली से मार्च कर रही थी, किसी बच्चे ने शैतानी में किसी बिल्डिंग के पास एक पटाखा रख दिया। जर्मनों के दोचार
सिपाही जख्मी हो गए, बस फिर क्या था, उन्हे उस गली में रहने वाले करीब 300 यहूदियों को चुन चुन कर मार दिया। ंगे
मैं रोबर्टों की बात सुन रही थी, रोम का इतिहास खून से रंगा है, जितनी लड़ाइयाँ , जितने युद्ध यहाँ हुए हैं, उतने संभवतः ही किसी और देश हुए होंगे, लेकिन आश्चर्य यह देख कर होता है युद्ध और क्रूरता के मध्य कला किस तरह से महत्वपूर्ण स्थान बना पाई। इस शहर के चप्पे चप्पे में कलात्मक वैभव देखते ही बनता है। हर नुक्कड़ पर एक फौव्वारा, हर गली में इतिहास की खिड़की, शहर नहीं मानों एक बड़ा अजूबा म म्यूजियम हो।
शाम को कविता पाठ था, जिसका ईंतजाम रीटा और एंजिलो ने एक लाइब्रेरी में करवाया था, जहाँ पर भारतीय कैफे था, और संस्कृत पढ़ाई जाती थी। यूरोप वासी आज भी पुरातन इतिहास और संस्कृति में रुचि लेते हैं। शाम को हम लोग लाइब्रेरी पहुँच गए। छह बज चुके थे, लेकिन Professor Filippo Bettini, जो कि Allegorein नामक एसोशियेसन के प्रमुख थे और Mediterranea नामक महत्वपूर्ण पोइट्री फेस्टीवल चलाते हैं, अभी तक नहीं पहुँचे थे। मुझे असमंजस में पड़ा देख कर रोबर्टों बोले- हम लोग इतालवी हैं, अंग्रेज नहीं। हमारे यहाँ छह बजे का मतलब साड़े छह या फिर सात बजे होता है।
मुझे हँसी आ गई, तो फिर यह समय की पाबन्दी की बीमारी मात्र अंग्रेजों की है, बाकि सब लोग तो पूरे मनुष्य हैं, मन का कहना मानने वाले।
मेसीमों भी रोम आने वाला था, मेसिमों ने मेरे द्वारा किए गए अथर्ववेद की प्रेम कविताओं के अनुवादों का इतालवी में अनुवाद किया था। रीटा भी इतालवी कवयित्री है।
इस तरह के कार्यक्रमों मे पहुँच कर मैं अक्सर घड़ी की ओर देखना बन्द कर देती हूँ। समय को अपने ऊपर से गुजर जाने देती हूँ। समय एक ही हम उसकझरना होता है, अक्सर हम धारा के विरुद्ध तैरने की कोशिश करते है, यदि ईहम अपने को उस प्रवाह के साथ छोड़ दें दो समय हम पर हावी नहीं होता।
यहाँ पर भी कविताएँ अनुवाद के साथ पढ़ी गईं, सहगल जी को प्रस्तुति का पहला पूरा मौका मिला था। कविताओं के अनुवाद रोबर्टों ने किए, करीब आधे घण्टे तक मेरी कविताओं का पाठ चला, उसके बाद मैंसिमो और मैंने अथर्ववेद की प्रेम कविताओं का पाठ किया। फिर सहगल की कविताओं का पाठ हुआ, सहगल की छह कविताएँ का अनुवाद किया गया था।
दो घण्टे के इस कार्यक्रम को अच्छी तरह से निभाया गया। अनुवाद पाठ भी बेहद अच्छा था। सहगल का यह पहला कार्यक्रम था, और यह मौका उन्हे कृत्या के माध्यम से मिला था, वे रोबर्टौ आदि किसी को नहीं जानते थे। लेकिन उन्होंने केवल रोबर्टों को धन्यवाद दिया, कृत्या का नाम तक नहीं लिया। वे कृत्या के सान्निध्य में रीटा और एंजिलो के घर टिकाए गए थे, लेकिन उनके धन्यवाद भाषण में रीटा का नाम तक नहीं था। मुझे बुरा तो लगना ही था, सहगल चा। मैंने इतना नाशुक्रा आदमी देखा नही था। मैंने ही अन्ततः सहगल को कृत्या के माध्यम से कविता पाठ के लिए धन्यवाद दिया।
रात को हमे भारतीय खाना खिलाया गया, लेकिन जो परोसा गया। खाना बंगलादेशियों द्वारा बनाया गया था, स्वाद का ाजीब सा घल मेल, बंगला समोसों के साथ लस्सी । खाने परोसते समय इतालवी आचार का ध्यान रखा गया था, इसलिए समोसा चावल के बाद आया।
दूसरा दिन इतना आसान नहीं था, क्योंकि वीसा की प्रक्रिया बाकि थी, मैंने अपना सामान टटोला तो देखा कि हेल्थ इंश्योरेंस के कागज और पेन ड्राइव भि नदारत था, यह कब और कैसे हुआ समझ में नहीं आया। मेरी समस्या यह थी कि मेरा वीसा नोर्वे से मिला था, लेकिन इस वक्त मैं नोर्वे की यात्रा खत्म कर आई थी, और वियेना जाने के लिए आस्ट्रिया जाना चाहती थी। फिर भी मैंने नोर्वे राजदूतालय से वीसा की मांग की थी, और साथ में पेपेर की कटिंग भी दी, जिसमें नोर्वे के अखबार में मेरे बारे में रिपोर्ट दी गई थी। उन लोगों को वीसा बनाने में एतराज तो नहीं था, लेकिन उनका इंटरनेट सिस्टम डाउन था। उन्होंने हमसे आस्ट्रिया के दूतावास में कोशिश करने को कहा़। इसलिएब आज मैं और रोबर्टों सबसे पहले आस्ट्रिया के दूतावास में गए, वहां काफी देर बैठाए रखने बाद हमे कह दिया गया कि वे वीसा नहीं बना सकते। रोबर्टो अपना आपा खो बैठे, और मेरा तो रोना ही छूट गया। मैंने घर में प्रदीप को फोन कर के इंश्योरेन्स की एक कापी जो कि मेरे कम्प्यूटर में थी, बेजने को कहा। प्रदीप आफिस में थे, और हैदराबाद के लिए निकलने वाले थे, वे झल्ला उठे, बाग्यवश उनकी फ्लाइट डिले हो गई, और वे तुरन्त घर गए और इंश्योरेंस के पेपेर को PDF फाइल बना कर भेज दिया। जब काम बिगड़ना होता है, बिगड़ता जाता है और जब ठीक होना होता है हल पल सहायक बनता जाता है। हमे २ दो बजे से पहले नोर्वे के राजदूतालय पहुँचना था, क्यों कि वहाँ से खबर आ गई थी कि उनका कम्प्यूटर ठीक हो गया है, और वे तीन बजे से पहले आने पर वीसा दे देंगे। सहगल जो कृत्या के बलबूते पर मुफ्त में रह रहे थे, खा पी रहे थे, कहीं भी दिखाई नहीं दिए। वे अपने में आराम से घूम रहे थे। एक दिन तो एंजिलो ने छुट्टी लेकर उन्हे घुमाया फिराया, लेकिन दूसरे दिन उसे आफिस जाना ही पड़ा। रोम में काफी भारी टिकिट लगता है, और सहगल उससे भी बचना चाहते हैं, इसलिए वे किसी ना किसी से लगे रहते हैं कि तिकिट का पैसा भी खर्च ना करना पड़े। जब अकेले जाना पड़ा तो वे हर जगह को लेवल बाहर से झांक कर चले आए। अपने देश में कौन पूछेगा कि कहाँ गए, कहां नहीं गए। मेरा घूमना अभी शुरु ही नहीं हुआ था।
दोपहर बाद सारा काम आसान हो गया, मानो कि एक सैलाब आया था जिसने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया। जैसे ही नोर्वे के दफ्तर में बैठी आफिसर ने मुझसे कहा कि आप बैठिए, हम २० मिनिट में वीसा दे देंगे, मेरा बाँध टूट गया और आँखों से आँसू टपकने लगे। इतने वक्त में जो टेंशन मेरे भीतर जमा हुआ था, वह बहने लगा। उस महिला ने बड़े प्रेम से मुझ से कहा कि मुझे आपकी समस्या का भान है, पर कल आपका वक्त सही नहीं था। आज जितना वक्त है उसका फायदा उठाओ। चार बजे जब हम निकले हमारे पास वीसा था।
रोबर्टो ने लपक कर वक्त को अपने हाथ में ले लिया और सबसे पहले पास के एक पार्क में ले आया, जो इतालवी अभिनेत्री के नाम समर्पित किया गया था। रोबर्टो बताने लगे कि वे अपने बचपन में इस पार्क में आकर घण्टों बैठा करते थे। यहाँ से रोम पूरा कि पूरा दिखाई देता है। रोम शहर सात पहाड़ियों पर 21 April 753 BC को बसाया गया था , इन पहाड़ियों के नाम हैं the Aventine Hill , Aventine Hill, the Caelian Hill , , the Capitoline the Esquiline Hill , the Palatine Hill , the Quirinal Hill , and the Viminal Hill कहा जाता कि तेवरे नदी के अलावा एक और नदी शहर के बीच में से गुजरती थी जिसका नाम था Aniene जो बाद मे जाकर तेवरे में मिला जाती थी।
शायद यही कारण है कि रोम के हर चौराहे पर कोई ना कोई फव्वारा देखने को मिल जाता है। न जाने कितने भग्नावेश ना जाने कितनी इमारतें, हर किसी में पानी का फौवारा।
रोबर्टो ने घड़ी देखी, और कहा कि अभी हमारे पास वक्त है, हम The Colosseum or Roman Coliseum हैं। इसे Flavian Amphitheatreया Amphitheatrum Flavium, जो रोमन साम्राज्य की अनेक गाथाओं को अपने भीतर समेटे हुए शहर के बीचोबीच खड़ा है, ना जाने कितने साम्राज्यों का पतन इसने देखा, ना जाने कितनी धार्मिक आँधियाँ सहीं, और भूकम्पों से टकराया, लेकिन भग्नावेश में भी धरती का आश्चर्य बना हुआ है। इसका निर्माण 70 और 72 AD साम्राट Vespasian द्वारा आरम्भ किया गया और निर्माण पूरा हुआ 80 AD में सम्राट Titus के शासन काल में पूरा हुआ। Amphitheatrum Flavium नाम Vespasian और Titus सम्राटों के पारीवारिक नामों पर पड़ा।
हम लोग कोलोसियम के बाहर टिकिट की लाइन में खड़े हुए। रोबर्टों चोहत्तर बरस के हैं, लेकिन अपनी उम्र से कम लगते हैं। रोम में पैंसठ साल के ऊपर के लोगों को टिकिट नहीं देना पड़ता है। लेकिन रोबर्टो अपना परिचय पत्र साथ रखते हैं, जिससे उनकी असली उम्र के बारे में पता चल सका। जब वे खिड़की पर पहुँचते हैं और मेरे लिए एक टिकिट खरीदकर अपने लिए पास माँगते हैं तो खिड़की के भीतर बैठी महिला आश्चर्य से कहती है, लेकिन आप तो सीनियर सिटिजन नहीं लगते। रोबर्टो अपना परिचय पत्र निकालकर दिखाते हैं। दोनों में इतालवी भाषा में संवाद होता है। एक हल्का फुलका मजाक भी हुआ।
मैं देखती हूँ कि रोम में लोग काफी खुल कर हँसी मजाक कर लेते हैं। रोबर्टों तो हर किसी से बेहद खुल कर बात करते हैं, चाहे वह टैक्सी ड्राइवर हो या दूकानदार। उनकी आत्मा उस नगर में रची बसी है। कोलोसियम का टिकट नौ यूरो का था जो करीब साड़े पाँच सो का हो जाता है, जब से मेरे पैसे खोये , मैंने अपने पास पैसे रखने बन्द कर दिए। चलने से पहले मैं पैसे रोबर्टों को संभलवा दे देती हूँ, शाम को वे बता देते हैं कि कितने पैसे बाकी हैं। रोबर्टो रिटायर्ड हैं, उनकी पत्नी को देख कर यह लगता है कि उनका महिने का खर्चा काफी होता होगा, इसलिए मैंने इस बात का ध्यान रखा कि रोबर्टों का खर्चा ना हो। रोबर्टो भी बेहद संभल कर खर्च कर रहे थे। ों
हम लोग कोलोसियम की सीढ़ियों पर चल कर ऊपर जाते हैं, पतली संकरी सीढ़ियाँ लखनऊ की भूल भुलैया की सीढ़ियों की याद दिलाती हुई सी।
कोलोसियम की अर्धचक्राकार आकृति का है जिसकी लम्बाई करीब 640 रोमन फीट और चौड़ाई 528 रोमन फीट है , इसके आधार का क्षेत्र फल 24000 मीटर स्कायर है। बाहरी दीवारों की ऊँचाई 165 रोमन फीट है । इसके अर्धचन्द्राकार थियेटर में जाने के कई रास्ते हैं, जिससे यह आपदावस्था मे आसानी से खाली किया जा सके। इसमें एक वक्त में करीब 50,000 लोग बैठ सकते थे। इसके अस्सी द्वार हैं, जिनमें से छहत्तर आम आदमी के लिए थे. और बाकी चार राजकीय दर्शकों के लिए थे।
कोलोसियम रोम के क्रूर मनोरंजन की गाथा कहता है। यहाँ दासों को जंगली जानवरों से लड़वाया जाता था। थियेटर के नीचे की मंजिल में क्रूर जानवर रखे जाते थे, जिन्हें दक्षिण अफ्रीका के जंगलों से पकड़ कर लाया जाता था। दूसरी ओर दासों को पाला जाता था। लड़ाई एक पक्ष की मृत्यु तक चलती थी। जीतने वाले की जिंदगी भी राजा के हाथ में होती थी।
रोबर्टो जब कथा कह रहे थे, मेरा रोम रोम सिहर रहा था. क्रूर मनोरंजन भारतीय संस्कृति में नहीं के बराबर रही है। मुझे लगा कि यही कारण होगा कि भारत अंहिसा को स्थान मिला और कई धर्मों का उदय भी हुआ।
कोलोसियम के ऊपर म्यूजियम था, जिसकों देखने में काफी वक्त बीत गया। रोबर्टों इतिहास से गुजरे व्यक्ति हैं, वे लगातार कुछ ना कुछ बताते जा रहे हैं, जैसे कि यहूदियों के दास बनने की कथा, तरह तरह के दरवाजे जहाँ पर राजाओं ने अपनी विजय के चिह्न खोदे हैं। मेरा दीमाग सुन्न होता जा रहा है, बस एक दृश्य दिखाई दे रहा है - दर्शकों की बहशी चीखें, भूखे जानवरों की पीड़ा और दासों का जीवन संघर्ष....
