रतीना

2006/03/01

झील पर मंडराती, मसालों की खुशबू

पूर्वकथन‍-:


कल मैंने तस्वीर खींची
कल मैंने तस्वीर खींची
अपने पैरों की
कैमरा ,
जानते हो, साधारण सा ही है?
कल मेरे पैर , जानते हो
मेरे पैर हमेशा गीले रहते हैं
मीठे पानी में खड़े खड़े
इंतजार में गीले
तुम्हारे इंतजार में, दोस्त!


* कवि की चिता पर

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त!
निराला


यह पहली कविता नहीं है
जिसे अभी- अभी धूल से सनी फाइल से निकाला है मैंने
और भी थीं, जिनकी कोर अभी तक खुली नहीं
मिट्टी की गंध लिए कोरापन बाकी है जिनमें अभी तक

मैंने पहली कविता उठा ली
" अग्नये स्वाहा"
प्रथम आहुति तुम्हारी चिता पर
होने से ना होने की यात्रा इतनी जटिल तो नहीं है?

कल तक तुम यहीं थे
पत्तियों के किनारों पर झाँकती पीलेपन में
मेरी उंगलियों में फँसी कलम में
कागज पर खिंची लकीरों में
पंखे की चक्रवाती हवा में
रसोई में मसाले के डिब्बे में
तुम आज भी यही हो
किन्तु
कलमदान खाली है
पत्तियाँ सूख कर झड़ चुकीं है
रसोई से मसालों की खुशबू खत्म हो गई है

" अग्नये स्वाहा"

मैंने दूसरी कविता उठा ली
दूसरी आहुति तुम्हारी चिता पर

समन्दर में किश्ती
किश्ती में जाल
जाल में मछली
एक हत्या, एक मौन
समन्दर के बीचों बीच
तुम्हारा नीला रंग फीका पड़ गया
किश्ती डूब गई
मैं मछली तुम्हारे जाल में


यह तीसरी कविता
अन्तिम आहुति अपनी चिता पर
तुम रहोगे यहीं
शब्दों में, ध्वनियों में
साँसों के संगीत में
मेरी यादों के धागों में
अनन्त निरन्तरता में
" अग्नये स्वाहा"
तुम रहोंगे
कविता की पंक्तियों में
जो साथ- साथ लिखीं हमने


*किले मे सुराखें

जिन्दगी के....
कमरों में अंधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार,
आबाज पैरों की देती है सुनाई
बार बार....बार बार
मुक्तिबोध



इस बार फिर तुमने
कैद कर लिया अपने आप को
मजबूत किले में, जिसकी बन्द सुराखों में से
मैं हवा बन कर भी नहीं गुजर सकती

फिर भी तुम खिले हो धूप से
अपने नाम को
उजाला देते हुए

इस बार फिर तुमने
धोखा दिया उसी को
जिसने तुम्हारे पाँव के अँगूठे पर
अपनी पलकों से चुम्बन दिया

कल मेरी खिड़की पर
मेरे कम्प्यूटर के करीब निशान थे
मौत के, जो मैंने झेली हर कविता के साथ
मेरी उंगलियाँ अकड़ गईं,
गर्दन के पीछे बेहताशा दर्द है
मेरी देह के भीतर चल रहा है घमासान
हर बार मैं खून के दरिये में बदल रही हूँ

*तूफान के तले


मैं ही प्राप्त करूँगा
इस नगर वधु को महाशमशान बनाने का श्रेय
राजकमल चौधरी


बहुत दिनों से हँसी थिरक रही है
होंठों पर, जानती हूँ कि एक तूफान है जो
जम गया है, डरती हूँ कि
क्या होगा जब
तूफान जग जाएगा?

रास्ते खोते जा रहे हैं
दरख्तों के सायों में
फुनगियों पर बैठी हजार मौते
एक साथ उड़ गईं
गिद्ध हूँ मैं प्रेम पाखियों के शिकार में रत
उनके टूटे पंखों मे डूबी मैं
बुहार रही हूँ
साँप के बिल में बिलाते अपने अक्सों को

अरे देखों !तुम एक टहनी
बस चरमरा कर गिर पड़ोगे

तुम एक धोखा हो
जानती थी मैं बहुत पहले
तुम एक स्वार्थ हो
जानने लगी
तुम्हारे साथ के संग
तुम एक जिद हो
जो छोड़ेगी नहीं मेरा संग
इसे जाना है मैने
तुम्हे भूलने की हर कोशिश से

