इतिहास रोमन संस्कृति के बारे में जिस तरह से चीख चीख कर कहता है, रोम अनजाने में हमारे मन में प्रवेश कर जाता है। मेरे मन में यदि किसी जगह को देखने की इच्छा थी तो वह जगह थी रोम। मोन्जा तक की यात्रा काफी अच्छी रही, इसलिए रोम के प्रति उत्सुकता बढ़ती गई। मोन्जा से रोम की यात्रा हमने रेल से की। यूरोपीय रेले, बड़ी सुखद होती हैं, मेरे सामने एक महिला अपने किशोर बेटे के साथ बैठी थी, मेरी बगल वाली सीट में उनकी कोई प्रोढ़ा मित्र बैठी थी। किशोर बड़ा नटखट और बातूनी था, माँ बेटे जिस तरह से हँसी मजाक कर रहे थे, मन प्रफ्फुलित हो उठा, महिला को अंग्रेजी नहीं आती थी, लेकिन किसोर स्कूल में अंग्रेजी सीख रहा था, इसलिए वह दुभाषिया बना था। सारे रास्ते माँ बेटे बतियाते हँसते दिखाई दिए। मुझे अपने देश की याद आ गई, उन लोगों को देख कर कुछ ऐसा ही लग रहा था कि अपने देश के ही लोग हैं।
पूरा रास्ता हँसते हँसते पार हो गया, रोम आया तो पता ही नहीं चला। रोम में उतर कर मैं रोबर्टों का इंतजार करने लगी। थोड़ी देर में रोबर्टों आते दखाई दिए, रोबर्टौ करीब चौहत्तर बरस के हैं, लेकिन बेहद चुस्त दुरस्त लगते हैं। वे मुजे ापने घर ले गए। उनकी पत्नी पोला समाज सेविका और समाजशास्त्री हैं। उम्र उनकी भी कम नहीं होगी लेकिन जिस तरह से वे तैयार थीं, मुझे काम्लेक्स होने लगा। वे पूरे मेकअप, और बेहद फैसनेबिल कपड़ों में थी। मेरे घर आते ही उन्होंने मुझे मेरा कमरा दिखाया और खाना परस दिया। रोम में खाने का तरीका काफी अलग है़ यहाँ कई कोर्स में खाना परसा जाता है। एक के ऊपर एक तश्तरी रखी हुई थी। एक कोरस खत्म होते ही उस तश्तरी को हटा दिया जाता और दूसरे कोर्स के लिए नई तश्तरी में परोस लिया जाता है। पहले सूप, फिर सलाद , फिर पात्जा.. ।
मेरी तबियत अभी तक पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी। खाना काफी भारी हो गया। खाने के बाद रोबर्टों ने कहा कि कमरे मं आराम कर लो, कुछ देर बाद हम घूमने जाएँगे। मैं कमरे में जाते ही सो गई, शाम को उठी तो हम घूमने चल दिए थे।
रोबर्टों ने अपनी जीवन यात्रा गाइड के रूप में शुरु की थी, इसलिए वे जैसे ही सड़क पर पहुँचते कुछ ना कुछ बताने लगते। रोबर्टों के पास बताने को काफी कुछ था भी , ना जाने कितनी पीढ़ियों से वे त्रस्तेवर में रह रहे थे। शिशु जनम के साथ ना जाने कितनी जानी अनजानी स्मृतियों को लेकर आता है, बीज बनने की गाथा स्मृतियों के संघटित होने की गाथा भी तो है। जिस बिल्डिंग में वे रहते हैं वे सौ बरस से ज्यादा पुरानी है, उनके फ्लैट में सामान है वह सदियों से संकलित किया गया है, भव्य पैन्टिंग्स, क्राकरी फर्नीचर, सभी बेहद पुराने और अपने भीतर कोई ना कोई कहानी लिए हुए। रोबर्टो ने एक ऐसी पैन्टिग दिखाई जो थोड़ी अधूरी थी, लेकिन वक्त के अपउनके पिता ने किसी बड़े पकाकाल द्वारा बनाई गई थी, आज मैं लिखते वक्त उस कलाकार का नाम तो भूल रही हूँ, लेकिन पैंन्टिंग का अधूरापन मन में अभी टंगा है। त्रस्तेवर रोम की प्रमुख सड़क है, जिसमें भव्य इमारते हैं, जो काफी पुरानी हैं। आश्चर्य की बात यह है कि कोई भी इमारत पुरानी सी नहीं लगती। तेवरे ( Teverre rivers ) उस नदी का नाम है, जिसके किनारे रोम बसा है, इसलिए नदी पार बस्ती को त्रस्तेवरे कहा गया है। रोबर्टो यहूदी हैं, इसलिए उनकी कथा यात्रा अनजाने यहूदी समाज के आसपास घूमती है। वे बताते हैं कि इसी जर्मन यहूदियों की तलाश में उनके घर तक पहुँचे थे। उस वक्त उनके माता पिता और अन्य कुछ रिश्तेदार घर छोड़ के अलग अलग जगहों में पनाह ले रहे थे। घर को बूढ़ी बीमार दादी और उनकी एक बहन जो कि उनके परवार की एकमात्र ईसाई धर्म मानने वाली