रतीना

2005/05/08

पिहरन

तुमने एक पिहरन सिली
मेरे लिये
मुझे इसमे बैठना है
पैठना है
फिर चाहे मेरी दौड़ को
विराम लग जाये
मेरी उंगलियों की स्याही चुक जाये
मेरे मन की
सिलाई उधड़ जाये
बिना इस सवाल के

क्या कोई भी माप नही है
मेरे लिये?

दीवारें

तुम आए
एक दीवार बन
तमाम खतरों का
सामना करने के लिये

धूप चमकी
मैं घिर गई दीवारों से

तुम उड़ गये कभी के
भाप बन

खतरे दीवारों के भीतर आ गये