2009/06/22

Bergen-2




शापिंग माल से निकल कर मैं मछली बाजार की ओर चल देती हूँ। मेरी जेहन में तो केरल , मुंबई के मछली बाजार टंगे थे, लेकिन ये बेहद खूबसूरत दिखने वाली मछलियों को ठेले नुमा दूकानों, सजाकर खाने के लिए बेचने वाला बाजार था। कई मछली वाले मुझ से बातचीत करना चाहते हैं, पर भाषा आड़े आती है। नोर्वे में अंग्रेजी का कोई खास प्रचार नहीं है.लपग अपनी भाषा से ही मुहब्बत करते हैं। लेकिन कुछ लोग अंग्रेजी बोल ही लेते हैं। यहाँ का मछली बाजार भी हमारी तरह काँव काँव करता बाजार नहीं हैं, बल्कि ठेलों पर मछलियाँ और उनसे बने पकवान इस तरह से सजे हुए हैं, मानों रंगबिरंगी मिठाइयाँ सजी हो। लोग अपने आप ही खिंचे चले आते थे।

र्गन को हार्बर शहर कहा जाए तो गलत नहीं होगा, लेकिन यहाँ समन्दर के किनारे केरलीय किनारों की तरफ धूप में पाँव फैला कर पसरे नहीं हैं, बल्कि पहाड़ों की गोद में सोये से हैं। बन्दरगाह की दृष्टि से बेहद उत्तम और निवासियों को समन्दर के साथ पहाड़ी ठंडक देने के कारण उमस से बचाते हुए। संभवतः यही कारण है कि नोर्वे का यह शहर काफी घना बसा है। शहर का क्षेत्रफल ज्यादा नहीं है, आराम से चलते हुए शहर का चप्पा चप्पा खोजा जा सकता है, पुरानी, किन्तु नई लगने वाली इमारतों के खोल में घुसा जा सकता है।

मछली बाजार में कुछ देर भटकने के बाद याद आया कि मेरी कैप कहीं गिर गई है, मैं फिर से शापिंग माल की तरफ गई..वहाँ पर कुछ नहीं दिखाई दिया तो एक बैंच पर बेठ गई। उस बैंच पर कुछ लोग पहले से बैठे हुए थे। पास में बैठा एक आदमी जो कि नोर्वे का नहीं लग रहा था ,से मैंने पूछा कि यहाँ सार्वजनिक शौचालय कहाँ होते हैं। उसने सबासे ऊपर की मंजिल में जाने के लिए कहा। मैं बेहद थकी थी, इसलिए कुछ देर यूँ ही बैठी रही। उसे समझ में आ ही गया था कि मैं नई हूँ, वह मुझसे अंग्रेजी में बात करने लगा, कहाँ से आई हूँ, क्यों आई हूँ आदि। जब मैंने उससे उसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह चिले रहने वाला है और यहाँ ड्राइवर का काम करता था, लेकिन पिछले दिनों एक्सीडेंट होने के कारण वह बेकार है। शाम को यूँ ही माल में आकर बैठ जाता है, या फिर किसी ऐसे केन्द्र में चला जाता है, जहाँ नशे की लत वाले युवकों का इलाज होता है। वहाँ पर जाकर उन्हें बइबिल आदि सुनाता है।

यहाँ पर नशे की लत काफी लोगों को है क्या? मैंने पूछा तो वह कहने लगा कि अमेरिकन संस्कृति का प्रभाव सभी पर पड़ा है। परिवार के बारे में पूछने पर उसने बताया कि उसके तीन बेटे हैं, और वह ही माँ और पिता दोनों का दायित्व निभाता है। पत्नी के बारे में पूछने पर कहने लगा कि उसे किसी नोर्वे वासी से प्यार हो गया तो वह उसके साथ चली गई, मैंने अपनी पत्नी से कहा कि तुम जाओ, लेकिन मेरे बेटों को यहीं छोड़ जाओ, दूसरा व्यक्ति उसका ख्याल नहीं रख सकता है।

