चरैवेती ..चरैवेती....
मैं उसकी चूती जिन्दगी के नीचे अपनी हथेली लगाना चाहती हूँ, मैं उसके साँसों के मोतियों को अपनी अंजुरी में समेटना चाहती हूँ। मैं कुछ भी करना चाहती हूँ, क्या? यह तो मैं खुद ही नहीं जानती हूँ।
क्या
प्रार्थना करूँ?
कविता लिखूँ?
क्या कविता लिखी जा सकती है...
ऐसे क्षण भी ?
क्या निचौड़ा जा सकता है...
भावनाओं को इन पलों में भी?
क्या मेरी कविता बचा सकती है उसकी
जिन्दगी ?
फिर सवाल, यदि कविता जिन्दगी नहीं बचा सकती तो कविता का मतलब ही क्या? शब्द यदि शक्ति नहीं बन सकते तो शब्द- शक्ति का मतलब ही क्या? क्या जरूरत है उन्हें जाया करने की? यदि कविता जिन्दगी नहीं लिख सकती तो जिन्दगी के अभाव के लिए क्यों लिखी जाए? कहीं शब्द द्रवित ना बन जाए, द्रवित शब्दों में शक्ति नहीं पीड़न होता है। जिसमें भावनाएँ पिघलने लगती है। पिघलते भाव शब्दों को क्या शक्ति देंगे?
भारतीय काव्य शास्त्र में इस पर काफी चर्चा हुई है। काव्य मीमांसा में कहा गया है कि यदि कवि सामान्य की भावनाओं तक ना पहुँच पाए तो कवि- कर्म का क्या प्रयोजन?
काव्येन किं कवेस्तस्य तन्मनोमात्रमवृत्तिना।
नीयन्ते भावकैर्यस्य न निबन्धा दिशो दश।।
(काव्य मीमांसा --चतुर्थ अध्याय)
हर्ष चरित में भी यही बात कही गई है ...
कि कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी।
कथेव भारती यस्य न व्याप्नोति जगत्त्रयम्।।
(हर्ष चरित-1.10)
इसका मतलब तो यही है ना कवि को अपना कर्म करते रहना है परम शक्ति के द्वारा डाले गए खलल के बावजूद । इस तरह वह एक ऐसा संसार बना लेगा जहाँ पर असली संसार का व्यथित जन आकर क्षण दो क्षण विश्राम कर सके। संभवतः कुछ जोड़ी आँखे अपनी पीड़ा या आनन्द से संवाद करने के लिए कुछ शब्द खोज लें। कहाँ तक भाग सकता है कवि अपने कर्म से? अन्ततः उसे आग में चलना ही पड़ेगा! पीड़ा या आनन्द, कष्ट या विनोद, सभी को शब्दों की दुनिया में बसाना पड़ेगा। तभी तो कृत्या धरती के साथ सूरज की एक परिक्रमा पूरी कर फिर से चलने को तैयार है। चरैवेती ..चरैवेती....

