रतीना

2005/03/25

रंगों की अनुपस्थिति, रंगों की दुनिया में


बहुत बहुत पहले
इन्द्रधनुष के जन्म से पहले
रंगों की नगरी में
सिर्फ एक रंग था
नीला नहीं, पीला नहीं
लाल या भूरा नही
सिर्फ एक रंग
मौत की तरह बलबलाता
सन्नाटे की तरह गहराता

आग का तम्बू बना
इधर से उधर खिंचा
रंग विहीन रंग


अण्डों में तड़तड़ाईं जिन्दगियाँ
जिन्दगियों ने दिये बच्चे
रेंगते रंग घुस गये जमीन में
पत्थरों को धरा बनाते हुए
कुछ उड़ चले फड़फड़ा
आसमान की तरह छाते हुए
रंगों ने खड़ी की रीढ़
रीढ़ पर छाये पत्ते
टिक गई दरखतों के नीचे छाया
रंगों के साथ उंघती हुई


रोशनी की बून्दे टपकी
खिल उठी फूल बन
रंगों के चेहरे चमचमा उठे

रंगबिरंगे बनते हुए
रंगों का शहर बसा


रंगों से होली खेलते हुए
धरती पर रेंगती यात्राओं को भुलाते हुए
मित्रों रंगों की इस कहानी में
वे रंग ही नहीं
जो दरअसल रंग हैं

2005/03/23

कंप्यूटर, चिड़िया और प्रेम

बंद होती आँखों के बीच
जब भी मैं झगड़ने लगती हूँ
थकावट से
उतर आती है एक चिड़िया
कंप्यूटर के पर्दे पर
फड़फड़ाती, उड़ती
बैठ जाती है
शब्दों पर
इस इत्मीनान से कि जैसे
जन्मान्तर का नाता रहा हो उनसे
उस दिन वह बैठी जिस पर
मैने देखा
वह शब्द था "घर"
मेरी आँखों मे तिरने लगे
सपनों के घर
चिड़िया बेखबर सी
उड़ान को देती रही नाम
घर का, और
चुनती रही तिनके
मैं अभी तक तलाश रही थी
उसने तैयार भी कर लिया घर
इस बार उसने पंजे टिकाए
" प्रेम " पर
मैंने कबीरा को याद किया
खोजने लगी अर्थ
इस बार चिड़िया भी हैरान थी
उसने उसे चौंच से उठाया
उलटा पलटा पटक दिया
"प" को "र" से अलग किया
"म" को कुरेद कर देखा
फिर पंख फरफरा
चौंच साफ की
इधर मैंने लैयार कर ली
प्रेम की परिभाषा
अब उसके पास घर था,
मेरे पास प्रेम की परिभाषा
तभी उसका घर चहचहा उठा
वह प्रेम चुग्गा दे रही थी
मेरी परिभाषा किताबों में सो रही थी
रति सक्सेना

2005/03/22

आदमी का मशीनीकरण

संबंध टूटते जा रहें हैं
कागज से पैंसिल के
उंगलियों के अक्शरों से
पड़ोसियों से बतकहनी के

टूट रहें हैँ संबंध
खट्टी मीठी यादों से
बचकानी मुस्कानों से
मटमैली सुगंधों से

बनती जा रहीं हैं मशीनें
हाथ पैरों का विस्तार
कल्पना का आसमान
संबंधो का आधार

किसके रुके रुक पायेगा आदमी
मशीन बनने से

2005/03/21

आजादी का विस्तार

रोशनदानों को खिडकियों में बदला
खिडकियों पर पर्दे डाले
परदों ने रोशनी रोकी
दुनिया घूम ली पर्दे पर
हो गया विस्तार आजादी का

2005/03/20

भले घर की लडकियाँ

भले घर की लडकियाँ

पतंगें नहीं उडाया करतीं
पतंगों में रंग होते हैं
रंगों में इच्छाएँ होती हैँ
इच्छाएँ डँस जाती हैँ

पतंगे कागजी होती हैँ
कागज फट जाते हैँ
देह अपवित्र बन जाती है

पतंगों में डोर होती है
डोर छुट जाती है
राह भटका देती है

पतंगों मे उडान होती है
बादलोँ से टकराहट होती है
नसें तडका देती हैं

तभी तो
भले घर की लड़कियाँ
पतंगे नहीं उड़ाया करतीं

रति सक्सेना