अब वह महिने में एक बार आती है, बच्चों के साथ रहती है। मैं उसकी मेहमान की तरह देखभाल करता हूँ। अब वह मेरी पत्नी नहीं, बस दोस्त है। मै अपना समय समाज सेवा के लिए लगाता हूँ।

थोड़ी देर बात वह उठा और कहने लगा कि मैं आपकों ऊपर जाने का रास्ता बताता हूँ, मुझे उससे काफी कुच जानकारी मिल रही थी, इसलिए उसके साथ ऊपर तक चली आई। ऊपर शौचालयों के दरवाजे पर डिब्बा सा था, उसने एक दरवाजे के डिब्बे मे एक सिक्का डाला, और मुझ से कहा कि मैं चली जाऊँ। तभी मुझे पता चला कि शौचालय के लिए शुल्क है। मैंने बाहर कर उसे धन्यवाद दिया तो कहने लगा कि हो सकता है कि आपके पास खुला सिक्का ना हो, इसलिए मैंने डाल दिया।

आप काफी पियेंगी, उसने मुझसे पूछा। मैं उसकी कहानी सुनना चाह रही थी, और यह भी महसूस कर रही थी कि वह अपनी कहानी कहने को आतुर है। हालाँकि बातचीत इतनी आसान नहीं थी, क्यों कि वह इंगलिश सोच सोच के बोल रहा था।

हम ऊपर बने काफी हाउस में बैठ गए तो वह दो काफी ले आया। काफी पीते वक्त मैंने उसकी फोटों ली। वह बताने लगा कि उसे यह देश बिल्कुल पसन्द नहीं है, लोग ६ महिने तक घरों में घुसे रहते हैं, हमेशा बर्फ और अंधेरा... सर्दियों के दिनों में वह अपने देश चला है, लेकिन पैसा कमाने के लिए उसे नोर्वे आना ही पड़ता है। नोर्वे में पेट्रोल और मछली के निर्यात के कारण काफी धन आ गया है, और यह युवा वर्ग को भ्रमित भी कर रहा है। लेकिन ऐसे युवकों की कमी नहीं जो अपने लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ रहे है। ओडवे के तीनों बच्चे बर्गन में स्वतंन्त्र रहते हैं, लेकिन अपने अपने क्षेत्र मे लगातार आगे बढ़ रहे हैं। केरि तो फिल्म मे काफी नाम कमा रही है। बाकी दोनों बच्चे भी रिसर्च कार्य कर रहे हैं।

काफी पीने के बाद मैंने चिले से आए उस व्यक्ति को बताया कि मैं शहर में चलने वाली फ्री बस में घूमना चाह रही हूँ। तो वह मेरे सा बस स्टेण्ड तक चला आया। मेने जानबूझ कर उसकी पत्नी और बच्चों की बात नहीं चलाई। लेकिन मुझे यहतो पता चल ही रहा था कि वह पत्नी के जाने के बाद भीतर से बेहद अकेला हो गया है। उसके चेहरे पर एक भोलापन सा था और व्यवहार में सादगी थी। यही कारण मै उसको साथ चलने के लिए मना नहीं कर पाई।

कुछ देर बाद हम फ्री बस में बैठ गए, यह संभवतः सैलानियों को ध्यान में रख कर चलाई गई है, हालाँकि मैंने उसमें स्कूल बच्चों को बैठते उतरते देखा। बस एक तरह से शहर की परिक्रमा लेती है। बर्गन छोटा सा शहर है, हर कोने से समुद्र दिख ही जाता था,और गर्दन ऊपर करते ही पहाड़, लेकिन इमारते भी कम सुन्दर नहीं। ज्यादातर इमारतें सौ दो साल पुरानी थीं। बर्गन शहर स्तवांगर की वनिस्पत पुराना शहर लगा।