क्या छोड़ दूँ साथ कलम का?
इसकी स्याही मे डूब रहीं हूँ मैं
निर्वाण खोजूँ , सुई के बिल में?
बुन लूँ फूल रंगों के

* धागों के फूल

एक चोट में वह संचित संगीत जिसे रचने में
स्वयं ना जाने कितनों के स्पन्दित प्राण रच गए
अज्ञेय


बहुत पहले कभी
मैंने तुम्हे भेजी थी खुशबू
किले की दरारों से
दूरियो के पार
वह उन्ही फूलों की ही तो थी
जो मेरी साड़ी पर कढ़ें हैं
धागों से,
प्रेम से रंगा था मैंने जिन्हें

*मुझे मिल गए मेरे खोए पैर

"अवतरित हुआ संगीत स्वयंभू
जिसमें सोता है अखण्ड ब्रह्मा
अशेष प्रभामय"
अज्ञेय


क्या अजब !
आधा सफर पार कर मैं खोज पाई हूँ
अपने पैरों को
लाल कमल खिल आए हैं मेरी एड़ियों पे
बिना अलता के
मैं दुलारती हूँ तलवों को
ज्यों चेहरे हों
नहीं ! नहीं मत छुओ उंगलियों के पौर

*
नाखून! नाखून!!
मत काट मुझे, मेरे दोस्त ने भेजी है मैहन्दी
सजाऊँगी तुझे फूलों से
देख वसन्त खड़ा है बगल में
सूरज भी मुस्कुरा रहा है
स्वेटर उतार

मैं तैयार हूँ फिर से
सफर के लिए, हेमन्त, शिशिर वसन्त
कंधे पर टाँग
तू बस छू दे मेरे अंगूठे का नाखून
मेरा सफर जारी है!!
सफर जारी है!!!

*मत सजाओ अपनी चिता


मैं तुम्हे निमंत्रित करता हूँ
मेरे साथ इस कल्पित खिड़की तक खड़े हो जाओ
और ठण्डे काँच की इस दीवार को होंठों से छुओ
..... खिड़की के पार.... दो आस्मान सरीखी आँखें दिखेंगी..."
विजय देवनारायण साही


मैं नदी नहीं
जरूरत नहीं पहाड़ी कंधे की
झील हूँ, मीठी झील
मरुस्थल की गोद में
कभी नहीं सूखती मेरी कोख
कभी नहीं सृष्टि विहीन

मत सजाओ अपनी चिता
मेरे दामन पर दोस्त!
किलकिराइयाँ गुदगुदा रही हैं
खिलखिलाती नाच रही हूँ मैं
देखो
सूख नहीं रही मैं
मैं सूख नहीं रही
मेरी कोख में सृष्टि!
सृष्टि मेरी कोख में!!!

*छुप्पन छुप्पी

बैठ लें कुछ देर
आओ, एक पथ के पथिक से
प्रिय, अन्त और अनन्त के,
तम गहन जीवन घेर।
निराला


झील! झील!!
हम खेले छुप्पन छुप्पी
मैं जो भागी उदयपुर से, तो
छिपी नारियल दरख्त की ओट में
कहाँ गए साथी, कहाँ छुपी हैं सखियाँ
ये पाया ...........छू.......छप्प.
दिन बीता, रात बीती
वक्त ही बीत गया..
मैं भूल गई निकलना ओट से
भूला गया अपना उद्गम
कहाँ है वह लड़की?
कहाँ गई वह?
ओह , कहाँ मेरी सखियाँ
वह पकड़ा छू.....


बैठी हूँ , काँटों की झाड़ी पर
झील , कब खोजेगी मुझे?

*गलबहियाँ

इस हाथ से काँटे उगे हैं
बच कर रहना
लेकिन यह न भूलना
ये हाथ को बींधकर उगे हैं
सुरजीत पातर


"नदियाँ चाहे मिल जायें
पर सखियाँ नहीं मिलतीं"
आ झील सखि !
गलबहियाँ डाल हम बैठें

तुझे मालूम है वह चरवाहिन
जो भागी थी जुलाहे के साथ
आज भी कात रही है सूत

आ हम काते सूत बातों के
यादों के......


