रतीना

2006/11/13

स्मृति‍‍-4

छात्र जीवन में बड़ी हुलस होती थी , दुनिया नापने की, जहाँ घर के भीतर भी गिन कर कदम भरने की आज्ञा हो वहाँ दुनिया के बाहर कितने कदम भरे जा सकते हैं। उन दिनों घर से यूनीवर्सिटी तक जाने वाली बस मं बैठती तो ज्यादातर लम्बे रूट वाली बस में बैठती, खिड़की के बाहर से दौड़ती दुनिया बेहद आकर्धित करती थी। तभी मन ही मन भगवान से दुआ करती कि ..है ईश्वर मुझे इतनी लम्बी रेलगाड़ी में बिठा दे जो चलती रहे बस चलती रहे... पता है भगवान ने तथास्तु जरूर कहा होगा, तभी तो इस जगह बसी हूँ जहाँ से भारत के किसी भी कोने में जाने के लिए दो से तीन दिन तक गाड़ी में बैठना पड़ता है, ईश्वर का अचानक याद आया कि कहीं मैंने देने में कुछ कोताही तो नहीं बरत दी, तो यह निर्वासन, कि हर सोमवार को रेलगाड़ी में बैठो कम से कम छह घण्टे के लिए, और हर शुक्रवार को फिर गाड़ी में, वही छह सात घण्टे। छोटी बिटिया ने हँस कर फोन पर कहा.. माँ , भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है । अब देखो कितना लम्बा सफर मिल गया आपको, अब जब भी कुछ मांगों सोच- समझ कर माँगना।
किसी भी नई जगह का खुलना बुलबुलों के धीमे- धीमे बुझने जैसा होता है। पहले पहल बस फेन बुदबुदे, फिर कहीं जाकर असलियत। किसी ने आँखे मिलाई तो किसी ने आँखे चुराई। खाना नाश्ता सब ले लिया, जेल के केदी की तरह बिना सोचे समझे निगल भी लिया। खानपान और बोली आदमी को आदमी से अलग करने का सबसे बड़ा जरिया है। जो खाना आँते चबाती रही हैं, उस से अलग खाने में दुविधा तो होती है ही। घर थोड़े ही है कि जब मन हुआ चाय गुटका ली, जब मन हुआ कुछ खा लिया। हर पल घर याद आ रहा है, लेकिन नई जगह पैठने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगता।

स्मृति‍‍-3

पिताजी कहा करते थे, चींटी की मौत आती है तो पर निकलने लगते हैं, मौत और पर के सम्बन्ध को मैं तब समझ ही नहीं पाती थी। उन दिनों पर का सम्बन्ध आजादी लगता था और मौत देह की आजादी, हालाँकि यह उक्ति हम लोगों को कभी नहीं भाई, किन्तु यहीं सोचा कि पिताजी का तात्पर्य यह था कि हम लोग अपनी सीमा में रहें। यानी कि उन नियमों की दहलीज को पार ना करें, जो हम लोगों के लिए बनाई गईं थीं। लेकिन इस नियम पालन की बाध्यता ने हमे इस लायक ही नहीं छोड़ा कि संसार की सच्चाइयों का समना कर सकें। 'पर' निकलने की परेशानी से तो बच गए, किन्तु संसार ‌और समाज को सह पाना जिन्दगी भर ना सीख पाए। मैं अपने घर से निकली हूं ,बहुत दूर नहीं , अपने आस- पास के तथाकथित समाज को जवाब देना मु्श्किल सा हो रहा है। क्या जरूरत है इस उम्र में यह सब करने की, अतीत की जुगाली करती , बुझीं बुझी सी महिलाएँ कहती हैं......। मैं पूछती नहीं कि भई जब आपकी युवा बेटियाँ नौकरी के लिए दूर- दराज जातीं हैं तब तो आप लोगों ने बड़े अंहकार से स्वीकार किया, किन्तु मेरे घर से निकल कर जरा दूर ही निकलने पर इतना बवाल क्यों? हालाँकि बवाल इस लिए नहीं कि उन्हें मेरी चिन्ता है, बल्कि इसलिए है कि मैं उनकी जैसी क्यों नहीं हूँ, क्यों कुछ कर गुजरने में लगी रहती हूँ। घर से दूर आना मेरे लिए पर निकलने का रोमांच नहीं, कुछ कर गुजरने की तमन्ना नहीं, बल्कि जीने की ओर एक नन्हीं सी कोशिश है। एक दबी इच्छा कि मैं उस जानकारी को बाँट सकूँ, जिसे मैंने अकेले ही ना जाने कितने बरसों में इकट्ठा किया है। साथ ही कोशिश है कि कृत्या, जिसे मैंने उतने ही लगन से पाला है , कुछ बड़ी हो सके, एक दिशा निर्धारित हो सके। कृत्या मेरी वेब पत्रिका है, जिसे निकालने के लिए मैंने अपनी जमा पूंजी लगा दी, और अब तक बिना किसी आर्थिक सहायता के आगे चलाना मुश्किल सा लगने लगा तो यह प्रस्ताव आया। मुझे लगा कि यह प्रस्ताव मेरे लिए नहीं बल्कि कृत्या के लिए हैं, मैं तो बस मजदूर हूं कलम की। असाम ‌और लद्दाख की यात्राओं में मैने बिहार आदि दूर दराज प्रदेशों से आए मजदूरों को देखा था, उनके अनकहे दर्द से भींज भींज गई थी, उनका विस्थापन ‌से मैं अपने विस्थापन को कैसे जोड़ सकती हूँ।

स्मृति‍‍--2

पहले दिन होस्टल में पैर रखा, तो कमरे की दीवारों को घूर‍‍- घूर कर देखती बैठी रही. क्या इतना फरक होता है दीवारों में, घर की जो दीवारे कभी- कभी काटती थीं, वे ही हुलस - हुलस कर बुलाने लगीं। फिर उठी, बाजार गई, और एक गदिया, एक बाल्टी ले आई। पतली सी गदिया पर पीठ टिकाई तो रोना फूट पड़ा... अचानक छोटी बेटी की याद आ गई, 6 साल बिताए थे उसने होस्टल में... और जब उसे पता पड़ा कि शादी के बाद उसे कुछ दिन डाक्टर पति के साथ होस्टल में रहना पड़ेगा तो रो पड़ी थी, माँ मेरी जिन्दगी में बस होस्टल ही है क्या... कब मिलेगा मुझे घर... मैं उसे समझाती रही कि कुछ समय इंतजार करों, सब मिल जाएगा.. आज उसका दर्द मेरे सामने चूल्हे पर रखे दूध सा उफन उफन कर बह रहा था। किस तरह का विस्थापन झेलते हैं बच्चे, रहते हुए भी ना रहते हुए।