छात्र जीवन में बड़ी हुलस होती थी , दुनिया नापने की, जहाँ घर के भीतर भी गिन कर कदम भरने की आज्ञा हो वहाँ दुनिया के बाहर कितने कदम भरे जा सकते हैं। उन दिनों घर से यूनीवर्सिटी तक जाने वाली बस मं बैठती तो ज्यादातर लम्बे रूट वाली बस में बैठती, खिड़की के बाहर से दौड़ती दुनिया बेहद आकर्धित करती थी। तभी मन ही मन भगवान से दुआ करती कि ..है ईश्वर मुझे इतनी लम्बी रेलगाड़ी में बिठा दे जो चलती रहे बस चलती रहे... पता है भगवान ने तथास्तु जरूर कहा होगा, तभी तो इस जगह बसी हूँ जहाँ से भारत के किसी भी कोने में जाने के लिए दो से तीन दिन तक गाड़ी में बैठना पड़ता है, ईश्वर का अचानक याद आया कि कहीं मैंने देने में कुछ कोताही तो नहीं बरत दी, तो यह निर्वासन, कि हर सोमवार को रेलगाड़ी में बैठो कम से कम छह घण्टे के लिए, और हर शुक्रवार को फिर गाड़ी में, वही छह सात घण्टे। छोटी बिटिया ने हँस कर फोन पर कहा.. माँ , भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है । अब देखो कितना लम्बा सफर मिल गया आपको, अब जब भी कुछ मांगों सोच- समझ कर माँगना।
किसी भी नई जगह का खुलना बुलबुलों के धीमे- धीमे बुझने जैसा होता है। पहले पहल बस फेन बुदबुदे, फिर कहीं जाकर असलियत। किसी ने आँखे मिलाई तो किसी ने आँखे चुराई। खाना नाश्ता सब ले लिया, जेल के केदी की तरह बिना सोचे समझे निगल भी लिया। खानपान और बोली आदमी को आदमी से अलग करने का सबसे बड़ा जरिया है। जो खाना आँते चबाती रही हैं, उस से अलग खाने में दुविधा तो होती है ही। घर थोड़े ही है कि जब मन हुआ चाय गुटका ली, जब मन हुआ कुछ खा लिया। हर पल घर याद आ रहा है, लेकिन नई जगह पैठने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगता।
1 Comments:
आज आपकी स्मृति 1 से 4 पढी । आगे की उत्सुकता है ।
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Pratyaksha, at Wednesday, November 15, 2006
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