सदस्या थीं, के भरोसे छोड़ गए। लोगों का विचार था कि जर्मन बूढ़ों को परेशान नहीं करेंगे। लेकिन उन की क्रूरता की सीमा की कोई रेखा नहीं थी, उनकी इमारत तक पहुँचने वाले थे , कि उनके नीचे की मंजिल में रहने वाली एक महिला ने चतुराई से बूढ़ी दादी को लिफ्ट से पलंग सहित अपनी बिल्डिंग में ले गई। किसी ने सोचा भी नहीं था कि ईसाई धर्म मानने वाली वृद्ध महिला को किसी तरह का खतरा हो सकता है, लेकिन जर्मन सैनिक किसी तरह की छूट देने वाले नहीं थे। रोबर्टों की आण्टी को जेल में डाल दिया गया, बाद में त्रस्तेवरे के चर्च के पोप के द्वारा दखल देने पर छोड़ा गया। इस बीच पाँच वर्षीय रोबर्टौ अपनी माँ के साथ किसी चर्च में पनाह लिए हुए थे, और पिता कहीं और छिपे थे। चर्च के द्वारा यहूदियों को पनाह देने के पीछे कारण यह था कि तत्कालीन पोप को आरंभ में तो हिटलर पर भरोसा था कि वह कम्युनिस्टों के खिलाफ चर्च का साथ देगा, लेकिन ने पोप को भी ज्यादा भाव नहीं दिया तो पोप ने चर्चों को यहूदियों की चोरी छिपे सहायता करने का गुप्त आदेश दे दिया। इसी कारण रोबर्टो के परिवार जैसे कई यहूदी परिवार ईसाई नाम से चर्च तहखाने में रहने लगे।
रोबर्टो बता रहे थे कि उस उम्र में उनके लिए सबसे मुश्किल काम था, अपने नाम को याद रखना, क्यों कि उन्हे दो नाम बताए गए थे़, एक उनके जन्म का नाम जो माता पिता ने दिया था, दूसरा ईसाई नाम जो चर्च ने दिया। रोबर्टौं अपनी माँ के साथ उसी चर्च में करीब एक साल तक रहे। उन्हे ईसाई नाम दे दिया गया था, और ईसाई प्रार्थनाएँ भी सीखाई गई थी, लेकिन उनका अधिकतर वक्त चर्च के तहखाने में चुपचाप बैठे हुए बीतता था।
"तुम सोच सकती हो कि एक बच्चे को खेलने की मनाही हो, उसे दो दो नाम याद रखने हो तो कैसा लगता होगा। " रोबर्टों की आवाज में अभी तक दर्द था।
नाम याद रखना कितना कठिन है
उसने समझ लिया था
पाँच बरस की उम्र में ही
वह भी जब कि
नाम एक से ज्यादा हों,
और यह जानना भी जरुरी हो कि
पूछने वाला कौन है
नाम से भी ज्यादा मुश्किल था,
प्रार्थनाएँ रटना
मन को यह समझाते हुए कि
यह उसकी अपनी नहीं है
प्रार्थना बहुत सी हों,
कोई फरक नहीं पड़ता
जरूरी है कि
वह नाम की तरह किसी दूसरे से
उधार ना ली गई हों
चलने से पहले मैंने अपने पर्स में एक फोल्डर रखा जिस में पाँच सौ यूरों का नोट औरपासपोर्ट और स वीसा भी था़ हालाँकि चलने से पहले मेरे मन में एक विचार आया कि इतने पैसे एक साथ रखने चाहिए कि नहीं, पर मेरे पास खुल्ले यूरो नहीं थे, और मैंने सोचा कि नोट खुला लूंगी। रोबर्टों हमें ट्राम से ले गए। वे लगातार कुछ ना कुछ दिखाते बताते जा रहे थे, अतः मेरा ध्यान उनकी बात में लगा था। रोबर्टौ रोम दिखाने के लिए बड़े उत्साहित थे, लेकिन अभी हम सेन्टर में खड़े ही थे कि मुझे लगा कि मेरा बैग कुछ हल्का सा है। मैंने देखा तो बैग की जिप खुली थी, और फोल्डर गायब... कुछ पल के लिए सुन्न रह गई, पैसे गए तोो अलग बात है, लेकिन यहाँ तो वीसा पासपोर्ट ही गायब है। रोबर्टों ने कहा कि हो सकता है कि घर में भूल आई हो , मुझे मालूम था कि मैंने फोल्डर साथ रखा था, लेकिन घर आना ही पड़ा, लेकिन कुछ नहीं, फिर तो रोम की इमारते देखने की जगह हम पुलिस डिपार्टमेन्ट के चक्कर लगाने लगे। रोबर्टो के सा्थ होने के कारण भाषा की समस्या नहीं थी, लेकिन मैं मन में बेहद अजीब सी शर्म महसूस कर रही थी कि इस उम्र में रोबर्टौं को परेशान कर रही हूँ। दूसरे दिन शाम तक हमे पास पोर्ट तो नया मिल गया. लेकिन वीसा बनने की समस्या बरकरार थी। लेकिन इस बीच काफी कबायत हो चुकी थी। पासपोर्ट बनने के बाद हम पासपोर्ट आफिस की गली से लगी दूसरी सड़क में खाना खाने आए तो रोबर्टों ने थर्राने वाली बात बताई।
