खिड़की से बाहर झाँकते हुए हम अपने भीतर झाँकने लगते हैं. दृश्य कुछ समय तो आकर्षित करते हैं, किन्तु ज्यों ही उनकी पुनरावृत्ति होने लगती है, हम अपने भीतर झाँकने लगते हैं, अपने से बतियाने लगते हैं। मेरे साथ तो अकसर ऐसा ही होता है, मैं बार बार अपने को झंझो॔ड़ती कहती हूँ अरे क्या सोच रही हो, इन दरख्तों से संवाद करो, इन बादलों को निहारों.. कालिदास ने हिमालय से निहारा, तुम रेल की खिड़की से निहारो... लेकिन मेँ बार बार अपने भीतर सरक जाती हूँ... बाहर सब का आना जाना चलता रहता है, मैं अपने आप से बतियाती रहती हूँ। फिर मुझे ऐसा लगता है कि बादल भी मेरे संवाद में शामिल हो जाते हैं, और बच्चों की तरह दौड़ते मेरा पीछा करते हैं। मैं खिलखिला उठती हूँ ,और उन्हे अपनी बातों में शामिल कर लेती हूँ।आज मैं सोच रही हूँ सम्बन्धों के बारे में... समाज ने ना जाने कितने सम्बन्ध बनाए.. या फिर कहें तो उन्हे खानों में रख कर नाम दे दिए.. लेकिन क्या सम्बन्धों का कोटा खत्म हो गया?मैंने बादलों से पूछा.. क्या तुम लोग भी इसी तरह सम्बन्धों को नाम देत हो और बाकी सम्बन्धों को खारिज कर देते हो?उन्होंने कहा नहीं, हमारे आसमान में हर पल सम्बन्ध जगते हैं और बुझते हैं, जब एक परिन्दा हमारे बीच में से गुजरता है तो हम सन उसके पंखो से यह पता लगा लेते हैं कि कहाँ है हमारी यात्रा, परिन्दे के पंखो का हमारे जल कणों से सम्बन्ध उतना ही स्थिर है, जितना कि तुम लोगों का जमीन से..मैंने कहा.. अरे कहाँ हम लोग जमीन से प्यार करते हीकहाँ हैं? हमेशा तुम्हारी तरह आसमान में दौड़ लगाने का सपना देखते रहते हैंबादलों ने कहा.. तभी तभी तो तुम लोग खुश नहीं रहते ... जो होता है, उससे भागते हो और जो नहीं होता उसके सपने देखते हो,मैने भी पलट कर कहा..तभी तो हम आदमी हैं... बादल नहीं...
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