सवाल यह है कि हम अपनी क्रूरता को पीछे छोड़ आए या फिर आज भी नकली मुखौटे में छिपाए हुए हैं।
कोलोसियम कई बार टूटा, कई बार बनाया गया, युद्धों से लेकर भूकम्पों तक ने इसे चकनाचूर करने की कोशिश की, लेकिन आदमी सर्वविजयी बनने की आकांक्षा की तरह पूर्णतया नष्ट नहीं हो पाया। एकड़ों भूमि में पसरा इस थियेटर में आज भी मृतकों की चीखें घूमती होंगी। कहा जाता है यहाँ खेले गए क्रूर खेलों में कम से कम 5000.000 मनुष्य और एक लाख जानवर मारे गए होंगे। मुझे अपने देश के पुरी के खंडहर याद आते हैं, जहाँ पर चीखों की जगह संगीत की लहरें उभरती रही हैं। कहा जाता है कि यहाँ पानी भर कर सामुद्रिक खेल भी खेले गए।
हम कोलोसियम की छत पर जाते हैं जहाँ से पूरा कि पूरा रोम दिखाई देता है। हम महलों के भग्नावेशों गलियारों
रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ है, न जाने कितनी सदियों की गाथा है इसमें। हम लोग खंडहरों के बीच घूमते घूमते न जाने किस इतिहास के दरवाजे में घुसते हैं, और न जाने किसमें से बाहर निकलते हैं। हर सम्राट अपनी जीत की कथा दरवाजा बनाकर लिखता है, सोचता होगा कि वह इन दरवाजों के द्वारा इतिहास की अमिट रेखा बन जाएगा, रोबर्टों हर युद्ध के परिणाम विजय द्वार के बारे में बताते हैं। दरवाजों पर खुदे विजय चिह्नों को समझाते हैं, कुछ दरवाजे टूट फूट गए, कुछ अभी भी बाकी हैं, मेरे दीमाग में नाम नहीं घुसते, बस युद्ध का घोष घुन्नाता है।
कान सुन्न होने लगे हैं, मन खट्टा हो रहा है,,, हम लोग लौट आते हैं, रात को रीटा के घर खाना है, उससे पहले वियना के लिए टिकिट भी बुक करना है, सहगल यह छोटा सा काम कर सकते थे, लेकिन उनका ध्येय बस अपने खाने पीने के साथ अपना ख्याल रखना है। वे सारे दिन बाजारों में भटक कर शाम को रीटा के घर चले आए होंगे। कोलोसियम आदि जाने के लिए टिकिट की जरूरत है, जिसे वे नहीं खरीदेंगे। मुझे मालूम है, कोलोसियम जमीन पर ही नहीं मनों पर भी खड़े होते हैं।
घर लौट कर हम तीनों, मैं रोबर्टो और पोला रीटा के घर के लिए कार में चलते हैं, रोबर्टों अभी भी रोम की कथा कह रहे थे। रीटा का घर रोम का नये बसे हिस्से में था, इसलिए कुछ नए तरीके का था। मैं रोबर्टों से पूछती हूँ कि रोम में किसी भी जगह पंखे नहीं दिखाई दिए, जबकि मौसम थोड़ा गरम ही है। वे बताते हैं कि रोम में पंखे तो उन्होंने अपने बचपन से नहीं देखे, आजकल ज्यादातर घरों में ए सी होते हैं, लेकिन पंखो का चलन कभी नहीं रहा। हम रोम के नए हिस्से में आ पहुँचे हैं, यहाँ पर रोम आम शहर सा लगने लगा है। रोबर्टों बताते हैं कि शहरी इलाके में इमारत में एक ईंट तक लगाने के लिए सरकार से इजाजत लेनी पड़ती है, लेकिन बाहरी इलाके में इमारते आम शहरों जैसी हो सकती हैं।
रीटा के घर में तीन चार परिवार इक्कट्ठे हुए हैं, सभी इतालवी भाषा में बात कर रहे थे। बीच बीच में एंजिलो और रोबर्टों अंग्रेजी में कुछ वाक्य समझा देते। खाना लजीज था, बात चीत काफी लम्बी चली, मेरी आँखे मुन्दने लगी तो मैं करीब बिछे सोफे में जाकर लेट गई, और अनायास सो गई।
काफी रात गए हम घर लौटे।
अगले दिन रोबर्टो काफी पहले तैयार हो गए, हम दस बजे वेंटिकन सिटी के लिए निकल पड़े। रोम आओ और वेंटिकन सिटि ना जाओ , ठीक नहीं होगा। रोबर्टों को किफायत से चलना आता है, इसलिए बसों का प्रयोग कर लेते हैं। सबसे पहले हम त्रिस्तेवर में स्थित एक चर्च Sancrisogono में गए, जिसके प्रति रोबर्टो को विशेष ममता है। वे यद्यपि यहूदी है,, उनकी पत्नी ईसाई हैं, और इस चर्च से जुड़ी हैं। यूरोप के चर्चों की भव्यता देखते ही बनती है। रोबर्टो चर्च के उन हिस्सो को दिखला रहे थे, जो रोमन मन्दिरों के भग्नावेशों से बनाए गए थे। मेरी बड़ी इच्छा थी कि रोमन मन्दिर देखा जाए, लेकिन कोई भी मन्दिर अपने मूल रूप में नहीं है। चर्च जाने के लिए जो सड़क थी उसमें गाड़ियों का प्रवेश वर्जित था। यूरोप के मकान करीब करीब एक सी शैली के हैं, उन्हें देख कर मुझे बीकानेर की हवेलियाँ याद आगईं।
इसके बाद हम सान्त मरिया इन त्रस्तेवर गए, यह बेहद पवित्र स्थान माना जाता है, चर्च की नक्काशी के साथ साथ चर्च के पिछले भाग और डोम में बनी काँच की कामगारी भी बेहद मनोहर थी। सबसे महत्वपूर्ण चीज थी टाइल्स को जोड़ कर बनाई गई नक्काशी जो दूर से पेन्टिंग का आभास दिलाती हैं।
मैंने वहाँ से मारिया की एक पेन्टिंग खरीदी। उसे देख रोबर्टो चिल्ला उठा, अरे यह कैसे हो सकता है? घर पर देखना, मेरी मेज पर यही तस्वीर रखी है. मैं हँस पड़ी।
इसके बाद रोबर्टों ने तुरन्त टैक्सी की और वर्तीकन सिटी चले आए। वर्टीकन सिटि के बारे में कौन नहीं जानता, पोप का साम्राज्य है यह। इसका निर्माण सेन्ट पीटर स्काअर का इतना विशाल अहाता और लाखो की संख्याँ में लोग। फुटबाल मैच चल रहा था, इसलिए पर्यटक ही नहीं फुटबाल प्रेमी भी लाखों की तादात में थे। मेरी तो साँस फूल गई, इसे देखना शुरु किया तो रात हो जाएगी। रोबर्टो कहने लगे कि यहाँ आकर यदि म्यूजियम नहीं देखा तो क्या फायदा। हम लोग लाइन में खड़े हुए, मैंने देखा कि लाइन बेहद लम्बी है तो मैं चुपचाप आगे की ओर बढ़ गई, रोबर्टो भी लपक कर आए और पूछने लगे, अरे तुम कहाँ जा रही हो, मैंने हँस कहा कि भारतीय बुद्धि का इस्तेमाल कर रही हूँ । रोबर्टो समझ गए और हँसने लगे। थोड़ी देर में रोबर्टो ने बड़ी कुशलता से दो बार लाइन में आगे बढ़ने में सफलता प्राप्त कर ली। मैं यह देख कर हँसने लगी तो कहने लगे कि हम इतालवी लोग भी यह सब चतुराई जानते हैं।
किसी तरह से हम म्यूजियम के भीतर पहुँचे, तो मेरी आँखे चकाचौंध हो गई। बेहद भव्य म्यूजियम, उसकी छत भी इतनी खूबसूरत कि कुछ कहा नहीं जा सकता। इतनी बड़ी बड़ी मूर्तियाँ कि आदमी उसके सामने बौना लगे। रोबर्टो को हर मूर्ति के बारे कुछ ना कुछ पता है, लेकिन मेरा दीमाग नहीं चल रहा है। मैं तो केवल सौन्दर्य और शिल्प में खोई हुई हूँ। अन्ततः हम एक भव्य शिल्प के सामने जा खड़े हो जाते है " पिटी" , करुणा को सकार करती माँ मेरी जख्मी पुत्र की देह को गोद में लिए। रोबर्टो पोप का इतिहास भली भाँति जानते हैं, वे एक एक पोप का नाम लेकर उनके बारे में बताने लगे। उन्हे इस बात का आश्चर्य था कि मुझे इसाई संस्कृति के बारे में इतनी कम जानकारी है। आज मेरा कैमरा काम नहीं कर रहा था। लेकिन मन की आँखे प्रफुल्लित हो रही थी। हाँ याददाश्त इतनी तेज नहीं कि सारे नाम याद हो जाएँ। फिर भी बड़ा अच्छा लग रहा था़ आज मुझे शाम के छह बजे तक गाड़ी पकड़नी थी वियेना के लिए, सुबह सारा सामान बाँध कर आई थी, लेकिन समय की पाबन्दी तो थी। करीब दो घण्टे म्यूजियम में बिताने के बाद बाहर आए तो बेहद भूख लगी थी। हम लोग वर्टिकन सिटी की परिधि के तुरन्त बाहर बने होटल में जा कर बैठ गए। ये होटल करीब करीब वैसे ही थे जैसे कि भारत के किसी पर्यटन स्थल में होते हैं। मुझे यरोप का मिक्स्ड सलाद बेहद पसन्द आता है, मैंने वही लिया। सलाद अच्छा था। इसी बीच कई लोग आए, आबनूस से काले अफ्रीकी जो कि घड़ियाँ बेच रहे थे। रोबर्टो बता रहे थे कि वे रात रात बैठ कर खुद घड़ियाँ बनाते है और दिन भर बेचते हैं। मैंने देखा कि उनके आबनूसी रंग में भी बेहद खूबसूरती है। रोबर्टो की पत्नी पोला ने फोन कर के पूछा कि हम लोगों ने क्या क्या देख लिया, उन्होंने रोबर्टों को हिदायत दी कि रति को फन्ताना दित्रेवी जरूर ले जाना और फव्वारे में एक सिक्का अवश्य डलवाना।
खाने के बाद हम फन्ताना दि त्रेवी ( Fountain di Trevi) के लिए निकल पड़े, रोबर्टों कई शार्ट कटों को जानते हैं, रास्ते मे हमने चमड़े के सामान की दूकाने देखीं, साथ ही फैशन के सामान से भरी दूकाने देखीं। दरअसल मैं विण्डों शापिंग की आदि नहीं हूँ, खरीददारी करने का शौक पाला हीनहीं, इसलिए दूकानों पर ध्यान नहीं दे रही थी। रोबर्टो ने मुझे रोक कर कहा - मैं देख रहा हूँ कि तुम दूकानों की ओर झाँक भी नहीं रही हो। तुम्हे मालूम होना चाहिए कि इटली, विशेषतया रोम फैशन के लिए विश्व प्रसिद्ध है, यहाँ साधारण आदमी भी अच्छे कपड़े पहनना पसन्द करता है। मैंने दूकानों पर ध्यान देना शुरु कर दिया। कोई सन्देह नहीं कि इटली के फैशन का कोई मुकाबला नहीं। चमड़े का सामान तो बेहद खूबसूरत , लेकिन सब कुछ इतना महंगा कि देखने में भी डर लगे। मेरे पैसे नहीं खोये होते तो शायद चमड़े का सामान जरूर खरीदती। रोबर्टों भीड़ से परेशान थे, कहने लगे कि फुटबाल मैच नहीं होता तो ज्यादा अच्छी तरह से घूमा जा सकता था। लेकिन मेरे लिए तो यह भी दर्शनीय था, यूरोपीय फुटबाल प्रेम को जानती हूँ, लेकिन लोगों के पागलपन की साक्षी पहली बार हो रही, चेहरों पर अपनी अपनी टीम के झण्डों के रंगों को पोत लोग जिस मानसिक अवस्था में थे, वह कम रोचक नहीं था। यह उन्माद भरी अवस्था म, दोनो मनुष्य को ऊर्ध और पतन दोनो ओर ले जाती है।