रोबर्टौ बताने लगे कि यह VIA RASELLA है जहाँ यहूदियों के कत्ले आम की नींव रखी गई थी। जर्मन सेना इस गली से मार्च कर रही थी, किसी बच्चे ने शैतानी में किसी बिल्डिंग के पास एक पटाखा रख दिया। जर्मनों के दोचार
सिपाही जख्मी हो गए, बस फिर क्या था, उन्हे उस गली में रहने वाले करीब 300 यहूदियों को चुन चुन कर मार दिया। ंगे
मैं रोबर्टों की बात सुन रही थी, रोम का इतिहास खून से रंगा है, जितनी लड़ाइयाँ , जितने युद्ध यहाँ हुए हैं, उतने संभवतः ही किसी और देश हुए होंगे, लेकिन आश्चर्य यह देख कर होता है युद्ध और क्रूरता के मध्य कला किस तरह से महत्वपूर्ण स्थान बना पाई। इस शहर के चप्पे चप्पे में कलात्मक वैभव देखते ही बनता है। हर नुक्कड़ पर एक फौव्वारा, हर गली में इतिहास की खिड़की, शहर नहीं मानों एक बड़ा अजूबा म म्यूजियम हो।
शाम को कविता पाठ था, जिसका ईंतजाम रीटा और एंजिलो ने एक लाइब्रेरी में करवाया था, जहाँ पर भारतीय कैफे था, और संस्कृत पढ़ाई जाती थी। यूरोप वासी आज भी पुरातन इतिहास और संस्कृति में रुचि लेते हैं। शाम को हम लोग लाइब्रेरी पहुँच गए। छह बज चुके थे, लेकिन Professor Filippo Bettini, जो कि Allegorein नामक एसोशियेसन के प्रमुख थे और Mediterranea नामक महत्वपूर्ण पोइट्री फेस्टीवल चलाते हैं, अभी तक नहीं पहुँचे थे। मुझे असमंजस में पड़ा देख कर रोबर्टों बोले- हम लोग इतालवी हैं, अंग्रेज नहीं। हमारे यहाँ छह बजे का मतलब साड़े छह या फिर सात बजे होता है।
मुझे हँसी आ गई, तो फिर यह समय की पाबन्दी की बीमारी मात्र अंग्रेजों की है, बाकि सब लोग तो पूरे मनुष्य हैं, मन का कहना मानने वाले।
मेसीमों भी रोम आने वाला था, मेसिमों ने मेरे द्वारा किए गए अथर्ववेद की प्रेम कविताओं के अनुवादों का इतालवी में अनुवाद किया था। रीटा भी इतालवी कवयित्री है।
इस तरह के कार्यक्रमों मे पहुँच कर मैं अक्सर घड़ी की ओर देखना बन्द कर देती हूँ। समय को अपने ऊपर से गुजर जाने देती हूँ। समय एक ही हम उसकझरना होता है, अक्सर हम धारा के विरुद्ध तैरने की कोशिश करते है, यदि ईहम अपने को उस प्रवाह के साथ छोड़ दें दो समय हम पर हावी नहीं होता।
यहाँ पर भी कविताएँ अनुवाद के साथ पढ़ी गईं, सहगल जी को प्रस्तुति का पहला पूरा मौका मिला था। कविताओं के अनुवाद रोबर्टों ने किए, करीब आधे घण्टे तक मेरी कविताओं का पाठ चला, उसके बाद मैंसिमो और मैंने अथर्ववेद की प्रेम कविताओं का पाठ किया। फिर सहगल की कविताओं का पाठ हुआ, सहगल की छह कविताएँ का अनुवाद किया गया था।
दो घण्टे के इस कार्यक्रम को अच्छी तरह से निभाया गया। अनुवाद पाठ भी बेहद अच्छा था। सहगल का यह पहला कार्यक्रम था, और यह मौका उन्हे कृत्या के माध्यम से मिला था, वे रोबर्टौ आदि किसी को नहीं जानते थे। लेकिन उन्होंने केवल रोबर्टों को धन्यवाद दिया, कृत्या का नाम तक नहीं लिया। वे कृत्या के सान्निध्य में रीटा और एंजिलो के घर टिकाए गए थे, लेकिन उनके धन्यवाद भाषण में रीटा का नाम तक नहीं था। मुझे बुरा तो लगना ही था, सहगल चा। मैंने इतना नाशुक्रा आदमी देखा नही था। मैंने ही अन्ततः सहगल को कृत्या के माध्यम से कविता पाठ के लिए धन्यवाद दिया।
रात को हमे भारतीय खाना खिलाया गया, लेकिन जो परोसा गया। खाना बंगलादेशियों द्वारा बनाया गया था, स्वाद का ाजीब सा घल मेल, बंगला समोसों के साथ लस्सी । खाने परोसते समय इतालवी आचार का ध्यान रखा गया था, इसलिए समोसा चावल के बाद आया।