दस पन्द्रह मिनिट में ही हमने बस में शहर का चक्कर लगा लिया, और होटल के करीब उतर गए। मैंने उसे भारतीय नमकीन का पैकेट दिया और विदा माँगी। -मुझे शाम को किसी से मिलने जाना है, आप भारत आएँ तो मिलें।

वह चुपचाप हाथ मिला कर चला गया।

यात्रा में हम जगह की बातें तो करते हैं, उन लोगों को छोड़ देते हैं, जो अनायास अपने मन को हमसे बाँट लेते हैं। मैं नहीं जानती कि नशा खोरो और बूढ़े लोगों की सेवा के द्वारा मन को बहलाने की कोशिश करने वाले उस युवक के मन के दर्द को कोई बाँट पाया या नहीं। शायद अनजान व्यक्ति से मन के दुख को बाँटना आसान होता है।

शाम को सात बजे कैरी आकर अपने साथ कैफे लेआई, जहाँ उसकी बहन क्यूहु और भाई हमारा इंतजार कर रहे थे। यह कैफे भी संभवतः आर्टिस्ट लोगो का अड्डा रहा होगा, क्यों कि लोगों को कई ग्रुपों में बँटे और गंभीर चर्चा करते देख पा रहे थे। ओदविग के तीनों बच्चे एक ही शहर मं रहते हुए अलगअलग रहते हैं, युवकों की यह स्वतंन्त्रता यूरोपीय जीवज शैली का अंग है, जिसे बड़े सामान्य रूप में स्वीकार किया जाता है।

कैफे का मैनु नोर्वेजियन भाषा में था, लेकिन एक आइटम के आगे इन्डियन लगा हुआ था। कैफे मालिक अग्रेजी जानता था, पूछने पर बताया कि जब भारत ब्रिटिश के आधीन था, तब इस खाद्य पदार्थ को इण्डियन नाम देया जाने लगा। बात मुझे खास समझ में नहीं आई, लेकिन इतना जरूर महसूस हुआ कि इण्डिया शब्द इन लोगों के लिए नया नही है। मुझे नोर्वे के खाने मं विशेष प्राकृतिक स्वाद का अनुभव हुआ, और एक बार भी नहीं लगा कि खा नहीं सकती। कैफे के बाहर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के पोस्टर लगे हुए थे। पता चलता था कि शहर में सांस्कृतिक वातावरण अवश्य है। औडवे का बेटा संगीत और गणित के समबन्ध को लेकर रिसर्च कर रहा है। बेटी भी फिल्म से जुड़ी है, औरछोटी बेटी के रिसर्च का विषय भी भाषा और कला से जुड़ा है।

खाने के बाद कैरि हमें शहर में घुमाती हुई पहाड़ी की ओर ले गई। हालाँकि मैं तीसरी ‍ चौथी बार शहर में घूम रही थी, लेकिन हर चीज मनको आकर्षित कर रही थी। शहर के बीचों बीच बने थियेटर KUNSTMUSEENE - I BERGEN के आसपास अनेक मूर्ति शिल्प थे। यूरोप में पाए जाने वाले सभी पुरातन शिल्पं में रोमन शिल्पकला का स्पष्ट प्रभाव है। देह को दैवीय बनाते हुए , अंग अंग के कौशल को दिखाना इनका उद्देश्य है। इन शिल्पों में नग्नता रोमांचक नहीं बल्कि मानवीयता को दैविकता के करीब ले जाने की कोशिश सी लगती है। एक जगह मुझे एक मूर्ति के सिर पर कौआ बैठा दिखाई दिया, मूर्ती के कंधों पर बीठ पड़ी थी, तो मुझे भारत के चौराहों पर खड़ी मूर्तियों की बरबस याद आ गई। गलियों से गुजरते हुए कई चर्च दिखाई दिए, जिनमें कई तो बेहद पुराने थे। यूरोपीय चर्च साजसज्जा में भारतीय मन्दिर शिल्प से कम नहीं हैं।

