मुझे याद आ रही हैं, बीकानेर की अंधड़ भरी दुपहरियाँ, पत्थरों से भरे ऊँचे मकानों में उन दिनों एक बड़ा आँगन और पानी का हौज होना जरूरी होता था. गर्मियों भर उस हौज में एक विशालकाय मतीरा ( तरबूज ) तैरा करता था, हम बच्चे दिन भर में न जाने कितनी बार उसके पास जाते उसे छूते और मनाते कि वह लाल निकले, लाल नहीं तो कम से कम गहरा गुलाबी ही सही। बह भी जिबह के लिए तैयार बकरे की तरह हमारी बातें सुना करता होगा, और कभी- कभी तथास्तु भी कहा करता होगा। गर्मियों के दिनों सुबह सवेरे खाना पीना निपटा लिया जाता, बरामदों की चिकों को डाल दिया जाता, बड़े कमरे, जिस में दुपहरी बिताने का इंतजाम हो, उसे धो- पौंछ कर तैयार कर लिया जाता, खिड़कियों पर खस खस के टाटे ( यानी की मोटे पर्दे गिरा लिए जाते ) उन्हे पानी से तर कर लिया जाता। और हम बच्चे नहा धोकर पतली मलमल की फ्राक पहन कर गरमी से दो दो हाथ करने के लिए तैयार हो जाते। दिन में जितनी जोर से हवा चलती , कमरा उतना ही ठंडा होता। बात हवा तक हो तो ठीक है, लेकिन जब अंधड़ आता तो वाहे कितनी ही खिड़की दरवाजे बन्द करों रेत घर में घुस ही जाती। फिर तो उस शाम घर के हर एक सामान को पौंछना साफ करना विशेष काम होता। हम बच्चों के लिए तो यह काम भी मजेदार होता था। गर्मियों की रात को हम लोग छत पर सोया करते थै,शाम होते ही छत पर छिड़काव होता, पानी की किल्लत के कारण छिड़काव करने का विशेष तरीका हुआ करता था. आधी बाल्टी पानी में छत को तर कर लिया जाता । छिड़काव के बाद फिर छिड़काव.. जब छत की जमीन से भभके निकलने बन्द हो जाते तो चारपाइयाँ बिछा ली जातीं, और इन पर सफेद चादर, सफेद गिलाफ वाले तकिए बिछा कर पैताने एक रेशमी चादर के साथ मोटा खेस रख दिया जाता, बीकानेर की राते शुरू में तो गरम हुआ करतीं किन्तु आधी रात बीतते- बीतते ठण्डी होनी शुरु करती। सुबह होते होते तो खेस लपेटने की नौबत आ जाती, कभी- कभी रात को भी धूल भरा अंधड़ चलने लगता , बड़े लोग तो उठ कर नीचे चले जाते, लेकिन हम लोग मुँह कान लपेटे सोते रहते। सुबह होते तो हमारा हुलिया ही अलग होता, आँख नाक सब जगह धूल ही धूल , मुँह में अजीब सा रेतीला स्वाद आ जाता। बीकानेरी सेब भुजिये उन दिनों भी बहुत स्वादिष्ट हुआ, करते माँ कहा करती थी,-- "भई यह तो यहाँ की रेत का कमाल है, दिन रात अंधड़ चला करता है तो भुजियों में काफी कुछ रेत का अंश आ ही जाता है। फिर उन्हें स्वादिष्ट तो होना ही है। "रेत से जुड़ी और ना जाने कितनी बाते जेहन में उभरती हैं, आदमी लोग काम पर जाते तो घर की बहुएँ बड़े बड़े बर्तन भाँडे लेकर गली में आ बैठतीं। हर घर के सामने एक छोटी सी रेत की हौदी होती थी, जिसमें छनी हुई रेत भरी होती थी़। स्त्रियाँ पीतल के बर्तनो पर रेत मलती, पहली बार उका झूठन उतरता, दूसरी बार मे चिकनाऊ , तीसरी बार मलतीं तो बर्तन धूप से चमक जाते, और फिर उन्हे सूखे कपड़े से पौंछ कर रसोई घर में सजा लिया जाता था। इस तरह पानी की किल्लत के दिनों में पानी बचा लिया जाता था, लेकिन एक बात और थी, जिस पर लोगों का ध्यान ही नहीं जाता था। बरतन मलने का काम बीन्दनियों (बहुओं) का ही हुआ करता था। बर्तन मलनेकी प्रक्रिया बेहद लम्बी हुआ करती थी, और इस प्रक्रिया का सबसे अच्छा परिणाम यह था कि बहुओं को आपस हँसी- ठिठोली करने और बतियाने का मौका मिला जाता और वे तन से थकते हुए भी मन से खिल उठतीं।
उन दिनों रेत के ढ़ूहों को देखने जाने का रिवाज तो नहीं था, किन्तु जब कभी देखने का मौका मिलता तो कल्पना मरुस्थल की तरह पाँव पसार लेती थी़ अब मैं कैसे भुला सकती हूँ रेतीली खूबसूरती, उसके स्वाद और खुशबू को,,बेटी को कैसे समझाऊ?
1 Comments:
बहुत ही इमानदारी और मिठास के साथ आप नें बचपन की यादों को संजोया है ।
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अनूप भार्गव, at Tuesday, November 21, 2006
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