स्मृति-9
आज मैं सोच रही हूँ सम्बन्धों के बारे में... समाज ने ना जाने कितने सम्बन्ध बनाए.. या फिर कहें तो उन्हे खानों में रख कर नाम दे दिए.. लेकिन क्या सम्बन्धों का कोटा खत्म हो गया?
मैंने बादलों से पूछा.. क्या तुम लोग भी इसी तरह सम्बन्धों को नाम देत हो और बाकी सम्बन्धों को खारिज कर देते हो?
उन्होंने कहा नहीं, हमारे आसमान में हर पल सम्बन्ध जगते हैं और बुझते हैं, जब एक परिन्दा हमारे बीच में से गुजरता है तो हम सन उसके पंखो से यह पता लगा लेते हैं कि कहाँ है हमारी यात्रा, परिन्दे के पंखो का हमारे जल कणों से समबन्ध उतना ही स्थिर है, जितना कि तुम लोगों का जमीन से..
मैंने कहा.. अरे कहाँ हम लोग जमीन से प्यार करते हीकहाँ हैं? हमेशा तुम्हारी तरह आसमान में दौड़ लगाने का सपना देखते रहते हैं
बादलों ने कहा.. तभी तभी तो तुम लोग खुश नहीं रहते ... जो होता है, उससे भागते हो और जो नहीं होता उसके सपने देखते हो,
मैने भी पलट कर कहा..तभी तो हम आदमी हैं... बादल नहीं...


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