रंगों की अनुपस्थिति, रंगों की दुनिया में
बहुत बहुत पहले
इन्द्रधनुष के जन्म से पहले
रंगों की नगरी में
सिर्फ एक रंग था
नीला नहीं, पीला नहीं
लाल या भूरा नहीं
सिर्फ एक रंग
मौत की तरह बलबलाता
सन्नाटे की तरह गहराता
आग का तम्बू बना
इधर से उधर खिंचा
रंग विहीन रंग
अण्डों में तड़तड़ाईं जिन्दगियाँ
जिन्दगियों ने दिये बच्चे
रेंगते रंग घुस गये जमीन में
पत्थरों को धरा बनाते हुए
कुछ उड़ चले फड़फड़ा
आसमान की तरह छाते हुए
रंगों ने खड़ी की रीढ़
रीढ़ पर छाये पत्ते
टिक गई दरखतों के नीचे छाया
रंगों के साथ उंघती हुई
रोशनी की बून्दे टपकी
खिल उठी फूल बन
रंगों के चेहरे चमचमा उठे
रंगबिरंगे बनते हुए
रंगों का शहर बसा
रंगों से होली खेलते हुए
धरती पर रेंगती यात्राओं को भुलाते हुए
मित्रों रंगों की इस कहानी में
वे रंग ही नहीं
जो दरअसल रंग हैं