फन्ताना दि त्रेवी ( Fountain di Trevi)में जब हम पहुँचे, जगह ठसाठस भरी थी, खासतौर से फुटबाल के प्रशंसकों से। सभी झरने में पैर डाले बैठे थे। मैंने पर्स की तली से पैसा निकाला और झरने के पानी में उछाल दिया। माँगा क्या? शायद याद नहीं, हो सकता है कि कुछ माँगा ही ना हो। रोबर्टों भीड़
सान्ता मरिया अराचेली अगला पड़ाव था, । रोबर्टों ने बताया कि अरा का मतलब है मन्दिर और चेली का अर्थ आसमान, यह चर्च इतनी ऊँचाई पर है कि इसे आसमान का मन्दिर कह जाने लगा। चर्च में अनेक सीढ़ियाँ थीं, यूरोपीय चर्चों में स्वर्ग की विशिष्ठ भूमिका रही है। अधिथकतर चर्चों के गुम्बद के भीतरी भाग में खूबसूरत चित्रकारी की जाती है, चर्चों की ऊँचाई स्वर्ग तक पहुँचने की भावना की परिचायक रही होगी। अराचेली के चर्च की सीढ़ियों को स्वर्ग की सीढ़ियों तुलना की गई होगी।
Mausoleum of Hadrian जो कि Castel Sant'Angelo कहलाता है , को हम आते जाते देखते आए थे, लेकिन आज हम इसके भीतर भी गए। दरवाजे पर हमारा स्वागत आदम कद एंजिलो ने किया, जो ईसाई कथाओं में विशेष महत्व रखते हैं। हम म्यूजियम में जाना चाहते थे, लेकिन वह मरम्मत के लिए बन्द था। हम इमारत के अहाते में घूम घूम कर भव्यता को अनुभूत करने लगे। पर्यटन में देखना एक हद तक होता है, देखते ही वस्तु दिल में प्रवेश नहीं कर पाती है। उसे ानुभव करना पड़ता है। रोबर्टो बता रहे थे कि Castel Sant'Angelo में लोग पोप के दर्शन के लिए जाने लगे तो तेवरे नदी पर पहली बार पुल बनाया गया, यही नहीं भीड़ को सन्तुलित करने के लिए पोप ने यह नियम बनवाया कि दाँए पुल से लोग भीतर जाएंगे, और बाएँ से बाहर आएँगे। यही नियम बाद में सड़कों पर लागू किया गया।
पोप ने आस भव्य इमारत को १४ वीं सदी में किले में परिवर्तित किया और St. Peter's Basilica से एक पुल के द्वारा जोड़ दिया, जिससे आक्रमण होने पर पोप भाग कर Castel Sant'Angelo में जाकर प्राण बचा सकें।
शाम के पाँच बज गए थे, मुझे साड़े छह बजे की ट्रेन पकड़नी थी। हम लौटने ही वाले थे कि रोबर्टों ने कहा कि एक महत्वपू्ण चीज देखे बिना तुम नहीं लौट सकती हो। उन्होंने तुरन्त बरकासिया BARCACCIA के लिए टैक्सी की ली। यहाँ एक फव्वारा था, जहाँ का पानी सभी लोग पी रहे थे। रोबर्टों ने कहा रोम आने वाले सभी को इस फव्वारे का पानी पीना चाहिए, यह पाप नाशक माना जाता है। मुझे शपने देश की गंगा बेहद याद आई। यह फव्वारा नौका की आकृति का है। इस फव्वारे से सीढ़ी चढ़ कर चर्च था। सीढ़ियाँ इस तरह से बनाई गईं थी कि यहाँ बैठने पर फव्वारे को अनूभूत किया जा सके। तभी रोबर्टों कहने लगे। मैं तुम्हे यहाँ इसलिए नहीं लाया कि फव्वारे का जल पिया जाए, बल्कि इसलिए कि तूम महान कवि कीथ का घर देख सको। सीढ़ियों से सटी एक इमारत थी, जिसमें कीथ ने अपने जिन्दगी के कई बरस बिताए थे। मुझे लगा कि रोम तो मैंने पहली बार देखा है।
समय काफी कम रह गया था, हम लोग बस पकड़ के तेजी से घर आए, और सामान को लेकर ट्राम से ही रेलवे स्टेशन पहुँचे। रोबर्टों ने फुर्ती से मेरे लिए रात का खाना खरीद कर कम्पार्टमेण्ट तक पहुँचा जरूर होया। तभी रीटा और एंजिलो भी आ पहुँचे। सब कुछ ५तना सुयोजित हुआ कि मैं पासपोर्ट खोने की बात ही भूल गई..
अलविदा रोम! फिर आऊँगी, क्रूर जरूर हो, फिर भी कुछ ना कुछ आकर्षण है ही, जो सबको तुम्हारी ओर खींचता है।
पूरा रास्ता हँसते हँसते पार हो गया, रोम आया तो पता ही नहीं चला। रोम में उतर कर मैं रोबर्टों का इंतजार करने लगी। थोड़ी देर में रोबर्टों आते दखाई दिए, रोबर्टौ करीब चौहत्तर बरस के हैं, लेकिन बेहद चुस्त दुरस्त लगते हैं। वे मुजे ापने घर ले गए। उनकी पत्नी पोला समाज सेविका और समाजशास्त्री हैं। उम्र उनकी भी कम नहीं होगी लेकिन जिस तरह से वे तैयार थीं, मुझे काम्लेक्स होने लगा। वे पूरे मेकअप, और बेहद फैसनेबिल कपड़ों में थी। मेरे घर आते ही उन्होंने मुझे मेरा कमरा दिखाया और खाना परस दिया। रोम में खाने का तरीका काफी अलग है़ यहाँ कई कोर्स में खाना परसा जाता है। एक के ऊपर एक तश्तरी रखी हुई थी। एक कोरस खत्म होते ही उस तश्तरी को हटा दिया जाता और दूसरे कोर्स के लिए नई तश्तरी में परोस लिया जाता है। पहले सूप, फिर सलाद , फिर पात्जा.. ।
मेरी तबियत अभी तक पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी। खाना काफी भारी हो गया। खाने के बाद रोबर्टों ने कहा कि कमरे मं आराम कर लो, कुछ देर बाद हम घूमने जाएँगे। मैं कमरे में जाते ही सो गई, शाम को उठी तो हम घूमने चल दिए थे।
रोबर्टों ने अपनी जीवन यात्रा गाइड के रूप में शुरु की थी, इसलिए वे जैसे ही सड़क पर पहुँचते कुछ ना कुछ बताने लगते। रोबर्टों के पास बताने को काफी कुछ था भी , ना जाने कितनी पीढ़ियों से वे त्रस्तेवर में रह रहे थे। शिशु जनम के साथ ना जाने कितनी जानी अनजानी स्मृतियों को लेकर आता है, बीज बनने की गाथा स्मृतियों के संघटित होने की गाथा भी तो है। जिस बिल्डिंग में वे रहते हैं वे सौ बरस से ज्यादा पुरानी है, उनके फ्लैट में सामान है वह सदियों से संकलित किया गया है, भव्य पैन्टिंग्स, क्राकरी फर्नीचर, सभी बेहद पुराने और अपने भीतर कोई ना कोई कहानी लिए हुए। रोबर्टो ने एक ऐसी पैन्टिग दिखाई जो थोड़ी अधूरी थी, लेकिन वक्त के अपउनके पिता ने किसी बड़े पकाकाल द्वारा बनाई गई थी, आज मैं लिखते वक्त उस कलाकार का नाम तो भूल रही हूँ, लेकिन पैंन्टिंग का अधूरापन मन में अभी टंगा है। त्रस्तेवर रोम की प्रमुख सड़क है, जिसमें भव्य इमारते हैं, जो काफी पुरानी हैं। आश्चर्य की बात यह है कि कोई भी इमारत पुरानी सी नहीं लगती। तेवरे ( Teverre rivers ) उस नदी का नाम है, जिसके किनारे रोम बसा है, इसलिए नदी पार बस्ती को त्रस्तेवरे कहा गया है। रोबर्टो यहूदी हैं, इसलिए उनकी कथा यात्रा अनजाने यहूदी समाज के आसपास घूमती है। वे बताते हैं कि इसी जर्मन यहूदियों की तलाश में उनके घर तक पहुँचे थे। उस वक्त उनके माता पिता और अन्य कुछ रिश्तेदार घर छोड़ के अलग अलग जगहों में पनाह ले रहे थे। घर को बूढ़ी बीमार दादी और उनकी एक बहन जो कि उनके परवार की एकमात्र ईसाई धर्म मानने वाली सदस्या थीं, के भरोसे छोड़ गए। लोगों का विचार था कि जर्मन बूढ़ों को परेशान नहीं करेंगे। लेकिन उन की क्रूरता की सीमा की कोई रेखा नहीं थी, उनकी इमारत तक पहुँचने वाले थे , कि उनके नीचे की मंजिल में रहने वाली एक महिला ने चतुराई से बूढ़ी दादी को लिफ्ट से पलंग सहित अपनी बिल्डिंग में ले गई। किसी ने सोचा भी नहीं था कि ईसाई धर्म मानने वाली वृद्ध महिला को किसी तरह का खतरा हो सकता है, लेकिन जर्मन सैनिक किसी तरह की छूट देने वाले नहीं थे। रोबर्टों की आण्टी को जेल में डाल दिया गया, बाद में त्रस्तेवरे के चर्च के पोप के द्वारा दखल देने पर छोड़ा गया। इस बीच पाँच वर्षीय रोबर्टौ अपनी माँ के साथ किसी चर्च में पनाह लिए हुए थे, और पिता कहीं और छिपे थे। चर्च के द्वारा यहूदियों को पनाह देने के पीछे कारण यह था कि तत्कालीन पोप को आरंभ में तो हिटलर पर भरोसा था कि वह कम्युनिस्टों के खिलाफ चर्च का साथ देगा, लेकिन ने पोप को भी ज्यादा भाव नहीं दिया तो पोप ने चर्चों को यहूदियों की चोरी छिपे सहायता करने का गुप्त आदेश दे दिया। इसी कारण रोबर्टो के परिवार जैसे कई यहूदी परिवार ईसाई नाम से चर्च तहखाने में रहने लगे।
रोबर्टो बता रहे थे कि उस उम्र में उनके लिए सबसे मुश्किल काम था, अपने नाम को याद रखना, क्यों कि उन्हे दो नाम बताए गए थे़, एक उनके जन्म का नाम जो माता पिता ने दिया था, दूसरा ईसाई नाम जो चर्च ने दिया। रोबर्टौं अपनी माँ के साथ उसी चर्च में करीब एक साल तक रहे। उन्हे ईसाई नाम दे दिया गया था, और ईसाई प्रार्थनाएँ भी सीखाई गई थी, लेकिन उनका अधिकतर वक्त चर्च के तहखाने में चुपचाप बैठे हुए बीतता था।
"तुम सोच सकती हो कि एक बच्चे को खेलने की मनाही हो, उसे दो दो नाम याद रखने हो तो कैसा लगता होगा। " रोबर्टों की आवाज में अभी तक दर्द था।