दूसरा दिन इतना आसान नहीं था, क्योंकि वीसा की प्रक्रिया बाकि थी, मैंने अपना सामान टटोला तो देखा कि हेल्थ इंश्योरेंस के कागज और पेन ड्राइव भि नदारत था, यह कब और कैसे हुआ समझ में नहीं आया। मेरी समस्या यह थी कि मेरा वीसा नोर्वे से मिला था, लेकिन इस वक्त मैं नोर्वे की यात्रा खत्म कर आई थी, और वियेना जाने के लिए आस्ट्रिया जाना चाहती थी। फिर भी मैंने नोर्वे राजदूतालय से वीसा की मांग की थी, और साथ में पेपेर की कटिंग भी दी, जिसमें नोर्वे के अखबार में मेरे बारे में रिपोर्ट दी गई थी। उन लोगों को वीसा बनाने में एतराज तो नहीं था, लेकिन उनका इंटरनेट सिस्टम डाउन था। उन्होंने हमसे आस्ट्रिया के दूतावास में कोशिश करने को कहा़। इसलिएब आज मैं और रोबर्टों सबसे पहले आस्ट्रिया के दूतावास में गए, वहां काफी देर बैठाए रखने बाद हमे कह दिया गया कि वे वीसा नहीं बना सकते। रोबर्टो अपना आपा खो बैठे, और मेरा तो रोना ही छूट गया। मैंने घर में प्रदीप को फोन कर के इंश्योरेन्स की एक कापी जो कि मेरे कम्प्यूटर में थी, बेजने को कहा। प्रदीप आफिस में थे, और हैदराबाद के लिए निकलने वाले थे, वे झल्ला उठे, बाग्यवश उनकी फ्लाइट डिले हो गई, और वे तुरन्त घर गए और इंश्योरेंस के पेपेर को PDF फाइल बना कर भेज दिया। जब काम बिगड़ना होता है, बिगड़ता जाता है और जब ठीक होना होता है हल पल सहायक बनता जाता है। हमे २ दो बजे से पहले नोर्वे के राजदूतालय पहुँचना था, क्यों कि वहाँ से खबर आ गई थी कि उनका कम्प्यूटर ठीक हो गया है, और वे तीन बजे से पहले आने पर वीसा दे देंगे। सहगल जो कृत्या के बलबूते पर मुफ्त में रह रहे थे, खा पी रहे थे, कहीं भी दिखाई नहीं दिए। वे अपने में आराम से घूम रहे थे। एक दिन तो एंजिलो ने छुट्टी लेकर उन्हे घुमाया फिराया, लेकिन दूसरे दिन उसे आफिस जाना ही पड़ा। रोम में काफी भारी टिकिट लगता है, और सहगल उससे भी बचना चाहते हैं, इसलिए वे किसी ना किसी से लगे रहते हैं कि तिकिट का पैसा भी खर्च ना करना पड़े। जब अकेले जाना पड़ा तो वे हर जगह को लेवल बाहर से झांक कर चले आए। अपने देश में कौन पूछेगा कि कहाँ गए, कहां नहीं गए। मेरा घूमना अभी शुरु ही नहीं हुआ था।
दोपहर बाद सारा काम आसान हो गया, मानो कि एक सैलाब आया था जिसने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया। जैसे ही नोर्वे के दफ्तर में बैठी आफिसर ने मुझसे कहा कि आप बैठिए, हम २० मिनिट में वीसा दे देंगे, मेरा बाँध टूट गया और आँखों से आँसू टपकने लगे। इतने वक्त में जो टेंशन मेरे भीतर जमा हुआ था, वह बहने लगा। उस महिला ने बड़े प्रेम से मुझ से कहा कि मुझे आपकी समस्या का भान है, पर कल आपका वक्त सही नहीं था। आज जितना वक्त है उसका फायदा उठाओ। चार बजे जब हम निकले हमारे पास वीसा था।
रोबर्टो ने लपक कर वक्त को अपने हाथ में ले लिया और सबसे पहले पास के एक पार्क में ले आया, जो इतालवी अभिनेत्री के नाम समर्पित किया गया था। रोबर्टो बताने लगे कि वे अपने बचपन में इस पार्क में आकर घण्टों बैठा करते थे। यहाँ से रोम पूरा कि पूरा दिखाई देता है। रोम शहर सात पहाड़ियों पर 21 April 753 BC को बसाया गया था , इन पहाड़ियों के नाम हैं the Aventine Hill , Aventine Hill, the Caelian Hill , , the Capitoline the Esquiline Hill , the Palatine Hill , the Quirinal Hill , and the Viminal Hill कहा जाता कि तेवरे नदी के अलावा एक और नदी शहर के बीच में से गुजरती थी जिसका नाम था Aniene जो बाद मे जाकर तेवरे में मिला जाती थी।
शायद यही कारण है कि रोम के हर चौराहे पर कोई ना कोई फव्वारा देखने को मिल जाता है। न जाने कितने भग्नावेश ना जाने कितनी इमारतें, हर किसी में पानी का फौवारा।
