रतीना

2006/11/10

स्मृति ‍‍-- ‍‍एक

जैसे किसी ने सेब के बीचो बीच में चाकू घुपा दिया हो, चाकू चल रहा है, लेकिन बस बीच में, बिना दो भाग में बाँटे, इस ओर को उस ओर से बचाता हुआ। हर बार इस ओर को उस ओर से संवाद के लिए चाकू की धार का सामना करना पड़ता है। निर्णय ‌उतना ही अप्रस्तावित था जितना कि प्रस्ताव। तीस साल में घर की शकल कितनी बादल गई, ईंट ईंट इकट्ठा कर के घर छाया, आठों दिशाएँ घर की दीवारें, आसमान टाँगा छत पर, पूरी ब्रह्माण्ड की मालकिन मैं अकेली, नन्हीं बेटियों से लेकर पति तक, सभी हुकुम मानने का अभिनय करते रहे... कि पहला पंछी उड़ चला, अपना अलग ब्रह्नाण्ड छाने। जितने हुलास और उल्लास के साथ बेटी को विदा किया, उतने ही कष्ट के साथ जुदाई को सहा... लगा कि दीवारे चरमरा जाएंगी, लगा कि फैंफड़ों में साँस आनी बन्द हो जाएगी, ... कुछ महिने भी नहीं बीते कि छोटी ने साजो-समान बाँधा होस्टल के लिए। हालाँकि कि मैं ही गई थी , उसे विदा करने, किन्तु लौटी तो लगा कि रीता घड़ा हूँ , जिसकी पेंदी के छेद से लगातार कुछ चूता जा रहा है। घर मरघट सा सुनसान हो गया... कभी‍- कभार कोई याद चली आती थी दफन होने के लिए... बरस पर बीतने लगे, कभी कदार बिटियाँ आ जातीं, घर की साँसे चलने लगतीं, नहीं तो हम दोनों होली दीवाली यूँ ही चुप्पे से बने रहते, लगते कि बच्चियाँ ही संवाद का सूत्र थीं, जब वह सूत्र ही नहीं रहा तो किस विषय पर बातचीत की जाए। समय ने मलहम का काम किया, दीवारे फिर से साँस लेने लगीं, छत के आसमान में फिर से तारे टिमटिमाने लगे। अब हम दोनों ने सोच लिया कि घर तो हमारा है, उन पखेरुओं का नहीं, उनकी नियति अलग घर बसाना थी,... बस इसी तरह हम चलने लगे, छूटे सिरे बटोर कर, ना जाने कितने धागे टूटे, न जाने कितने दोस्त बिछड़े किन्तु हम चल रहे थे। कि अचानक यह प्रस्ताव आया... दीमाग कह रहा था कि हाँ कह दो, मन कह रहा था कि नहीं.कृत्या निकाले डेड़ साल बीतने को हुआ, सारी जमा पूंजी खर्च हो रही थी, कोई आसार नजर नहीं आ रहा था। तभी कालडी की यूनिवर्सिटी से विजिटंग प्रोफेसर का यह आमन्त्रण.. प्रदीप ने ही कहा.. चली जाओ, तुम्हे छात्र मिलेंगे, लाइब्रेरी मिलेगी, लोग मिलेंगे, परदेस में दायरा बढ़ेगा.. बहुत बड़ा दिल है प्रदीप का.. मेरा अकेलापन समझते हैं। कालडि यानी की छह घण्टे की दूरी ट्रेन से, यानी कि सोमवार को जाना और शुक्रवार को आना.... हिम्मत बँधी , हाँ कह दी...