*आ मुझ में तैर

मेरे प्राणों के प्याले को भर दो,
प्रिये , दृगों के मद से मादक कर दो,
मेरी अखिल पुरातन प्रियता हर दो,
मुझको एक अमर वर दो,
निराला


आ तैर मुझ में
आ तैर मेरे साथ
धो डाल अपने मैल को
साफ कर ले अपनी गठरिया
कितना मैला ढोयेगा
चली चलाई के वक्त

जब रात तैरती है मुझ में
चली आती है हजारों राज नर्तकियाँ
नाचती हैं तक.. धिना धिन्न्न
उग आते हैं कमल
उनकी एड़ियों पर
हीरे के बिछूओं पर सफेद कुमुदनियाँ

आ इस झील के तट पर
तनिक छुला दे पावन उंगली
मेरे तन से,
मैं खिल जाऊँगी शतकमलनियों में
देखो लाल हो गई मैं शर्म से

मत थक यात्री
मिल गए हैं मुझे मेरे पैर
दे दूँगी तुझे अपने हिस्से की यात्रा
भी तुझको
चरैवेही- चरैवेही
मेरे प्रेम पथिक
मत थक


*नन्हीं एड़ियों में खिलते कमलों की सुगन्ध


मेरे प्रिय सब बुरे गए
सब भले गए!
निराला


उस साँझ, एन गोधुली के वक्त
जब मन्दिर की घण्टियाँ घना रहीं थीं
वह चली आई थी
नीम के दरख्तों के पीछे छिपती- छिपाती
कन्या शिशु हाथ में लिए
रख कर वह बच्ची मेरे हाथ
कहाँ गई, क्यों गई.
मैं मग्न थी
नन्हीं एड़ियों में खिलते कमलों की सुगन्ध से

पर कहाँ ले जाऊँ इन कन्याओं को
साल दर साल मर जाती हैं भ्रूण में ही

देखो , उनमें से एक
पीली चोंच वाली चिड़िया
बैठी है टहनी पर
वह उड़ती है
गाती है
आसमान का चक्कर लगा
नीला रंग चुरा लाती है
फिर डुप्प से चौंच डुबा
झील में , सब कुछ ताजा कर देती है

उसकी पीली चोंच में लाल लाल बेर
सूरज की तरह तमतमा उठता है
वह दूसरी तने पर चढ़ती गिलहरी
दे जाती है, आम की गुठली मुझे

माँ की गुनगुन

तरणि तार दो
अपर पार को!
निराला


जब कभी पछुआ चलती
माँ गुनगुना उठतीं‍
मोती महल अपने बेटों के लिए
मेरे लिए निकच मरुस्थल रे
क्यों भेजा मुझे परदेस मैया
क्यों भेजा मुझे दूसरे देस

झील के किनारे
कपड़ों के साथ मन धोती माँ
गाती थी माँ
क्यों भेजा मुझे परदेस

माँ, क्यों भेजा दूसरे देस मुझे
गा रही है बेटी
समन्दर के किनारे

बरसाती लड़की की कहानी
गीत गाने दो मुझे तो
वेदना को रोकने को!
निराला
"काले बदरा पानी दे
पानी दे गुड़ धानी दे
मेरे बप्पा को, भैया को
जनम की खुशियाँ,
मेरी कोख में पानी का बुलबुला रे!"

नाचती नाचती लड़की
पहुँची बरसात के देस में
उसकी जंघाओं में नाचते मोर
नितम्बों पर झरने
पैर की उंगलियों पर
सफेद कमल की कलियाँ
काले घाघरे में छिपती रात
लाल चोली में चमकते सूरज चाँद
काले मेघा, बस इतना ही पानी
कि मेरा प्रियतम न रह जाए प्यासा
....
प्रलय के बाद की कथा
झील को भी याद नहीं

*उसके नाम खत

एक लरजता नीर था
वह डर के पत्थर हो गया
सुरजीत पातर


मैंने खत लिखे उसे
फिर तैरा दिए झील के पानी में
थमें हुए जल में
असंख्य दिए लहरा उठे
वह देखो , वह बंजारन नाच रही है
उसकी हथेलियों पर रखे दिए
मेरे खत ही तो हैं
मैंने काले कागज पर लिखा
काली स्याही से
क्या मेरा दोस्त पढेगा इन्हें
समझेगा मेरी भाषा

वह प्रिय है मेरा
वह प्रिय नहीं है मेरा
है, नहीं...है... नहीं
संसार में निर्वाण
क्या यही है प्यार?

झील तू कहाँ है?
आ सहायता कर ना!


अन्त्य

कंकरीली राहें न कटेंगी
बेपर की बातें न पटेंगी
काली मेघनियाँ न फटेंगी
ऐसे ऐसे तू डग ना भरा।
निराला


मैंने तुम्हें बताया था ना
कल
मैने अपने पैरों की तस्वीर ली
कैमरा साधारण था
किन्तु पैरों में पर लग गए
तुम जानते हों ना?