एक ऋचा चप्पलोँ के लिए....
सब कुछ कड़ुवा, ट्यूब में फँसे टुथपेस्ट से लेकर घिसे हुए टुथ ब्रश तक
रात तक सब कुछ सही था, बेहिसाब सपनो वाली नीन्द
उसी में से एक सुबह तक चला आया पलकों के साथ
चप्पलों की लाइन लगी है, मैं चप्पले खोज रही हूँ,
एक से एक खूबसूरत चप्पलें, पर मेरी चप्पले नदारत
उधर सफर की उड़ान तैयार, इधर चप्पलों का अतापता ही नहीं
चप्पलों के लिए सफर छोड़ा जा सकता है क्या, मैं अपने आप पर सवाल दागती हूँ
लेकिन चप्पलों के बगैर सफर, वह भी हवाई, हवाई कल्पना से भी परे है।
यूँ भी कितने कदम चल सकती हूँ मैं चप्पलों के बिना?
चप्पले कहाँ वे मेरे पैर हैं, पिंडलियाँ हैं, घुटने हैं, और पैर?
हाँ पैर तो बस बैसाखियाँ रह गये हैं, जो एक भी कदम नहीं भर सकते चप्पलों के बिना
चप्पले मेरा व्यक्तित्व हैं, चप्पलें मेरा वजूद हैं
चप्पलें मेरी ऊँचाईँ हैं जिसकी सीढ़ी से मैं आसमान छू सकती हूँ
चप्पले मेरा वर्तमान और भविष्य है।
चप्पले मेरे परिधान की खूबसूरती हैं।
एक जेवर कम हुआ तो कोई ध्यान नहीं देगा किंतु
चप्पल की एड़ी टूटी हो तो सारी दुनिया की नजर गढ़ जाएगी
मेरी मंजिल छूट रही है, मैं चप्पले खोज रही हूँ
मेरी उड़ान हाथ से निकली जा रही है, मैं चप्पले खोज रही हूँ
मेरा भविष्य छटपटा रहा है और मै चप्पले खोज रही हूँ ।
चप्पले मेरा मंत्र हैं, मेरा शाश्वत धर्म हैं
वे खो रही हैं या मैं खुद खो रहीं हूँ?
हे इन्द्र वरुण अग्नि देव
हे समस्त दिशाओं
धरती और आकाश
मैं चप्पलें खोज रहीं हूँ
खुद को खो रहीं हूँ.
रति सक्सेना