रोबर्टो ने घड़ी देखी, और कहा कि अभी हमारे पास वक्त है, हम The Colosseum or Roman Coliseum हैं। इसे Flavian Amphitheatreया Amphitheatrum Flavium, जो रोमन साम्राज्य की अनेक गाथाओं को अपने भीतर समेटे हुए शहर के बीचोबीच खड़ा है, ना जाने कितने साम्राज्यों का पतन इसने देखा, ना जाने कितनी धार्मिक आँधियाँ सहीं, और भूकम्पों से टकराया, लेकिन भग्नावेश में भी धरती का आश्चर्य बना हुआ है। इसका निर्माण 70 और 72 AD साम्राट Vespasian द्वारा आरम्भ किया गया और निर्माण पूरा हुआ 80 AD में सम्राट Titus के शासन काल में पूरा हुआ। Amphitheatrum Flavium नाम Vespasian और Titus सम्राटों के पारीवारिक नामों पर पड़ा।
हम लोग कोलोसियम के बाहर टिकिट की लाइन में खड़े हुए। रोबर्टों चोहत्तर बरस के हैं, लेकिन अपनी उम्र से कम लगते हैं। रोम में पैंसठ साल के ऊपर के लोगों को टिकिट नहीं देना पड़ता है। लेकिन रोबर्टो अपना परिचय पत्र साथ रखते हैं, जिससे उनकी असली उम्र के बारे में पता चल सका। जब वे खिड़की पर पहुँचते हैं और मेरे लिए एक टिकिट खरीदकर अपने लिए पास माँगते हैं तो खिड़की के भीतर बैठी महिला आश्चर्य से कहती है, लेकिन आप तो सीनियर सिटिजन नहीं लगते। रोबर्टो अपना परिचय पत्र निकालकर दिखाते हैं। दोनों में इतालवी भाषा में संवाद होता है। एक हल्का फुलका मजाक भी हुआ।
मैं देखती हूँ कि रोम में लोग काफी खुल कर हँसी मजाक कर लेते हैं। रोबर्टों तो हर किसी से बेहद खुल कर बात करते हैं, चाहे वह टैक्सी ड्राइवर हो या दूकानदार। उनकी आत्मा उस नगर में रची बसी है। कोलोसियम का टिकट नौ यूरो का था जो करीब साड़े पाँच सो का हो जाता है, जब से मेरे पैसे खोये , मैंने अपने पास पैसे रखने बन्द कर दिए। चलने से पहले मैं पैसे रोबर्टों को संभलवा दे देती हूँ, शाम को वे बता देते हैं कि कितने पैसे बाकी हैं। रोबर्टो रिटायर्ड हैं, उनकी पत्नी को देख कर यह लगता है कि उनका महिने का खर्चा काफी होता होगा, इसलिए मैंने इस बात का ध्यान रखा कि रोबर्टों का खर्चा ना हो। रोबर्टो भी बेहद संभल कर खर्च कर रहे थे। ों
हम लोग कोलोसियम की सीढ़ियों पर चल कर ऊपर जाते हैं, पतली संकरी सीढ़ियाँ लखनऊ की भूल भुलैया की सीढ़ियों की याद दिलाती हुई सी।
कोलोसियम की अर्धचक्राकार आकृति का है जिसकी लम्बाई करीब 640 रोमन फीट और चौड़ाई 528 रोमन फीट है , इसके आधार का क्षेत्र फल 24000 मीटर स्कायर है। बाहरी दीवारों की ऊँचाई 165 रोमन फीट है । इसके अर्धचन्द्राकार थियेटर में जाने के कई रास्ते हैं, जिससे यह आपदावस्था मे आसानी से खाली किया जा सके। इसमें एक वक्त में करीब 50,000 लोग बैठ सकते थे। इसके अस्सी द्वार हैं, जिनमें से छहत्तर आम आदमी के लिए थे. और बाकी चार राजकीय दर्शकों के लिए थे।
कोलोसियम रोम के क्रूर मनोरंजन की गाथा कहता है। यहाँ दासों को जंगली जानवरों से लड़वाया जाता था। थियेटर के नीचे की मंजिल में क्रूर जानवर रखे जाते थे, जिन्हें दक्षिण अफ्रीका के जंगलों से पकड़ कर लाया जाता था। दूसरी ओर दासों को पाला जाता था। लड़ाई एक पक्ष की मृत्यु तक चलती थी। जीतने वाले की जिंदगी भी राजा के हाथ में होती थी।
रोबर्टो जब कथा कह रहे थे, मेरा रोम रोम सिहर रहा था. क्रूर मनोरंजन भारतीय संस्कृति में नहीं के बराबर रही है। मुझे लगा कि यही कारण होगा कि भारत अंहिसा को स्थान मिला और कई धर्मों का उदय भी हुआ।
कोलोसियम के ऊपर म्यूजियम था, जिसकों देखने में काफी वक्त बीत गया। रोबर्टों इतिहास से गुजरे व्यक्ति हैं, वे लगातार कुछ ना कुछ बताते जा रहे हैं, जैसे कि यहूदियों के दास बनने की कथा, तरह तरह के दरवाजे जहाँ पर राजाओं ने अपनी विजय के चिह्न खोदे हैं। मेरा दीमाग सुन्न होता जा रहा है, बस एक दृश्य दिखाई दे रहा है - दर्शकों की बहशी चीखें, भूखे जानवरों की पीड़ा और दासों का जीवन संघर्ष....
