रतीना

2006/06/19

चरैवेती ..चरैवेती....

उसकी आँखों को इंतजार नहीं- तिनके भर भी हरियाली का, साँसों की चिड़िया अब कभी- कदार ही आती है उसके सीने के घौंसले में तिनका रखने, उसके भाव दिल की तलहटी में जम से गए हैं, उसकी उंगलियाँ प्रेम गीतों के मनकों पर फिसलने से हिचकने लगीं हैं, उसे शब्दों के संसार से देशनिकाला मिल गया है। वह , जो मेरे दर्द में भागीदार रहा, वह जो मेरे दर्ग का कारण रहा है, चटखे हुए मटके जैसे टप- टप टपक रहा है।
मैं उसकी चूती जिन्दगी के नीचे अपनी हथेली लगाना चाहती हूँ, मैं उसके साँसों के मोतियों को अपनी अंजुरी में समेटना चाहती हूँ। मैं कुछ भी करना चाहती हूँ, क्या? यह तो मैं खुद ही नहीं जानती हूँ।
क्या
प्रार्थना करूँ?
कविता लिखूँ?
क्या कविता लिखी जा सकती है...
ऐसे क्षण भी ?
क्या निचौड़ा जा सकता है...
भावनाओं को इन पलों में भी?
क्या मेरी कविता बचा सकती है उसकी
जिन्दगी ?
फिर सवाल, यदि कविता जिन्दगी नहीं बचा सकती तो कविता का मतलब ही क्या? शब्द यदि शक्ति नहीं बन सकते तो शब्द- शक्ति का मतलब ही क्या? क्या जरूरत है उन्हें जाया करने की? यदि कविता जिन्दगी नहीं लिख सकती तो जिन्दगी के अभाव के लिए क्यों लिखी जाए? कहीं शब्द द्रवित ना बन जाए, द्रवित शब्दों में शक्ति नहीं पीड़न होता है। जिसमें भावनाएँ पिघलने लगती है। पिघलते भाव शब्दों को क्या शक्ति देंगे?
भारतीय काव्य शास्त्र में इस पर काफी चर्चा हुई है। काव्य मीमांसा में कहा गया है कि यदि कवि सामान्य की भावनाओं तक ना पहुँच पाए तो कवि- कर्म का क्या प्रयोजन?

काव्येन किं कवेस्तस्य तन्मनोमात्रमवृत्तिना।
नीयन्ते भावकैर्यस्य न निबन्धा दिशो दश।।
(काव्य मीमांसा --चतुर्थ अध्याय)
हर्ष चरित में भी यही बात कही गई है ...
कि कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी।
कथेव भारती यस्य न व्याप्नोति जगत्त्रयम्।।
(हर्ष चरित-1.10)
इसका मतलब तो यही है ना कवि को अपना कर्म करते रहना है परम शक्ति के द्वारा डाले गए खलल के बावजूद । इस तरह वह एक ऐसा संसार बना लेगा जहाँ पर असली संसार का व्यथित जन आकर क्षण दो क्षण विश्राम कर सके। संभवतः कुछ जोड़ी आँखे अपनी पीड़ा या आनन्द से संवाद करने के लिए कुछ शब्द खोज लें। कहाँ तक भाग सकता है कवि अपने कर्म से? अन्ततः उसे आग में चलना ही पड़ेगा! पीड़ा या आनन्द, कष्ट या विनोद, सभी को शब्दों की दुनिया में बसाना पड़ेगा। तभी तो कृत्या धरती के साथ सूरज की एक परिक्रमा पूरी कर फिर से चलने को तैयार है। चरैवेती ..चरैवेती....

उसका खत

उसने नाम लिखा
फिर पता
पते के नीचे खींची लकीर
वहाँ से यहाँ तक
बन गया एक रास्ता

उसने बन्द किया लिफाफा
बन्द हो गई उड़ान
आसमान में चक्कर काटने वाली

लिफाफा आया
साथ आई छुअन
ढेर सारी यादों से घिरी

अंकुरित सपने

उसने कुछ सपने
मेरी हथेली पर रख
मुट्ठी बन्द कर दी
पसीजी मुट्ठी लिए
मैं देखने लगी सपने
बीजों में अंकुर
अंकुर में रेशा
रेशे में जड़
दो पत्तियों पर खड़ा हुआ
लहराता दरख्त
आँख खुली तो पाया
उनके हिस्से में खड़ा था
वही दरख्त
जिसे लगाया था मैंने
अपने आँगन में

आसमान का आँसू

नन्ही सी इच्छा के लिए
कामना नहीं की, कभी
आसमान का आँसू टपक पड़े
तारे की शक्ल में

चाँदनी की उधारी

उन सभी कदमो को
गिन कर देखूँ यदि
तुम्हारे साथ चले थे मैंने
पाँव फिर से
चलना भूल जाएँ
सड़क भूल जाए रास्ता
उन लम्हों को जोड़ कर देखूँ
बिताए थे तुम्हारे साथ
समय की धड़कन रुक जाए
उस आँच को
क्या पहचानोगे तुम
जिस में पकता रहा मेरा
अन्तस रस
तुम्हारे हर कदम
हर साथ
हर बून्द प्यार
चाँदनी की उधारी था

आखिरी प्रार्थना

आखिरी वक्त
जब हौंठों पर जमे शब्दों पर
सोच बुझने लगेगी थक कर
तब
ना कोई शिकायत निकलेगी
ना कोई प्रार्थना
इस प्रार्थना को
क्यों ना उठा कर रख दूँ
आखिरी वक्त के लिए

एक और बारह के बीच

बरसों बरसों से
मेरे सीने के ठीक बीचोबीच
जड़ी थी एक घड़ी
एक से बारह के बीच में
वक्त को पकड़ कर
एक पाँव से घिसटती
दूसरी से सरपट दौड़ती

मैं दौड़ती रही सुइयों के साथ
रुक कर थमती रही
जिन्दगी के साथ
दुआ कर रही थी कि
टूट जाएँ ये सुइयाँ
बिखर जाए वक्त
गुलाल सा, हथेली पर

बरसो बरसो बाद
अचकचा कर रुक गई घड़ी
टिकटिकाहटों को समेट
मुँह लटका खड़ी हो गई
वक्त के मकड़ जाल ने
लपेट लील लिया मुझे

चीख उठी मैं
कहाँ है सुइयों की रस्सी
कहाँ है मेरी घड़ी

वक्त हँस पड़ा
चल दिया मुझे छोड़