रतीना

2006/02/18

मेरे साथ

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ
उन्होंने मुझ पर छुरी चलाई
तरबूजे की तरह दो फाँकों में बाँट दिया
फिर दो और, दो और
मैं रंक्त रंजित अपने ही रस में

मैंने सोचा
कोई बात नहीं
हवा है सूरज के साथ
मेरे साथ
चाँद है बरगद के साथ
मेरे साथ
मेरे साथ आसमान है
चिड़िया के परों के साथ

मेरा रस सूखा
तन का
फिर मन का

पड़ी -पड़ी
सड़ने लगी माटी पर
कैंचुआ भी था
वही,जहाँ मैँ गिरी
"अपनी जगह अपने आप बनानी होती है
बिना दाँतों के काटते हुए कठोंरता को "


मैंने शुक्रिया नहीं कहा कैंचुए को
मुझे मालूम था कि
वह ही है मेरे साथ