सवाल यह है कि हम अपनी क्रूरता को पीछे छोड़ आए या फिर आज भी नकली मुखौटे में छिपाए हुए हैं।
कोलोसियम कई बार टूटा, कई बार बनाया गया, युद्धों से लेकर भूकम्पों तक ने इसे चकनाचूर करने की कोशिश की, लेकिन आदमी सर्वविजयी बनने की आकांक्षा की तरह पूर्णतया नष्ट नहीं हो पाया। एकड़ों भूमि में पसरा इस थियेटर में आज भी मृतकों की चीखें घूमती होंगी। कहा जाता है यहाँ खेले गए क्रूर खेलों में कम से कम 5000.000 मनुष्य और एक लाख जानवर मारे गए होंगे। मुझे अपने देश के पुरी के खंडहर याद आते हैं, जहाँ पर चीखों की जगह संगीत की लहरें उभरती रही हैं। कहा जाता है कि यहाँ पानी भर कर सामुद्रिक खेल भी खेले गए।
हम कोलोसियम की छत पर जाते हैं जहाँ से पूरा कि पूरा रोम दिखाई देता है। हम महलों के भग्नावेशों गलियारों
रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ है, न जाने कितनी सदियों की गाथा है इसमें। हम लोग खंडहरों के बीच घूमते घूमते न जाने किस इतिहास के दरवाजे में घुसते हैं, और न जाने किसमें से बाहर निकलते हैं। हर सम्राट अपनी जीत की कथा दरवाजा बनाकर लिखता है, सोचता होगा कि वह इन दरवाजों के द्वारा इतिहास की अमिट रेखा बन जाएगा, रोबर्टों हर युद्ध के परिणाम विजय द्वार के बारे में बताते हैं। दरवाजों पर खुदे विजय चिह्नों को समझाते हैं, कुछ दरवाजे टूट फूट गए, कुछ अभी भी बाकी हैं, मेरे दीमाग में नाम नहीं घुसते, बस युद्ध का घोष घुन्नाता है।
कान सुन्न होने लगे हैं, मन खट्टा हो रहा है,,, हम लोग लौट आते हैं, रात को रीटा के घर खाना है, उससे पहले वियना के लिए टिकिट भी बुक करना है, सहगल यह छोटा सा काम कर सकते थे, लेकिन उनका ध्येय बस अपने खाने पीने के साथ अपना ख्याल रखना है। वे सारे दिन बाजारों में भटक कर शाम को रीटा के घर चले आए होंगे। कोलोसियम आदि जाने के लिए टिकिट की जरूरत है, जिसे वे नहीं खरीदेंगे। मुझे मालूम है, कोलोसियम जमीन पर ही नहीं मनों पर भी खड़े होते हैं।
घर लौट कर हम तीनों, मैं रोबर्टो और पोला रीटा के घर के लिए कार में चलते हैं, रोबर्टों अभी भी रोम की कथा कह रहे थे। रीटा का घर रोम का नये बसे हिस्से में था, इसलिए कुछ नए तरीके का था। मैं रोबर्टों से पूछती हूँ कि रोम में किसी भी जगह पंखे नहीं दिखाई दिए, जबकि मौसम थोड़ा गरम ही है। वे बताते हैं कि रोम में पंखे तो उन्होंने अपने बचपन से नहीं देखे, आजकल ज्यादातर घरों में ए सी होते हैं, लेकिन पंखो का चलन कभी नहीं रहा। हम रोम के नए हिस्से में आ पहुँचे हैं, यहाँ पर रोम आम शहर सा लगने लगा है। रोबर्टों बताते हैं कि शहरी इलाके में इमारत में एक ईंट तक लगाने के लिए सरकार से इजाजत लेनी पड़ती है, लेकिन बाहरी इलाके में इमारते आम शहरों जैसी हो सकती हैं।
रीटा के घर में तीन चार परिवार इक्कट्ठे हुए हैं, सभी इतालवी भाषा में बात कर रहे थे। बीच बीच में एंजिलो और रोबर्टों अंग्रेजी में कुछ वाक्य समझा देते। खाना लजीज था, बात चीत काफी लम्बी चली, मेरी आँखे मुन्दने लगी तो मैं करीब बिछे सोफे में जाकर लेट गई, और अनायास सो गई।
काफी रात गए हम घर लौटे।
अगले दिन रोबर्टो काफी पहले तैयार हो गए, हम दस बजे वेंटिकन सिटी के लिए निकल पड़े। रोम आओ और वेंटिकन सिटि ना जाओ , ठीक नहीं होगा। रोबर्टों को किफायत से चलना आता है, इसलिए बसों का प्रयोग कर लेते हैं। सबसे पहले हम त्रिस्तेवर में स्थित एक चर्च Sancrisogono में गए, जिसके प्रति रोबर्टो को विशेष ममता है। वे यद्यपि यहूदी है,, उनकी पत्नी ईसाई हैं, और इस चर्च से जुड़ी हैं। यूरोप के चर्चों की भव्यता देखते ही बनती है। रोबर्टो चर्च के उन हिस्सो को दिखला रहे थे, जो रोमन मन्दिरों के भग्नावेशों से बनाए गए थे। मेरी बड़ी इच्छा थी कि रोमन मन्दिर देखा जाए, लेकिन कोई भी मन्दिर अपने मूल रूप में नहीं है। चर्च जाने के लिए जो सड़क थी उसमें गाड़ियों का प्रवेश वर्जित था। यूरोप के मकान करीब करीब एक सी शैली के हैं, उन्हें देख कर मुझे बीकानेर की हवेलियाँ याद आगईं।