नाम याद रखना कितना कठिन है
उसने समझ लिया था
पाँच बरस की उम्र में ही
वह भी जब कि
नाम एक से ज्यादा हों,
और यह जानना भी जरुरी हो कि
पूछने वाला कौन है
नाम से भी ज्यादा मुश्किल था,
प्रार्थनाएँ रटना
मन को यह समझाते हुए कि
यह उसकी अपनी नहीं है
प्रार्थना बहुत सी हों,
कोई फरक नहीं पड़ता
जरूरी है कि
वह नाम की तरह किसी दूसरे से
उधार ना ली गई हों
चलने से पहले मैंने अपने पर्स में एक फोल्डर रखा जिस में पाँच सौ यूरों का नोट औरपासपोर्ट और स वीसा भी था़ हालाँकि चलने से पहले मेरे मन में एक विचार आया कि इतने पैसे एक साथ रखने चाहिए कि नहीं, पर मेरे पास खुल्ले यूरो नहीं थे, और मैंने सोचा कि नोट खुला लूंगी। रोबर्टों हमें ट्राम से ले गए। वे लगातार कुछ ना कुछ दिखाते बताते जा रहे थे, अतः मेरा ध्यान उनकी बात में लगा था। रोबर्टौ रोम दिखाने के लिए बड़े उत्साहित थे, लेकिन अभी हम सेन्टर में खड़े ही थे कि मुझे लगा कि मेरा बैग कुछ हल्का सा है। मैंने देखा तो बैग की जिप खुली थी, और फोल्डर गायब... कुछ पल के लिए सुन्न रह गई, पैसे गए तोो अलग बात है, लेकिन यहाँ तो वीसा पासपोर्ट ही गायब है। रोबर्टों ने कहा कि हो सकता है कि घर में भूल आई हो , मुझे मालूम था कि मैंने फोल्डर साथ रखा था, लेकिन घर आना ही पड़ा, लेकिन कुछ नहीं, फिर तो रोम की इमारते देखने की जगह हम पुलिस डिपार्टमेन्ट के चक्कर लगाने लगे। रोबर्टो के सा्थ होने के कारण भाषा की समस्या नहीं थी, लेकिन मैं मन में बेहद अजीब सी शर्म महसूस कर रही थी कि इस उम्र में रोबर्टौं को परेशान कर रही हूँ। दूसरे दिन शाम तक हमे पास पोर्ट तो नया मिल गया. लेकिन वीसा बनने की समस्या बरकरार थी। लेकिन इस बीच काफी कबायत हो चुकी थी। पासपोर्ट बनने के बाद हम पासपोर्ट आफिस की गली से लगी दूसरी सड़क में खाना खाने आए तो रोबर्टों ने थर्राने वाली बात बताई।
रोबर्टौ बताने लगे कि यह VIA RASELLA है जहाँ यहूदियों के कत्ले आम की नींव रखी गई थी। जर्मन सेना इस गली से मार्च कर रही थी, किसी बच्चे ने शैतानी में किसी बिल्डिंग के पास एक पटाखा रख दिया। जर्मनों के दोचार
सिपाही जख्मी हो गए, बस फिर क्या था, उन्हे उस गली में रहने वाले करीब 300 यहूदियों को चुन चुन कर मार दिया। ंगे
मैं रोबर्टों की बात सुन रही थी, रोम का इतिहास खून से रंगा है, जितनी लड़ाइयाँ , जितने युद्ध यहाँ हुए हैं, उतने संभवतः ही किसी और देश हुए होंगे, लेकिन आश्चर्य यह देख कर होता है युद्ध और क्रूरता के मध्य कला किस तरह से महत्वपूर्ण स्थान बना पाई। इस शहर के चप्पे चप्पे में कलात्मक वैभव देखते ही बनता है। हर नुक्कड़ पर एक फौव्वारा, हर गली में इतिहास की खिड़की, शहर नहीं मानों एक बड़ा अजूबा म म्यूजियम हो।
शाम को कविता पाठ था, जिसका ईंतजाम रीटा और एंजिलो ने एक लाइब्रेरी में करवाया था, जहाँ पर भारतीय कैफे था, और संस्कृत पढ़ाई जाती थी। यूरोप वासी आज भी पुरातन इतिहास और संस्कृति में रुचि लेते हैं। शाम को हम लोग लाइब्रेरी पहुँच गए। छह बज चुके थे, लेकिन Professor Filippo Bettini, जो कि Allegorein नामक एसोशियेसन के प्रमुख थे और Mediterranea नामक महत्वपूर्ण पोइट्री फेस्टीवल चलाते हैं, अभी तक नहीं पहुँचे थे। मुझे असमंजस में पड़ा देख कर रोबर्टों बोले- हम लोग इतालवी हैं, अंग्रेज नहीं। हमारे यहाँ छह बजे का मतलब साड़े छह या फिर सात बजे होता है।
मुझे हँसी आ गई, तो फिर यह समय की पाबन्दी की बीमारी मात्र अंग्रेजों की है, बाकि सब लोग तो पूरे मनुष्य हैं, मन का कहना मानने वाले।
मेसीमों भी रोम आने वाला था, मेसिमों ने मेरे द्वारा किए गए अथर्ववेद की प्रेम कविताओं के अनुवादों का इतालवी में अनुवाद किया था। रीटा भी इतालवी कवयित्री है।
इस तरह के कार्यक्रमों मे पहुँच कर मैं अक्सर घड़ी की ओर देखना बन्द कर देती हूँ। समय को अपने ऊपर से गुजर जाने देती हूँ। समय एक ही हम उसकझरना होता है, अक्सर हम धारा के विरुद्ध तैरने की कोशिश करते है, यदि ईहम अपने को उस प्रवाह के साथ छोड़ दें दो समय हम पर हावी नहीं होता।
यहाँ पर भी कविताएँ अनुवाद के साथ पढ़ी गईं, सहगल जी को प्रस्तुति का पहला पूरा मौका मिला था। कविताओं के अनुवाद रोबर्टों ने किए, करीब आधे घण्टे तक मेरी कविताओं का पाठ चला, उसके बाद मैंसिमो और मैंने अथर्ववेद की प्रेम कविताओं का पाठ किया। फिर सहगल की कविताओं का पाठ हुआ, सहगल की छह कविताएँ का अनुवाद किया गया था।
दो घण्टे के इस कार्यक्रम को अच्छी तरह से निभाया गया। अनुवाद पाठ भी बेहद अच्छा था। सहगल का यह पहला कार्यक्रम था, और यह मौका उन्हे कृत्या के माध्यम से मिला था, वे रोबर्टौ आदि किसी को नहीं जानते थे। लेकिन उन्होंने केवल रोबर्टों को धन्यवाद दिया, कृत्या का नाम तक नहीं लिया। वे कृत्या के सान्निध्य में रीटा और एंजिलो के घर टिकाए गए थे, लेकिन उनके धन्यवाद भाषण में रीटा का नाम तक नहीं था। मुझे बुरा तो लगना ही था, सहगल चा। मैंने इतना नाशुक्रा आदमी देखा नही था। मैंने ही अन्ततः सहगल को कृत्या के माध्यम से कविता पाठ के लिए धन्यवाद दिया।
रात को हमे भारतीय खाना खिलाया गया, लेकिन जो परोसा गया। खाना बंगलादेशियों द्वारा बनाया गया था, स्वाद का ाजीब सा घल मेल, बंगला समोसों के साथ लस्सी । खाने परोसते समय इतालवी आचार का ध्यान रखा गया था, इसलिए समोसा चावल के बाद आया।
दूसरा दिन इतना आसान नहीं था, क्योंकि वीसा की प्रक्रिया बाकि थी, मैंने अपना सामान टटोला तो देखा कि हेल्थ इंश्योरेंस के कागज और पेन ड्राइव भि नदारत था, यह कब और कैसे हुआ समझ में नहीं आया। मेरी समस्या यह थी कि मेरा वीसा नोर्वे से मिला था, लेकिन इस वक्त मैं नोर्वे की यात्रा खत्म कर आई थी, और वियेना जाने के लिए आस्ट्रिया जाना चाहती थी। फिर भी मैंने नोर्वे राजदूतालय से वीसा की मांग की थी, और साथ में पेपेर की कटिंग भी दी, जिसमें नोर्वे के अखबार में मेरे बारे में रिपोर्ट दी गई थी। उन लोगों को वीसा बनाने में एतराज तो नहीं था, लेकिन उनका इंटरनेट सिस्टम डाउन था। उन्होंने हमसे आस्ट्रिया के दूतावास में कोशिश करने को कहा़। इसलिएब आज मैं और रोबर्टों सबसे पहले आस्ट्रिया के दूतावास में गए, वहां काफी देर बैठाए रखने बाद हमे कह दिया गया कि वे वीसा नहीं बना सकते। रोबर्टो अपना आपा खो बैठे, और मेरा तो रोना ही छूट गया। मैंने घर में प्रदीप को फोन कर के इंश्योरेन्स की एक कापी जो कि मेरे कम्प्यूटर में थी, बेजने को कहा। प्रदीप आफिस में थे, और हैदराबाद के लिए निकलने वाले थे, वे झल्ला उठे, बाग्यवश उनकी फ्लाइट डिले हो गई, और वे तुरन्त घर गए और इंश्योरेंस के पेपेर को PDF फाइल बना कर भेज दिया। जब काम बिगड़ना होता है, बिगड़ता जाता है और जब ठीक होना होता है हल पल सहायक बनता जाता है। हमे २ दो बजे से पहले नोर्वे के राजदूतालय पहुँचना था, क्यों कि वहाँ से खबर आ गई थी कि उनका कम्प्यूटर ठीक हो गया है, और वे तीन बजे से पहले आने पर वीसा दे देंगे। सहगल जो कृत्या के बलबूते पर मुफ्त में रह रहे थे, खा पी रहे थे, कहीं भी दिखाई नहीं दिए। वे अपने में आराम से घूम रहे थे। एक दिन तो एंजिलो ने छुट्टी लेकर उन्हे घुमाया फिराया, लेकिन दूसरे दिन उसे आफिस जाना ही पड़ा। रोम में काफी भारी टिकिट लगता है, और सहगल उससे भी बचना चाहते हैं, इसलिए वे किसी ना किसी से लगे रहते हैं कि तिकिट का पैसा भी खर्च ना करना पड़े। जब अकेले जाना पड़ा तो वे हर जगह को लेवल बाहर से झांक कर चले आए। अपने देश में कौन पूछेगा कि कहाँ गए, कहां नहीं गए। मेरा घूमना अभी शुरु ही नहीं हुआ था।
दोपहर बाद सारा काम आसान हो गया, मानो कि एक सैलाब आया था जिसने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया। जैसे ही नोर्वे के दफ्तर में बैठी आफिसर ने मुझसे कहा कि आप बैठिए, हम २० मिनिट में वीसा दे देंगे, मेरा बाँध टूट गया और आँखों से आँसू टपकने लगे। इतने वक्त में जो टेंशन मेरे भीतर जमा हुआ था, वह बहने लगा। उस महिला ने बड़े प्रेम से मुझ से कहा कि मुझे आपकी समस्या का भान है, पर कल आपका वक्त सही नहीं था। आज जितना वक्त है उसका फायदा उठाओ। चार बजे जब हम निकले हमारे पास वीसा था।