उन दिनों बर्गन में सड़क पर कुछ काम भी चल रहा था, कई जगह सड़कें खुदी सी थी। यूरोपीय अपनी संस्कृति के प्रति बेहद जागरुक होते हैं। प्राचीन काल में यूरोप की सड़कों पर चौकोर पत्थर खुदे हुए लगे थे। यूरोपीय उन सड़कों को आज भी पुरातन रूप में रखना पसन्द करते हैं। एक जगह मैंन देखा कि सड़क पर काम पूरा होने के बाद एक व्यक्ति पुराने पत्थरों को उसी तरह से लगा रहा है, जिस तरह पहले लगे होंगे। यह काम आसान नहीं है, पर संस्कृति को बचाए रखने की आदत उन्हें बचाए हुए है।

हम पहाड़ी के नीचे आए, पहाड़ी के ऊपर जाने के लिए एक रेलगाड़ी का इंतजाम है, इस रेलगाड़ी का निर्माण 1918 में हुआ था, स्टेशन पर कई चित्र थे, जिसमें गाड़ी निर्माण की प्रक्रिया बताई गई थी। इस काल के अन्य चित्रों में पुल निर्माण आदि को भी दिखाया गया है। नोर्वे वासियों का जीवनबेहद सरल नहीं रहा है। बारह में से आठ महिने बरफ का सामना करने वाले यहाँ के निवासियों का जुझारुपन कुछ सीकने को ही प्रेरित करता है। गाड़ी के ऊपर चलने की प्रक्रिया बेहद सरल थी। पुली और लोहे के चैन के सहारे रेल ऊपर खींची जाती थी। आज भी उसी पुरानी प्रक्रिया कोअपनाया जा रहा है।

नोर्वे महंगा देश है, अतः यहाँ धनिक सैलानी ही आते हैं, यही कारण है कि यहाँ एशियायी लोग कम दिखाई दिए। पहाड़ी के ऊपर जाते ही मन भीग सा गया। पहाड़ी ठलावों पर घने जंगल, घनी आबादी वाला शहर और समुद्र..लेकिन एक बात थी जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया,और वह थी आवाज। सागर , शहर और मशिनों की आवाज ऊपर तक पहुँचते पहुँचते इस कदर घनीभूत हो गई थी उन्हे अलग अलग करना मुश्किल था। ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव मुझे पहली बार महसूस हुआ।

मुझे याद आया कि ओडवे ने बताया था कि वह अपने बचपन में पहाड़ों के ऊपर बाँसुरी कोलेकर चली जाती थी और घण्टों तक प्रकृति का आनन्द लेती थी। उस के बाल्यकाल में बर्गन विकसित शहर नहीं था। लेकिन ओडवे को आज भी बर्गन की यादें सताती है। स्तावंगर मे वह ब्रेयान के कारण पहुँची, हालाँकि दोनो में मित्रताबर्गन में ही हुई थी।

जब हम लोग वापिस लौटे हर सड़क पर तो मन बेहद भीगा था। पहाड़ी जंगल और बाँसुरी लिए युवति की छवि बार बार मन में उभर आती थी।

रात काफी हो गई थी, फिर भी सूरज का उजाला था। कैरि ढलाव से ही लौट गई, मैं आस पास की दूकानों में झाँकती हूई होटल की ओर चलने लगी। बर्गन मे जो दूसरी बात मैंने देखी वह यह थी कि बर्गन में हर सड़क में दो चार आर्ट गैलरियाँ थीं। पता नहींयह सैलानियों के लिए थीं़ या फिर जन निवासियों के लिए। नोर्वे के लोग बड़ी खूबसूरती से घर सजाते हैं, इसमे कोई सन्देह नहीं।
उन्हें चीजें एकत्रित करने का भी शौक है।

इस बारे में ओडवे का कहना था कि हम लोग सर्दी के कारण अधिकतर घरों में ही रहते हैं, शायद इसीलिए चीजे संग्रहित करना हमारा शौक बन गया है।

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