इसके बाद हम सान्त मरिया इन त्रस्तेवर गए, यह बेहद पवित्र स्थान माना जाता है, चर्च की नक्काशी के साथ साथ चर्च के पिछले भाग और डोम में बनी काँच की कामगारी भी बेहद मनोहर थी। सबसे महत्वपूर्ण चीज थी टाइल्स को जोड़ कर बनाई गई नक्काशी जो दूर से पेन्टिंग का आभास दिलाती हैं।
मैंने वहाँ से मारिया की एक पेन्टिंग खरीदी। उसे देख रोबर्टो चिल्ला उठा, अरे यह कैसे हो सकता है? घर पर देखना, मेरी मेज पर यही तस्वीर रखी है. मैं हँस पड़ी।
इसके बाद रोबर्टों ने तुरन्त टैक्सी की और वर्तीकन सिटी चले आए। वर्टीकन सिटि के बारे में कौन नहीं जानता, पोप का साम्राज्य है यह। इसका निर्माण सेन्ट पीटर स्काअर का इतना विशाल अहाता और लाखो की संख्याँ में लोग। फुटबाल मैच चल रहा था, इसलिए पर्यटक ही नहीं फुटबाल प्रेमी भी लाखों की तादात में थे। मेरी तो साँस फूल गई, इसे देखना शुरु किया तो रात हो जाएगी। रोबर्टो कहने लगे कि यहाँ आकर यदि म्यूजियम नहीं देखा तो क्या फायदा। हम लोग लाइन में खड़े हुए, मैंने देखा कि लाइन बेहद लम्बी है तो मैं चुपचाप आगे की ओर बढ़ गई, रोबर्टो भी लपक कर आए और पूछने लगे, अरे तुम कहाँ जा रही हो, मैंने हँस कहा कि भारतीय बुद्धि का इस्तेमाल कर रही हूँ । रोबर्टो समझ गए और हँसने लगे। थोड़ी देर में रोबर्टो ने बड़ी कुशलता से दो बार लाइन में आगे बढ़ने में सफलता प्राप्त कर ली। मैं यह देख कर हँसने लगी तो कहने लगे कि हम इतालवी लोग भी यह सब चतुराई जानते हैं।
किसी तरह से हम म्यूजियम के भीतर पहुँचे, तो मेरी आँखे चकाचौंध हो गई। बेहद भव्य म्यूजियम, उसकी छत भी इतनी खूबसूरत कि कुछ कहा नहीं जा सकता। इतनी बड़ी बड़ी मूर्तियाँ कि आदमी उसके सामने बौना लगे। रोबर्टो को हर मूर्ति के बारे कुछ ना कुछ पता है, लेकिन मेरा दीमाग नहीं चल रहा है। मैं तो केवल सौन्दर्य और शिल्प में खोई हुई हूँ। अन्ततः हम एक भव्य शिल्प के सामने जा खड़े हो जाते है " पिटी" , करुणा को सकार करती माँ मेरी जख्मी पुत्र की देह को गोद में लिए। रोबर्टो पोप का इतिहास भली भाँति जानते हैं, वे एक एक पोप का नाम लेकर उनके बारे में बताने लगे। उन्हे इस बात का आश्चर्य था कि मुझे इसाई संस्कृति के बारे में इतनी कम जानकारी है। आज मेरा कैमरा काम नहीं कर रहा था। लेकिन मन की आँखे प्रफुल्लित हो रही थी। हाँ याददाश्त इतनी तेज नहीं कि सारे नाम याद हो जाएँ। फिर भी बड़ा अच्छा लग रहा था़ आज मुझे शाम के छह बजे तक गाड़ी पकड़नी थी वियेना के लिए, सुबह सारा सामान बाँध कर आई थी, लेकिन समय की पाबन्दी तो थी। करीब दो घण्टे म्यूजियम में बिताने के बाद बाहर आए तो बेहद भूख लगी थी। हम लोग वर्टिकन सिटी की परिधि के तुरन्त बाहर बने होटल में जा कर बैठ गए। ये होटल करीब करीब वैसे ही थे जैसे कि भारत के किसी पर्यटन स्थल में होते हैं। मुझे यरोप का मिक्स्ड सलाद बेहद पसन्द आता है, मैंने वही लिया। सलाद अच्छा था। इसी बीच कई लोग आए, आबनूस से काले अफ्रीकी जो कि घड़ियाँ बेच रहे थे। रोबर्टो बता रहे थे कि वे रात रात बैठ कर खुद घड़ियाँ बनाते है और दिन भर बेचते हैं। मैंने देखा कि उनके आबनूसी रंग में भी बेहद खूबसूरती है। रोबर्टो की पत्नी पोला ने फोन कर के पूछा कि हम लोगों ने क्या क्या देख लिया, उन्होंने रोबर्टों को हिदायत दी कि रति को फन्ताना दित्रेवी जरूर ले जाना और फव्वारे में एक सिक्का अवश्य डलवाना।
खाने के बाद हम फन्ताना दि त्रेवी ( Fountain di Trevi) के लिए निकल पड़े, रोबर्टों कई शार्ट कटों को जानते हैं, रास्ते मे हमने चमड़े के सामान की दूकाने देखीं, साथ ही फैशन के सामान से भरी दूकाने देखीं। दरअसल मैं विण्डों शापिंग की आदि नहीं हूँ, खरीददारी करने का शौक पाला हीनहीं, इसलिए दूकानों पर ध्यान नहीं दे रही थी। रोबर्टो ने मुझे रोक कर कहा - मैं देख रहा हूँ कि तुम दूकानों की ओर झाँक भी नहीं रही हो। तुम्हे मालूम होना चाहिए कि इटली, विशेषतया रोम फैशन के लिए विश्व प्रसिद्ध है, यहाँ साधारण आदमी भी अच्छे कपड़े पहनना पसन्द करता है। मैंने दूकानों पर ध्यान देना शुरु कर दिया। कोई सन्देह नहीं कि इटली के फैशन का कोई मुकाबला नहीं। चमड़े का