रोबर्टो ने लपक कर वक्त को अपने हाथ में ले लिया और सबसे पहले पास के एक पार्क में ले आया, जो इतालवी अभिनेत्री के नाम समर्पित किया गया था। रोबर्टो बताने लगे कि वे अपने बचपन में इस पार्क में आकर घण्टों बैठा करते थे। यहाँ से रोम पूरा कि पूरा दिखाई देता है। रोम शहर सात पहाड़ियों पर 21 April 753 BC को बसाया गया था , इन पहाड़ियों के नाम हैं the Aventine Hill , Aventine Hill, the Caelian Hill , , the Capitoline the Esquiline Hill , the Palatine Hill , the Quirinal Hill , and the Viminal Hill कहा जाता कि तेवरे नदी के अलावा एक और नदी शहर के बीच में से गुजरती थी जिसका नाम था Aniene जो बाद मे जाकर तेवरे में मिला जाती थी।
शायद यही कारण है कि रोम के हर चौराहे पर कोई ना कोई फव्वारा देखने को मिल जाता है। न जाने कितने भग्नावेश ना जाने कितनी इमारतें, हर किसी में पानी का फौवारा।
रोबर्टो ने घड़ी देखी, और कहा कि अभी हमारे पास वक्त है, हम The Colosseum or Roman Coliseum हैं। इसे Flavian Amphitheatreया Amphitheatrum Flavium, जो रोमन साम्राज्य की अनेक गाथाओं को अपने भीतर समेटे हुए शहर के बीचोबीच खड़ा है, ना जाने कितने साम्राज्यों का पतन इसने देखा, ना जाने कितनी धार्मिक आँधियाँ सहीं, और भूकम्पों से टकराया, लेकिन भग्नावेश में भी धरती का आश्चर्य बना हुआ है। इसका निर्माण 70 और 72 AD साम्राट Vespasian द्वारा आरम्भ किया गया और निर्माण पूरा हुआ 80 AD में सम्राट Titus के शासन काल में पूरा हुआ। Amphitheatrum Flavium नाम Vespasian और Titus सम्राटों के पारीवारिक नामों पर पड़ा।
हम लोग कोलोसियम के बाहर टिकिट की लाइन में खड़े हुए। रोबर्टों चोहत्तर बरस के हैं, लेकिन अपनी उम्र से कम लगते हैं। रोम में पैंसठ साल के ऊपर के लोगों को टिकिट नहीं देना पड़ता है। लेकिन रोबर्टो अपना परिचय पत्र साथ रखते हैं, जिससे उनकी असली उम्र के बारे में पता चल सका। जब वे खिड़की पर पहुँचते हैं और मेरे लिए एक टिकिट खरीदकर अपने लिए पास माँगते हैं तो खिड़की के भीतर बैठी महिला आश्चर्य से कहती है, लेकिन आप तो सीनियर सिटिजन नहीं लगते। रोबर्टो अपना परिचय पत्र निकालकर दिखाते हैं। दोनों में इतालवी भाषा में संवाद होता है। एक हल्का फुलका मजाक भी हुआ।
मैं देखती हूँ कि रोम में लोग काफी खुल कर हँसी मजाक कर लेते हैं। रोबर्टों तो हर किसी से बेहद खुल कर बात करते हैं, चाहे वह टैक्सी ड्राइवर हो या दूकानदार। उनकी आत्मा उस नगर में रची बसी है। कोलोसियम का टिकट नौ यूरो का था जो करीब साड़े पाँच सो का हो जाता है, जब से मेरे पैसे खोये , मैंने अपने पास पैसे रखने बन्द कर दिए। चलने से पहले मैं पैसे रोबर्टों को संभलवा दे देती हूँ, शाम को वे बता देते हैं कि कितने पैसे बाकी हैं। रोबर्टो रिटायर्ड हैं, उनकी पत्नी को देख कर यह लगता है कि उनका महिने का खर्चा काफी होता होगा, इसलिए मैंने इस बात का ध्यान रखा कि रोबर्टों का खर्चा ना हो। रोबर्टो भी बेहद संभल कर खर्च कर रहे थे। ों
हम लोग कोलोसियम की सीढ़ियों पर चल कर ऊपर जाते हैं, पतली संकरी सीढ़ियाँ लखनऊ की भूल भुलैया की सीढ़ियों की याद दिलाती हुई सी।
कोलोसियम की अर्धचक्राकार आकृति का है जिसकी लम्बाई करीब 640 रोमन फीट और चौड़ाई 528 रोमन फीट है , इसके आधार का क्षेत्र फल 24000 मीटर स्कायर है। बाहरी दीवारों की ऊँचाई 165 रोमन फीट है । इसके अर्धचन्द्राकार थियेटर में जाने के कई रास्ते हैं, जिससे यह आपदावस्था मे आसानी से खाली किया जा सके। इसमें एक वक्त में करीब 50,000 लोग बैठ सकते थे। इसके अस्सी द्वार हैं, जिनमें से छहत्तर आम आदमी के लिए थे. और बाकी चार राजकीय दर्शकों के लिए थे।
कोलोसियम रोम के क्रूर मनोरंजन की गाथा कहता है। यहाँ दासों को जंगली जानवरों से लड़वाया जाता था। थियेटर के नीचे की मंजिल में क्रूर जानवर रखे जाते थे, जिन्हें दक्षिण अफ्रीका के जंगलों से पकड़ कर लाया जाता था। दूसरी ओर दासों को पाला जाता था। लड़ाई एक पक्ष की मृत्यु तक चलती थी। जीतने वाले की जिंदगी भी राजा के हाथ में होती थी।
रोबर्टो जब कथा कह रहे थे, मेरा रोम रोम सिहर रहा था. क्रूर मनोरंजन भारतीय संस्कृति में नहीं के बराबर रही है। मुझे लगा कि यही कारण होगा कि भारत अंहिसा को स्थान मिला और कई धर्मों का उदय भी हुआ।
कोलोसियम के ऊपर म्यूजियम था, जिसकों देखने में काफी वक्त बीत गया। रोबर्टों इतिहास से गुजरे व्यक्ति हैं, वे लगातार कुछ ना कुछ बताते जा रहे हैं, जैसे कि यहूदियों के दास बनने की कथा, तरह तरह के दरवाजे जहाँ पर राजाओं ने अपनी विजय के चिह्न खोदे हैं। मेरा दीमाग सुन्न होता जा रहा है, बस एक दृश्य दिखाई दे रहा है - दर्शकों की बहशी चीखें, भूखे जानवरों की पीड़ा और दासों का जीवन संघर्ष....
सवाल यह है कि हम अपनी क्रूरता को पीछे छोड़ आए या फिर आज भी नकली मुखौटे में छिपाए हुए हैं।
कोलोसियम कई बार टूटा, कई बार बनाया गया, युद्धों से लेकर भूकम्पों तक ने इसे चकनाचूर करने की कोशिश की, लेकिन आदमी सर्वविजयी बनने की आकांक्षा की तरह पूर्णतया नष्ट नहीं हो पाया। एकड़ों भूमि में पसरा इस थियेटर में आज भी मृतकों की चीखें घूमती होंगी। कहा जाता है यहाँ खेले गए क्रूर खेलों में कम से कम 5000.000 मनुष्य और एक लाख जानवर मारे गए होंगे। मुझे अपने देश के पुरी के खंडहर याद आते हैं, जहाँ पर चीखों की जगह संगीत की लहरें उभरती रही हैं। कहा जाता है कि यहाँ पानी भर कर सामुद्रिक खेल भी खेले गए।
हम कोलोसियम की छत पर जाते हैं जहाँ से पूरा कि पूरा रोम दिखाई देता है। हम महलों के भग्नावेशों गलियारों
रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ है, न जाने कितनी सदियों की गाथा है इसमें। हम लोग खंडहरों के बीच घूमते घूमते न जाने किस इतिहास के दरवाजे में घुसते हैं, और न जाने किसमें से बाहर निकलते हैं। हर सम्राट अपनी जीत की कथा दरवाजा बनाकर लिखता है, सोचता होगा कि वह इन दरवाजों के द्वारा इतिहास की अमिट रेखा बन जाएगा, रोबर्टों हर युद्ध के परिणाम विजय द्वार के बारे में बताते हैं। दरवाजों पर खुदे विजय चिह्नों को समझाते हैं, कुछ दरवाजे टूट फूट गए, कुछ अभी भी बाकी हैं, मेरे दीमाग में नाम नहीं घुसते, बस युद्ध का घोष घुन्नाता है।
कान सुन्न होने लगे हैं, मन खट्टा हो रहा है,,, हम लोग लौट आते हैं, रात को रीटा के घर खाना है, उससे पहले वियना के लिए टिकिट भी बुक करना है, सहगल यह छोटा सा काम कर सकते थे, लेकिन उनका ध्येय बस अपने खाने पीने के साथ अपना ख्याल रखना है। वे सारे दिन बाजारों में भटक कर शाम को रीटा के घर चले आए होंगे। कोलोसियम आदि जाने के लिए टिकिट की जरूरत है, जिसे वे नहीं खरीदेंगे। मुझे मालूम है, कोलोसियम जमीन पर ही नहीं मनों पर भी खड़े होते हैं।
घर लौट कर हम तीनों, मैं रोबर्टो और पोला रीटा के घर के लिए कार में चलते हैं, रोबर्टों अभी भी रोम की कथा कह रहे थे। रीटा का घर रोम का नये बसे हिस्से में था, इसलिए कुछ नए तरीके का था। मैं रोबर्टों से पूछती हूँ कि रोम में किसी भी जगह पंखे नहीं दिखाई दिए, जबकि मौसम थोड़ा गरम ही है। वे बताते हैं कि रोम में पंखे तो उन्होंने अपने बचपन से नहीं देखे, आजकल ज्यादातर घरों में ए सी होते हैं, लेकिन पंखो का चलन कभी नहीं रहा। हम रोम के नए हिस्से में आ पहुँचे हैं, यहाँ पर रोम आम शहर सा लगने लगा है। रोबर्टों बताते हैं कि शहरी इलाके में इमारत में एक ईंट तक लगाने के लिए सरकार से इजाजत लेनी पड़ती है, लेकिन बाहरी इलाके में इमारते आम शहरों जैसी हो सकती हैं।
रीटा के घर में तीन चार परिवार इक्कट्ठे हुए हैं, सभी इतालवी भाषा में बात कर रहे थे। बीच बीच में एंजिलो और रोबर्टों अंग्रेजी में कुछ वाक्य समझा देते। खाना लजीज था, बात चीत काफी लम्बी चली, मेरी आँखे मुन्दने लगी तो मैं करीब बिछे सोफे में जाकर लेट गई, और अनायास सो गई।
काफी रात गए हम घर लौटे।
अगले दिन रोबर्टो काफी पहले तैयार हो गए, हम दस बजे वेंटिकन सिटी के लिए निकल पड़े। रोम आओ और वेंटिकन सिटि ना जाओ , ठीक नहीं होगा। रोबर्टों को किफायत से चलना आता है, इसलिए बसों का प्रयोग कर लेते हैं। सबसे पहले हम त्रिस्तेवर में स्थित एक चर्च Sancrisogono में गए, जिसके प्रति रोबर्टो को विशेष ममता है। वे यद्यपि यहूदी है,, उनकी पत्नी ईसाई हैं, और इस चर्च से जुड़ी हैं। यूरोप के चर्चों की भव्यता देखते ही बनती है। रोबर्टो चर्च के उन हिस्सो को दिखला रहे थे, जो रोमन मन्दिरों के भग्नावेशों से बनाए गए थे। मेरी बड़ी इच्छा थी कि रोमन मन्दिर देखा जाए, लेकिन कोई भी मन्दिर अपने मूल रूप में नहीं है। चर्च जाने के लिए जो सड़क थी उसमें गाड़ियों का प्रवेश वर्जित था। यूरोप के मकान करीब करीब एक सी शैली के हैं, उन्हें देख कर मुझे बीकानेर की हवेलियाँ याद आगईं।
