यह लगभग निचित था कि
वह सपने देखेगी
सपने देखना उसकी नियति नहीं
फिर भी देखेगी
उसने सपनो को उठाया
पलकों पर रखा
अपने सूखे होंठों से लोरी गुनगुनाई
स्याह परदा फैल गया
आँखों के आगे
नहीं,ये सपने नहीं हो सकते
वह चिल्ला उठी
उसने स्याह रंग निचौड़ा
दर्द पर हाथ तापे
टीस को तड़पने दिया
एक एक कर सपने लौट आए
उसी की ओर
उसका निचय दृढ़ हो गया
कि वह सपने देखेगी
१८.७.२००२
2011/09/23
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