सामान तो बेहद खूबसूरत , लेकिन सब कुछ इतना महंगा कि देखने में भी डर लगे। मेरे पैसे नहीं खोये होते तो शायद चमड़े का सामान जरूर खरीदती। रोबर्टों भीड़ से परेशान थे, कहने लगे कि फुटबाल मैच नहीं होता तो ज्यादा अच्छी तरह से घूमा जा सकता था। लेकिन मेरे लिए तो यह भी दर्शनीय था, यूरोपीय फुटबाल प्रेम को जानती हूँ, लेकिन लोगों के पागलपन की साक्षी पहली बार हो रही, चेहरों पर अपनी अपनी टीम के झण्डों के रंगों को पोत लोग जिस मानसिक अवस्था में थे, वह कम रोचक नहीं था। यह उन्माद भरी अवस्था म, दोनो मनुष्य को ऊर्ध और पतन दोनो ओर ले जाती है।
फन्ताना दि त्रेवी ( Fountain di Trevi)में जब हम पहुँचे, जगह ठसाठस भरी थी, खासतौर से फुटबाल के प्रशंसकों से। सभी झरने में पैर डाले बैठे थे। मैंने पर्स की तली से पैसा निकाला और झरने के पानी में उछाल दिया। माँगा क्या? शायद याद नहीं, हो सकता है कि कुछ माँगा ही ना हो। रोबर्टों भीड़
सान्ता मरिया अराचेली अगला पड़ाव था, । रोबर्टों ने बताया कि अरा का मतलब है मन्दिर और चेली का अर्थ आसमान, यह चर्च इतनी ऊँचाई पर है कि इसे आसमान का मन्दिर कह जाने लगा। चर्च में अनेक सीढ़ियाँ थीं, यूरोपीय चर्चों में स्वर्ग की विशिष्ठ भूमिका रही है। अधिथकतर चर्चों के गुम्बद के भीतरी भाग में खूबसूरत चित्रकारी की जाती है, चर्चों की ऊँचाई स्वर्ग तक पहुँचने की भावना की परिचायक रही होगी। अराचेली के चर्च की सीढ़ियों को स्वर्ग की सीढ़ियों तुलना की गई होगी।
Mausoleum of Hadrian जो कि Castel Sant'Angelo कहलाता है , को हम आते जाते देखते आए थे, लेकिन आज हम इसके भीतर भी गए। दरवाजे पर हमारा स्वागत आदम कद एंजिलो ने किया, जो ईसाई कथाओं में विशेष महत्व रखते हैं। हम म्यूजियम में जाना चाहते थे, लेकिन वह मरम्मत के लिए बन्द था। हम इमारत के अहाते में घूम घूम कर भव्यता को अनुभूत करने लगे। पर्यटन में देखना एक हद तक होता है, देखते ही वस्तु दिल में प्रवेश नहीं कर पाती है। उसे ानुभव करना पड़ता है। रोबर्टो बता रहे थे कि Castel Sant'Angelo में लोग पोप के दर्शन के लिए जाने लगे तो तेवरे नदी पर पहली बार पुल बनाया गया, यही नहीं भीड़ को सन्तुलित करने के लिए पोप ने यह नियम बनवाया कि दाँए पुल से लोग भीतर जाएंगे, और बाएँ से बाहर आएँगे। यही नियम बाद में सड़कों पर लागू किया गया।
पोप ने आस भव्य इमारत को १४ वीं सदी में किले में परिवर्तित किया और St. Peter's Basilica से एक पुल के द्वारा जोड़ दिया, जिससे आक्रमण होने पर पोप भाग कर Castel Sant'Angelo में जाकर प्राण बचा सकें।
शाम के पाँच बज गए थे, मुझे साड़े छह बजे की ट्रेन पकड़नी थी। हम लौटने ही वाले थे कि रोबर्टों ने कहा कि एक महत्वपू्ण चीज देखे बिना तुम नहीं लौट सकती हो। उन्होंने तुरन्त बरकासिया BARCACCIA के लिए टैक्सी की ली। यहाँ एक फव्वारा था, जहाँ का पानी सभी लोग पी रहे थे। रोबर्टों ने कहा रोम आने वाले सभी को इस फव्वारे का पानी पीना चाहिए, यह पाप नाशक माना जाता है। मुझे शपने देश की गंगा बेहद याद आई। यह फव्वारा नौका की आकृति का है। इस फव्वारे से सीढ़ी चढ़ कर चर्च था। सीढ़ियाँ इस तरह से बनाई गईं थी कि यहाँ बैठने पर फव्वारे को अनूभूत किया जा सके। तभी रोबर्टों कहने लगे। मैं तुम्हे यहाँ इसलिए नहीं लाया कि फव्वारे का जल पिया जाए, बल्कि इसलिए कि तूम महान कवि कीथ का घर देख सको। सीढ़ियों से सटी एक इमारत थी, जिसमें कीथ ने अपने जिन्दगी के कई बरस बिताए थे। मुझे लगा कि रोम तो मैंने पहली बार देखा है।
समय काफी कम रह गया था, हम लोग बस पकड़ के तेजी से घर आए, और सामान को लेकर ट्राम से ही रेलवे स्टेशन पहुँचे। रोबर्टों ने फुर्ती से मेरे लिए रात का खाना खरीद कर कम्पार्टमेण्ट तक पहुँचा जरूर होया। तभी रीटा और एंजिलो भी आ पहुँचे। सब कुछ ५तना सुयोजित हुआ कि मैं पासपोर्ट खोने की बात ही भूल गई..
अलविदा रोम! फिर आऊँगी, क्रूर जरूर हो, फिर भी कुछ ना कुछ आकर्षण है ही, जो सबको तुम्हारी ओर खींचता है।
2009/08/08
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