इसके बाद हम सान्त मरिया इन त्रस्तेवर गए, यह बेहद पवित्र स्थान माना जाता है, चर्च की नक्काशी के साथ साथ चर्च के पिछले भाग और डोम में बनी काँच की कामगारी भी बेहद मनोहर थी। सबसे महत्वपूर्ण चीज थी टाइल्स को जोड़ कर बनाई गई नक्काशी जो दूर से पेन्टिंग का आभास दिलाती हैं।
मैंने वहाँ से मारिया की एक पेन्टिंग खरीदी। उसे देख रोबर्टो चिल्ला उठा, अरे यह कैसे हो सकता है? घर पर देखना, मेरी मेज पर यही तस्वीर रखी है. मैं हँस पड़ी।
इसके बाद रोबर्टों ने तुरन्त टैक्सी की और वर्तीकन सिटी चले आए। वर्टीकन सिटि के बारे में कौन नहीं जानता, पोप का साम्राज्य है यह। इसका निर्माण सेन्ट पीटर स्काअर का इतना विशाल अहाता और लाखो की संख्याँ में लोग। फुटबाल मैच चल रहा था, इसलिए पर्यटक ही नहीं फुटबाल प्रेमी भी लाखों की तादात में थे। मेरी तो साँस फूल गई, इसे देखना शुरु किया तो रात हो जाएगी। रोबर्टो कहने लगे कि यहाँ आकर यदि म्यूजियम नहीं देखा तो क्या फायदा। हम लोग लाइन में खड़े हुए, मैंने देखा कि लाइन बेहद लम्बी है तो मैं चुपचाप आगे की ओर बढ़ गई, रोबर्टो भी लपक कर आए और पूछने लगे, अरे तुम कहाँ जा रही हो, मैंने हँस कहा कि भारतीय बुद्धि का इस्तेमाल कर रही हूँ । रोबर्टो समझ गए और हँसने लगे। थोड़ी देर में रोबर्टो ने बड़ी कुशलता से दो बार लाइन में आगे बढ़ने में सफलता प्राप्त कर ली। मैं यह देख कर हँसने लगी तो कहने लगे कि हम इतालवी लोग भी यह सब चतुराई जानते हैं।
किसी तरह से हम म्यूजियम के भीतर पहुँचे, तो मेरी आँखे चकाचौंध हो गई। बेहद भव्य म्यूजियम, उसकी छत भी इतनी खूबसूरत कि कुछ कहा नहीं जा सकता। इतनी बड़ी बड़ी मूर्तियाँ कि आदमी उसके सामने बौना लगे। रोबर्टो को हर मूर्ति के बारे कुछ ना कुछ पता है, लेकिन मेरा दीमाग नहीं चल रहा है। मैं तो केवल सौन्दर्य और शिल्प में खोई हुई हूँ। अन्ततः हम एक भव्य शिल्प के सामने जा खड़े हो जाते है " पिटी" , करुणा को सकार करती माँ मेरी जख्मी पुत्र की देह को गोद में लिए। रोबर्टो पोप का इतिहास भली भाँति जानते हैं, वे एक एक पोप का नाम लेकर उनके बारे में बताने लगे। उन्हे इस बात का आश्चर्य था कि मुझे इसाई संस्कृति के बारे में इतनी कम जानकारी है। आज मेरा कैमरा काम नहीं कर रहा था। लेकिन मन की आँखे प्रफुल्लित हो रही थी। हाँ याददाश्त इतनी तेज नहीं कि सारे नाम याद हो जाएँ। फिर भी बड़ा अच्छा लग रहा था़ आज मुझे शाम के छह बजे तक गाड़ी पकड़नी थी वियेना के लिए, सुबह सारा सामान बाँध कर आई थी, लेकिन समय की पाबन्दी तो थी। करीब दो घण्टे म्यूजियम में बिताने के बाद बाहर आए तो बेहद भूख लगी थी। हम लोग वर्टिकन सिटी की परिधि के तुरन्त बाहर बने होटल में जा कर बैठ गए। ये होटल करीब करीब वैसे ही थे जैसे कि भारत के किसी पर्यटन स्थल में होते हैं। मुझे यरोप का मिक्स्ड सलाद बेहद पसन्द आता है, मैंने वही लिया। सलाद अच्छा था। इसी बीच कई लोग आए, आबनूस से काले अफ्रीकी जो कि घड़ियाँ बेच रहे थे। रोबर्टो बता रहे थे कि वे रात रात बैठ कर खुद घड़ियाँ बनाते है और दिन भर बेचते हैं। मैंने देखा कि उनके आबनूसी रंग में भी बेहद खूबसूरती है। रोबर्टो की पत्नी पोला ने फोन कर के पूछा कि हम लोगों ने क्या क्या देख लिया, उन्होंने रोबर्टों को हिदायत दी कि रति को फन्ताना दित्रेवी जरूर ले जाना और फव्वारे में एक सिक्का अवश्य डलवाना।
खाने के बाद हम फन्ताना दि त्रेवी ( Fountain di Trevi) के लिए निकल पड़े, रोबर्टों कई शार्ट कटों को जानते हैं, रास्ते मे हमने चमड़े के सामान की दूकाने देखीं, साथ ही फैशन के सामान से भरी दूकाने देखीं। दरअसल मैं विण्डों शापिंग की आदि नहीं हूँ, खरीददारी करने का शौक पाला हीनहीं, इसलिए दूकानों पर ध्यान नहीं दे रही थी। रोबर्टो ने मुझे रोक कर कहा - मैं देख रहा हूँ कि तुम दूकानों की ओर झाँक भी नहीं रही हो। तुम्हे मालूम होना चाहिए कि इटली, विशेषतया रोम फैशन के लिए विश्व प्रसिद्ध है, यहाँ साधारण आदमी भी अच्छे कपड़े पहनना पसन्द करता है। मैंने दूकानों पर ध्यान देना शुरु कर दिया। कोई सन्देह नहीं कि इटली के फैशन का कोई मुकाबला नहीं। चमड़े का सामान तो बेहद खूबसूरत , लेकिन सब कुछ इतना महंगा कि देखने में भी डर लगे। मेरे पैसे नहीं खोये होते तो शायद चमड़े का सामान जरूर खरीदती। रोबर्टों भीड़ से परेशान थे, कहने लगे कि फुटबाल मैच नहीं होता तो ज्यादा अच्छी तरह से घूमा जा सकता था। लेकिन मेरे लिए तो यह भी दर्शनीय था, यूरोपीय फुटबाल प्रेम को जानती हूँ, लेकिन लोगों के पागलपन की साक्षी पहली बार हो रही, चेहरों पर अपनी अपनी टीम के झण्डों के रंगों को पोत लोग जिस मानसिक अवस्था में थे, वह कम रोचक नहीं था। यह उन्माद भरी अवस्था म, दोनो मनुष्य को ऊर्ध और पतन दोनो ओर ले जाती है।
फन्ताना दि त्रेवी ( Fountain di Trevi)में जब हम पहुँचे, जगह ठसाठस भरी थी, खासतौर से फुटबाल के प्रशंसकों से। सभी झरने में पैर डाले बैठे थे। मैंने पर्स की तली से पैसा निकाला और झरने के पानी में उछाल दिया। माँगा क्या? शायद याद नहीं, हो सकता है कि कुछ माँगा ही ना हो। रोबर्टों भीड़
सान्ता मरिया अराचेली अगला पड़ाव था, । रोबर्टों ने बताया कि अरा का मतलब है मन्दिर और चेली का अर्थ आसमान, यह चर्च इतनी ऊँचाई पर है कि इसे आसमान का मन्दिर कह जाने लगा। चर्च में अनेक सीढ़ियाँ थीं, यूरोपीय चर्चों में स्वर्ग की विशिष्ठ भूमिका रही है। अधिथकतर चर्चों के गुम्बद के भीतरी भाग में खूबसूरत चित्रकारी की जाती है, चर्चों की ऊँचाई स्वर्ग तक पहुँचने की भावना की परिचायक रही होगी। अराचेली के चर्च की सीढ़ियों को स्वर्ग की सीढ़ियों तुलना की गई होगी।
Mausoleum of Hadrian जो कि Castel Sant'Angelo कहलाता है , को हम आते जाते देखते आए थे, लेकिन आज हम इसके भीतर भी गए। दरवाजे पर हमारा स्वागत आदम कद एंजिलो ने किया, जो ईसाई कथाओं में विशेष महत्व रखते हैं। हम म्यूजियम में जाना चाहते थे, लेकिन वह मरम्मत के लिए बन्द था। हम इमारत के अहाते में घूम घूम कर भव्यता को अनुभूत करने लगे। पर्यटन में देखना एक हद तक होता है, देखते ही वस्तु दिल में प्रवेश नहीं कर पाती है। उसे ानुभव करना पड़ता है। रोबर्टो बता रहे थे कि Castel Sant'Angelo में लोग पोप के दर्शन के लिए जाने लगे तो तेवरे नदी पर पहली बार पुल बनाया गया, यही नहीं भीड़ को सन्तुलित करने के लिए पोप ने यह नियम बनवाया कि दाँए पुल से लोग भीतर जाएंगे, और बाएँ से बाहर आएँगे। यही नियम बाद में सड़कों पर लागू किया गया।
पोप ने आस भव्य इमारत को १४ वीं सदी में किले में परिवर्तित किया और St. Peter's Basilica से एक पुल के द्वारा जोड़ दिया, जिससे आक्रमण होने पर पोप भाग कर Castel Sant'Angelo में जाकर प्राण बचा सकें।
शाम के पाँच बज गए थे, मुझे साड़े छह बजे की ट्रेन पकड़नी थी। हम लौटने ही वाले थे कि रोबर्टों ने कहा कि एक महत्वपू्ण चीज देखे बिना तुम नहीं लौट सकती हो। उन्होंने तुरन्त बरकासिया BARCACCIA के लिए टैक्सी की ली। यहाँ एक फव्वारा था, जहाँ का पानी सभी लोग पी रहे थे। रोबर्टों ने कहा रोम आने वाले सभी को इस फव्वारे का पानी पीना चाहिए, यह पाप नाशक माना जाता है। मुझे शपने देश की गंगा बेहद याद आई। यह फव्वारा नौका की आकृति का है। इस फव्वारे से सीढ़ी चढ़ कर चर्च था। सीढ़ियाँ इस तरह से बनाई गईं थी कि यहाँ बैठने पर फव्वारे को अनूभूत किया जा सके। तभी रोबर्टों कहने लगे। मैं तुम्हे यहाँ इसलिए नहीं लाया कि फव्वारे का जल पिया जाए, बल्कि इसलिए कि तूम महान कवि कीथ का घर देख सको। सीढ़ियों से सटी एक इमारत थी, जिसमें कीथ ने अपने जिन्दगी के कई बरस बिताए थे। मुझे लगा कि रोम तो मैंने पहली बार देखा है।
समय काफी कम रह गया था, हम लोग बस पकड़ के तेजी से घर आए, और सामान को लेकर ट्राम से ही रेलवे स्टेशन पहुँचे। रोबर्टों ने फुर्ती से मेरे लिए रात का खाना खरीद कर कम्पार्टमेण्ट तक पहुँचा जरूर होया। तभी रीटा और एंजिलो भी आ पहुँचे। सब कुछ ५तना सुयोजित हुआ कि मैं पासपोर्ट खोने की बात ही भूल गई..
