रतीना

2006/11/13

स्मृति‍‍--2

पहले दिन होस्टल में पैर रखा, तो कमरे की दीवारों को घूर‍‍- घूर कर देखती बैठी रही. क्या इतना फरक होता है दीवारों में, घर की जो दीवारे कभी- कभी काटती थीं, वे ही हुलस - हुलस कर बुलाने लगीं। फिर उठी, बाजार गई, और एक गदिया, एक बाल्टी ले आई। पतली सी गदिया पर पीठ टिकाई तो रोना फूट पड़ा... अचानक छोटी बेटी की याद आ गई, 6 साल बिताए थे उसने होस्टल में... और जब उसे पता पड़ा कि शादी के बाद उसे कुछ दिन डाक्टर पति के साथ होस्टल में रहना पड़ेगा तो रो पड़ी थी, माँ मेरी जिन्दगी में बस होस्टल ही है क्या... कब मिलेगा मुझे घर... मैं उसे समझाती रही कि कुछ समय इंतजार करों, सब मिल जाएगा.. आज उसका दर्द मेरे सामने चूल्हे पर रखे दूध सा उफन उफन कर बह रहा था। किस तरह का विस्थापन झेलते हैं बच्चे, रहते हुए भी ना रहते हुए।

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