अलविदा रोम! फिर आऊँगी, क्रूर जरूर हो, फिर भी कुछ ना कुछ आकर्षण है ही, जो सबको तुम्हारी ओर खींचता है।
2009/07/05
आल्प पहाड़ों के ऊपर


ओस्ला हवाई अड्डे से जब रेन एयर के हवाई जहाज पर चढ़ी तो काफी थकान लगने लगी थी। जान ने हवाई अड्डे तक छोड़ दिया था। लेकिन हवाई सुरक्षा प्रक्रिया और फ्लाइट का इंतजार कम थकावट भरा नहीं होता है। मैं खिड़की सीट पर बैठते ही आँख बन्द कर के सुस्ताने लगी तो एक लड़की ने वहाँ पर बैठे के लिए पूछा। उस के साथ एक बेहद गरिमामयी महिला थीं। मैं सहर्ष उन्हे बैठने को आमन्त्रित करती हूँ। वे गरिमामय महिला मेरे पास बैठ जाती हूँ। बातचीत शुरु होती है तो पता चलता है कि वह युवती ओस्लों में नौकरी करती है लेकिन इटली की नागरिक है। उसकी माँ इटली में रहती हैं, और अपनी बेटी से मिलने ओस्लों आई थीं। अब दोनो माँ बेटी कुछ दिनों के लिए घर लौट रही हैं। माँ अंग्रेजी नहीं जानती, लेकिन बेटी बोल लेती है। हम लोग सहर्ष बाते करने लगते हैं।
दो घण्टे की यात्रा है , और यात्रा में संवाद रोटी के सा् तरकारी का काम करता है।
अचानक माँ बेटी चिल्ला उठती हैं, नीचे देखो, नीचे देखो..
मैं नीचे की ओर देखती हूं खूबसूरत पहाड़ शृंखलाएँ.. बिल्कुल लद्दाख की तरह आधी बर्फ से ढ़ंकी और आधी नंगी... कहीं नीली, कहीं सफेद झक्क... मैं अवाक ताकती रह जाती हूँ...
अब हम पहुँचने वाले हैं , वे दोनों कहती हैं।
मोन्जा में POESIAPRESENTE 2009 की प्रसीडेन्ट डोना मेरे नाम का फ्लेग लिए क्रिस्टीना के साथ इंतजार कर रही है। POESIAPRESENTE 2009 मोन्जा के युवा कलाकारों द्वारा चलाए जाना वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम है जो करीब करीब पूरे वर्ष क्रिया शील रहता है। पिछले वर्ष फेदरिको ने मेरी कविताओं का अनुवाद इतालवी में किया था, और पुस्तक के रूप में छपवाया था। उसी को पढ़ कर मुझे इस फेस्टीवल में भाग लेने के लिए विशेष रूप से बुलाया गया था। मेरा परिचय ना तो फेदरिको से था, ना ही इन युवा कर्मठ कलाकारों से। इसलिए मैं इस बुलावे को बड़े महत्व से देख रही थी। मैंने इटली में कविता ०र अन्य कलाओं की सथीति के बारे में बात की तो डोना बताने लगी कि यूरोपीय युवकों पर अमेरिकन संस्कृति का प्रभाव ज्यादा पड़ने लगा है। खाना पीना, मस्ती मारना ही जीवन का उद्देश्य रह गया है।
मैं अपने देश के बारे में क्या कहती...
स्थिति सब जगह एक सी है। इतालवी संसार एक वक्त कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में विशेष महत्व रखता था। रोमन संस्कृति में कला को भी प्रश्रय दिया गया था। विशेष रूप से शिल्प कला और वास्तु में यह संस्कृति बेजोड़ योगदान दे पाई। आज इटली का फैशन विश्व प्रसिद्ध है। मोन्जा तो फार्मूला वन कार रेस के लिए विश्व प्रसिद्ध है, इसे अमीरों की नगरी माना जाता है। इसी जगह में रहते हुए कला की बागडोर को चलाना इतना सहज तो नहीं। मुझे लगा कि इन युवकों को अपनी काफी शक्ति इस में खर्च करनी पड़ती होगी.. उन्होंने ने मुझे एक होटल में टिकाया, जो बेहद छोटा सा, लेकिन साफ सुथरा था।
स्थिति सब जगह एक सी है। इतालवी संसार एक वक्त कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में विशेष महत्व रखता था। रोमन संस्कृति में कला को भी प्रश्रय दिया गया था। विशेष रूप से शिल्प कला और वास्तु में यह संस्कृति बेजोड़ योगदान दे पाई। आज इटली का फैशन विश्व प्रसिद्ध है। मोन्जा तो फार्मूला वन कार रेस के लिए विश्व प्रसिद्ध है, इसे अमीरों की नगरी माना जाता है। इसी जगह में रहते हुए कला की बागडोर को चलाना इतना सहज तो नहीं। मुझे लगा कि इन युवकों को अपनी काफी शक्ति इस में खर्च करनी पड़ती होगी.. उन्होंने ने मुझे एक होटल में टिकाया, जो बेहद छोटा सा, लेकिन साफ सुथरा था। रात को हमने पहली बार इटली का पीजा खाया... ऐसा लगा कि बड़ी सी रोटी पर सब्जिया चुपड़ दी गई हों.. मैक्डोनल आदि में मिलने वाले पीजा से काफी अलग स्वाद..
मोन्जा में नोर्वे के मुकाबले काफी गर्मी थी, पता नहीं छकान के कारन या फिर पीजा के कारण मुझे रात में ही बुखार चढ़ गया, मैंने डोना को कह दिया था कि में मोन्जा में घूमने के बाद अपने आप थियेटर पहुँच जाऊँगी, इसलिए बुकार के कारण थोड़ी चिन्ता तो हुइ, लेकिन मैं पाने साथ दवाएँ लाई थी, तुरन्त ही एण्टी बायटिक की खुराक शुरु कर दी। सुबह सात बजे तक मैं नीचे उतर आई, और नाश्ता करके मोन्जा की गलियों में भटकने चल दी।
मोन्जा की विशेषता पूछने पर दो तीन चीजें महत्वपूर्ण बताई गईं थीं, रोज गार्डन, राजभवन जिसे वे लोग बिग हाउस के नाम से पुकारते हैं और सबसे ज्यादा महत्व है


Monza Cathedral or Duomo di Monza. मिथक के अनुसार इसका निर्माण इटली की रानी Theodelinda रानी ने करवाया था। जब वे आल्प पहाड़ियों को पार कर Lambro नदी के पार आई तो एक कपत ने उन्हे चर्च बनानाे की जगह दीखाई। आरंभ में इस स्थान का नाम Modoetia था। इस निर्माण का समय ईसा बाद 595 बताया जाता है। लेकिन समय समय पर इस चर्च का उद्धार होता रहा, ०र आज यह इटली के खूबसूरत चर्चों मे से एक माना जाता है।


Monza Cathedral or Duomo di Monza. मिथक के अनुसार इसका निर्माण इटली की रानी Theodelinda रानी ने करवाया था। जब वे आल्प पहाड़ियों को पार कर Lambro नदी के पार आई तो एक कपत ने उन्हे चर्च बनानाे की जगह दीखाई। आरंभ में इस स्थान का नाम Modoetia था। इस निर्माण का समय ईसा बाद 595 बताया जाता है। लेकिन समय समय पर इस चर्च का उद्धार होता रहा, ०र आज यह इटली के खूबसूरत चर्चों मे से एक माना जाता है।
यह अद्भूत ही लगता है कि एक ओर कट्टर धार्मिकता युद्ध का कारण रही है तो दूसरी ओर कला और संस्कृति की पोषिका भी। शिल्प कला को तो सबसे ज्यादा प्रश्रय धर्म ने ही दिया है।
चर्च की दूसरी बात जो आकर्षित करती है वह इमारत के भीतर की सान्ति, अथवा अनुशासन..मैं हर कोण से चर्च को देख रही थी, प्रमुख द्वार, प्रमुख चैपल, भीतरी डोम, जिसे स्वर्ग की शैली में निर्मित किया जाता है, भीतर बने बेहद खूबसूरत भित्ती चित्र..
ना जाने क्यो, अपने जीवन में कभी कभार मन्दिर जाने वाले, व्रत उपवास आदि से परहेज रखने वाली मैं इन धार्मिक इमारतों 

से बेहद प्रभावित हो जाती हूँ, बस अपलक देखती रह जाती हूं, यह चित्र, वह मूर्ति, यह रंगीन काँचों से बने चित्र...


से बेहद प्रभावित हो जाती हूँ, बस अपलक देखती रह जाती हूं, यह चित्र, वह मूर्ति, यह रंगीन काँचों से बने चित्र...
मुझे लगता है कि यदि हम धर्म में से युद्ध को निकाल बाहर करें, धोड़ी उदारता और भर दें, तो संभवतया ये मानव की सबसे खूबसूरत कलात्मक मानसिकता का परिचायक बन सकती है। लेकिन इतिहास इस रोमान्टिकता मं ज्यादा देर रहने नहीं देता। धार्मिक अंधविश्वा, अंध भक्ति, क्रूरता भी तो इसी का दूसरा रूप है। कुच भी हो , मैं च्रर्च की खुबसूरती से भीतर तक भींज चुकी हूं..
इस भीगे पन में मेरी के सामने मोमबत्ती भी जला देती हूँ।
अब मैं राज महल की ओर चलने लगती हूं, जिससे रोज गार्डन सटा हुआ है। बाजार के भीतर से गुजरते हुए मुझे मोन्जा की फैशन संस्कृति का पूरा परिचय मिल रहा था। मैं हर दूकान को ध्यान से देख रही थी, बेहद खूबसूरत लेकिन बेहद महंगी वस्तुओं से सामान अटा पड़ा था। मैं सोच रही थी कि इस तरह के बाजार केवल पैसे वाले लोगो के लिए होते हैं, तो फिर क्या गरीब नहीं तो कम पैसे वाले लोगों के लिए कुछ नहीं है। नोर्वे की अपेक्षा भोजन की वस्तुएँ ज्यादा लुभावनी लग रही थीं। गलियाँ पतली पतली थी, लेकिन खास यूरोपीय शैली में ईंटों से बनी थीं। युरोप की खास बात यह है कि यहाँ लोग पैदल चलना बेहद पसन्द करते हैं। बाजार में कारें ना के बराबर थीं। ज्यादातर लोग पैदल ही चल रहे है। यही अन्तर है अमेरिकन और यूरोपीय संस्कृति में, अमेरिका आधुनिकता के पीछे भागते हैं, तो यूरोपीय अपनी संस्कृति को बनाए रखने में कटिबद्ध हैं, वे आधुनिकता को स्वीकारते तो हैं, पर एक हद तक। जहाँ तक युवकों की स्वतन्त्रंता का सवाल है तो दोनों संस्कृति में कोई अन्तर नहीं है।
कुछ देर में मैं रोज गार्डन पहुँची तो मेरा बुखार फिर सिर उठाने लगा। पीछे एक लम्बी सी इमारत थी, जिसके बारे में बताया गया कि वह राजभवन है, लेकिन आज कल पर्यटकों के लिए खुला नहीं है। देखने में वह इमारत राजस्थानी रजवाड़ों के सम्मुख बेहद सामान्य सी लगी। मैं चुपचाप एक बैंच पर बैठ गई। मैंने देखा कि रोज गार्डन में आने वाले ज्यादातर लोग उम्रदार थे। युवाओं को कहाँ फुरसत होगी, कोमलता की दुनिया में आने की। रविवार का दिन था, लोग चलते चलते रोजगार्डन चले आए होंगे। उस वक्त वहाँ गुलाबों की विश्व प्रदर्शनी लगी हुई थी , कई देशों के झण्डे थे, लेकिन भारत का नहीं था।
एक प्रौढ़ दम्पत्ति आकर मेरे पास बैंच में बैठ गए, मेरा रंग मेरी नस्ल की चुगली कर ही देता है। उन्होंने पूछा क्या इण्डिया से आई, मेरे हाँ कहने पर बात करने लगे.. कब आए, कैसे आए...
मैंने उनसे राजभवन के बारे में पूछा तो कहने लगे, कुछ वर्ष पहले तो यह किराए पर दिया जाता था, लेकिन आजकल बन्द है, शायद मरम्मत चल रही है।
किराए पर किसलिए, मैंने पूछा तो कहने लगे कि शादी आदि की पार्टी के लिए दिया जाता था। फिर अपने आप वृद्ध पुरुष बताने लगे - मेरी बेटी ने अपनी शादी के लिए राजभवन का हाल ही चुना था। बहुत महंगा था, फिर भी मैंने उसकी बात मान ली। जब मैं उसे शादी के लिए कार में लेकर आ रहा था, तब भी उससे पूछा कि क्या वह अपनी शादी के लिए पूरी तरह से तैयार है।
मेरी बेटी बोली कि हाँ मैं इसी लड़के से शादी करूंगी। लेकिन चार साल बाद ही वे अलग हो गए।
वृद्ध ने उसांस भरते हुए कहा। पिता कहीं भी हो, उसका दर्द एक सा होता है, उसकी इच्छा भी। सन्तान खुश रहे, और उसके झीवन में स्थिरता रहे, इससे बड़के क्या खुशी हो सकती है।
बारह बजने को आये , मैं बिनेरिया सात थियेटर हाल की ओर चलने लगी, वहीं पर मुझे लंच लेना था। रास्ते में बड़ी बड़ी दुकानें, तरह तरह की ब्रेड और पीजा वाली दूकानें, चित्रों की प्रदर्शनी आदि को पार करते हुए ऐसी जगह पहुँची जहाँ पर एक मैदान में बहुत से पेड़ लगे थे़ मैंने देखा कि सारे पेड़ एक सीध में थे, सभी ऊँचे, लम्बे और कम घने। शहर के बीचोंबीच वन जैसा दृश्य बेहद लुबावना लगा।
बिनेरिया थियेटर पहुँचते ही डोना , क्रस्टिना ने स्वागत किया। कुछ देर में एलोनेरा भी आ गई, साथ में फैदरिकों था। मैंने फैदरिको को कभी नहीं देखा था, ज्या बातचीत भी नहीं हुई थी, बस जब कभी उसे मेरी कविता के बारे में कुछ पूचना होता, वह दो चार पंक्तियाँ लिख देता था।
एलोनेरा उसकी मित्र थी, बेहद सुन्दर और थोड़ी माँसल लड़की। यही पंजाबी कपड़े पहन ले तो पूरी पंजाबन लगे। उसने हँस कर स्वागत किया। फैदरिको झैंपा सा दूर खड़ा रहा, मुझे लगा कि वह बेहद आत्ममुखी लड़का है, जो केवल शब्दों की दुनिया में ही खूल पाता है। वह एक स्कूल (यूरोप में कालेज को लिए भी स्कूल शब्द का प्रयोग होता है)
थोड़ी देर में मैंने और फैदरिकों ने कविता के बारे में चर्चा की कि कौन कौन सी कविताए पढ़ी जाएँगी, और कैसे पढ़ी जाएंगी।
फिर हम खाना खाने गए, खाना स्वादिष्ट जरूर होगा, पर मैं बुकार के मारे स्वाद नहीं ले पा रही थी। सुबह से चलते चलते थक भी गई थी। POESIAPRESENTE 2009 का कार्यक्रम सुबह से सुरु हो गया था, अनेक कार्यक्रम थे, सिम्पोजियम, इटली के फैस्टिवल डायरेक्टों के विचार, कविता, फिल्म, कला आदि ना जाने कितने विचार।
पूरा कार्यक्रम इतालवी भाषा में हो रहा था। मुझे लगा कि यदि मैं थोड़ा आराम कर लूंगी तो ही रात तक ठीक रह पाऊँगी। मैंने आयोजकों को अपना विचार बताया, उम्होंने मुझे कार से होटल छुड़वा दिया। होटल में आकर मैं फिर से दवा खाकर सो गई।
शाम को ६ बजे डोना मुझे लेने आ गई। इटेली के फैसन संसार को देख कर मैंने अपने साथ लाई काले रंग की साड़ी का उपयोग करने की सोची।
शाम को तैयार हो कर जब थियेटर पहूँची तो हर कोई साड़ी देख कर खुश था।
उस वक्त फैस्टीवल डायरेक्टरों का संवाद चल रहा था। मुजे भी कृत्या फेस्टीवल के डायरेक्टर के रूप में कुछ बोलने के लिए कहा गया था। सभी लोग इतालवी भाषा मेा बात कर रहे थे। सभी की चिन्ता कला और कविता के पुर्जीवन को लेकर थी। जिस बात ने मुझे आकर्षित किया कि अधिकतर डायरेक्टर युवा थे। मुझे लगा कि इटली पने प्राचीन गौरव को अवश्य पा लेगा, क्यों कि उनके रक्त में अभी भी कला के प्रति जुनून है।
थियेटर काफी बड़ा था, लेकिन उसमें मुश्किल से 40-50 लोग बैठे थे।
जब मेरी बारी आई तो मैंने धोड़े शब्दों में कृत्या के कार्यक्रमों के बारे में बताया, और यह बताया कि हालांकि भारत के इतिहहास में कविता को गौरवमय स्थान प्राप्त है, लेकिन कला के क्षेत्र में अब भी काम करने की गुंजाइश है। अब भी हम सिनेमा और क्रकेट के सामने हार जाते हैं।
मुझे से एक संवाददाता ने सवाल पूछा कि क्या मेरे फैस्टिवलों मे श्रोताओं की संख्या अच्छी होती है।
यह एक ऐसी समस्या है जिसे पूरा विश्व जूझ रहा है, मैंने मुस्कुरा कर कहा कि हाँ पिछले दो फैस्टीवलों में संख्या काफी थी लेकिन फिर भी पूरी तरह से सन्तुष्ट नहीं हुआ जा सकता है। यदि सौ श्रोता भी कविता को मिल जाए तो बहुत बड़ी बात होती है।
रात को ११ बजे रात का सेशन शुरु हुआ, थियेटर पूरी तरह से खाली तो नहीं, लेकिन इधर से भरा हुआ था। कुल मिला कर ५० लोग होंगे हाल में, आयोजक खुश नहीं थे। लेकिन वे जानते थे कि काफी दिनों बाद सूरज चमका है, लोग समुद्र तटों पर जाना ज्यादा पसन्द करेंगे, फिर भी आशा तो होती ही है।
यह इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम था, इसकी शुरुआत [A]live Poetry, to Elio Pagliarani के वीडियों इन्टरव्यू से हुई। Elio Pagliarani का जन्म 1927 में हुआ था, उन्होंने अपनी कविताओं से इतालवी संसार को झकझोर दिया था। बेहद महत्वपूर्ण फिलंम थी, एक कवि अपने समय से गुजर कर बीत जाने के कगार पर खड़ा है , वह कभी बोलते हैं, तो कभी अपने मौन से काफी कुछ कह जाते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक The young girl called Carla से कविताएँ भी पढ़ी, केमरा उनके माथे की लकीरों, डूबी सी आँखों और कंकपाते हाथों से गुजरता हुआ दर्शकों को एक बेहद आत्मीय संसार में ले जा रहा था। किताबो के अम्बार मे बैठा यह कवि अपने वर्तमान से निकल कर अतीत में पैठता जा रहा है, अपने प्रेम, स्नेह सम्बन्धों को बेझिझक पढ़ता जा रहा है... बेहद अद्भूद अनुभव है मेरे लिए।
इसके बाद Eleonora Matarrese ने Ryck Valli के संगीत के साथ अपनी लम्बी कविता Die Welt बड़े ही ओजस्वी रूप में पढ़ीं। मैं कविता में ध्वनि और संगीत के नवीनतम प्रयोग को देख कर अचम्भित थी। यहाँ कविता शब्दों के दुहरावो, विचित्र ध्वनियों के द्वारा अपने अर्थ को बृहद आयाम दे रही थी।
इसके बाद मेरी बारी आई। मैं इस नवीन प्रयोगों को देख कर बेहद नर्वस थी। मुझे समझ में आ गया कि यहाँ कविता में इतालवी संवेदना का प्रयोग करना जरूरी होगा। फेदरिकों ने मुझे मंच पर बुलाया, और तीन प्रश्न कविता के बारे मे किए, जैंसे कि मेरी कविता में देह और काल दोनों विरोधी तत्व महत्वपूर्ण क्यों हैं, आदि...
इसके बाद मैंने अपनी कविता हिन्दी में पढ़नी शूरू की। मैंने उन कविताओं को विशेष रूप से लिया था, जिसमें प्रेम और सम्बन्धों की नई व्याख्या थी। हालाँकि हमने रिहर्सल नहीं की थी, लेकिन आश्चर्य हुआ कि फेदरिको और मेरा ध्वनि संयोजन परिपूरक था... थियेटर बेहद था। कविता पाठन के बाद फैदरिको ने आयोजकों को ढ़न्यवाद दिया। मैंने भी आयोजकों के साथ फैदरिकों को भी धन्यवाद दिया, जिस के कारण मेरी कविता को नई देह मिली।
हम दोनों खुश थे... फैदरिको कह रहा था कि बहुत दिनों के बाद एक अच्छा पाठ हुआ, एक महिला मेरे गले लग गई, कहने लगी कि मेरे रोम अबी तक खड़े हैं, तुम कविता नहीं, मन्त्र पढ़ रही थी, जिसमें स्त्री का प्रेम दर्द सभी कुछ था।
मेरे लिए इससे खूबसूरत लम्हा कौन सा हो सकता था।
फैदरिकों शायद काफी टेंशन में रहा होगा.. वह कहने लगा कि होटल में चल कर कुछ पीना चाहिये... वह एल्कोहल नहीं लेता है।
हम दोनों होतल की तरफ चल पड़ते हैं, फैदरिको बता रहा है कि किस तरह से कविता का स्तर घटता जा रहा है, कविता को कैफे आदि में पढ़ा जाने लगा है, लोग वहाँ कविता सुनने नहीं, खाने आते हैं। वह एक मजेदार किस्सा सुनाता है कि एक बार उसे कविता पढ़ने को कहा तो वह कुछ देर तक कविता पढ़ता रहा, लेकिन उसे लगा कि लोग सुन नहीं रहे हैं, बल्कि सुनने का दिखावा कर रहे हैं, तो उसने चुपके मैन्यू बुक उठाई, और कविता के अन्दाज में पढ़ना शुड़ कर दिया।
" राति, तुम्हे विश्वास नहीं होगा कि लोगो को पता ही नहीं चला कि वह कविता नहीं थी। "
हम दोनों बतियाते होतल में पहुँच गए, और जूस पीने लगे, तभी डोना और Dome Bulfaro । कुच देर बातचीत करके हम लोग अपने अपने कमरे में सोने चले गए, क्यों कि सुबह ही रोम के लिए निकल पड़ना था।
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