tag:blogger.com,1999:blog-114624672008-03-15T15:34:38.657+04:00रतीनाRati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comBlogger56125tag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-59225399976707989572007-02-19T19:01:00.000+04:002007-02-19T19:03:17.553+04:00स्मृति--10कई दिनों से एक विकट सी गंध बेहद आतुर कर रही है...इतनी तीव्रता से कि नसे तड़का जाएँ.. किसी मीठी याद की गंध तो नही? ... या किसी पूर्वजन्म की? नही ... यह तो बेहद विकट है, पुरातन भी , मत्स्यावतार के पहले की........क्या है यह पूर्वस्मृति की सुगन्ध? ... किसी कारण से हवाई अड्डे जाने का मौका मिला.....वही जानी पहचानी गंध.... मछली की गंध लिए..समन्दर की गंध, उसके हरहराने की गंध......पागल तो नहीं हो रही हूँ? ...........पास में समन्दर था।<br />फोन आया... कैसी हो? ...<br />ठीक हूँ , पर कोई गंध है जो जीने नहीं दे रही।<br />फोन के पीछे से मुस्कुराते होंठ साक्षात हो उठे। ... पता लगाया, कौन सी गंध है?<br />हाँ पता तो लगाया... समन्दर के हरहराने की है।<br />तो फिर मिल आओ समन्दर से...<br />लेकिन कैसे, किस के साथ? कोई है जो मेरा पागलपन समझे?इसे पागलपन ही तो कहेंगे ना?<br />अकेली चली जाओ, जब समन्दर बुलाता है तो ना नहीं करना चाहिए। ...चलो,,तैयार रहना.. मैं देखता हूँ कि क्या किया जा सकता है.. वह नाराज हो जाता है, हम लोग तो समन्दर को माता मानते हैं......<br />चार बजे से कुछ पहले फिर फोन... टैक्सी लेकर आता हूँ..कैमरा भी रख लेना......गली के बाहर ही मिलना..<br /><br />टैक्सी आ गई... और कोई नही था... रास्ते भर हम एक शब्द भी नहीं बोले.... टैक्सी कोवलम के किनारे ले आई.... हम दोनो चुपचाप उतरे और रेत पर चलते हुए तट पर चले आए... तुम आगे जाओ, कैमरा ले कर.. मैं यहीं पीछे खड़ा हूँ....<br />क्यों आप भी आइये..<br />.नहीं आज समन्दर सिर्फ तुम्हारा है.... मैं तुम्हारे और समन्दर के बीच बाधा नहीं बनना चाहता हूँ...<br />सूरज क्षितिज के काफी ऊपर था, मैं चुपचाप फोटो लेती रही और सूरज और समन्दर को मिलते देखती रही, पता नहीं कितना वक्त बीत गया। .......कोई और भी है मुझे याद भी नहीं रहा, समन्दर नीला स्याह पड़ गया तो पीछे मुड़ कर देखा, वे खड़े थे, चुपचाप... बिना किसी शिकायत या उलाहने के। मैं थोड़ी सकुचाई और लौटने लगी तो उन्होंने कहा.. हो गया तुम्हारा समन्दर से संवाद.... मैंन मुसकुरा कर कहा‍‍ हाँ.... अभी तो समन्दर और रंग बदलेगा.... चलो सामने के रेस्टारेंट में चाय पीते देखते हैं। हम सीढ़ियाँ चढ़ कर सामने रैंस्टारेंट मे गए जिसकी छत समन्दर की तरफ खुलती थी ‌और डेक पर से समन्दर का मजा लिया जा सकता था.. हम जिस मेज पर गए उस में एक जने को समन्दर की ओर पीठ करके बैठना था, उन्होंने समन्दर की ओर पीठ करती सीट को चुना.... अब फिर मैं समन्दर के सामने थी.... यह क्या ... समन्दर एक दम दिपदिपा उठा। मानों आसमान से तारे उतर आए हों...असंख्य छोटी-‍बड़ी नौकाएँ तैरती हुई किनारे की ओर आ रहीं थीं, हर नौका पर लालटेन रखी थी.... समन्दर का यह नजारा मेरी कल्पना से परे थे। चाय के साथ श्रिम्प खा कर हम लौट गए.. लौटते वक्त मैं बेहद चुप थी। उन्होंने भी एक शब्द भी नहीं कहा... मुझे घर पर उतार कर वे अपने घर गए... फोन आया...मुझे विश्वास है कि कल‍ परसों में मुझे एक अच्छी सी कविता सुनने को मिलेगी.....<br /><br />कल किसी ने कहा आपकी समन्दर पर रची कविता बेहद छूती है मन को,<br /><br />शायद मेरे मन को भी --------------मै सोचती हूँ......<br /><br /><br />लेकिन क्या मैं अब समन्दर के पास जा सकती हूँ?Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-35088629750148395802007-02-19T18:51:00.000+04:002007-02-19T19:01:25.285+04:00स्मृति-9खिड़की से बाहर झाँकते हुए हम अपने भीतर झाँकने लगते हैं. दृश्य कुछ समय तो आकर्षित करते हैं, किन्तु ज्यों ही उनकी पुनरावृत्ति होने लगती है, हम अपने भीतर झाँकने लगते हैं, अपने से बतियाने लगते हैं। मेरे साथ तो अकसर ऐसा ही होता है, मैं बार बार अपने को झंझो॔ड़ती कहती हूँ अरे क्या सोच रही हो, इन दरख्तों से संवाद करो, इन बादलों को निहारों.. कालिदास ने हिमालय से निहारा, तुम रेल की खिड़की से निहारो... लेकिन मेँ बार बार अपने भीतर सरक जाती हूँ... बाहर सब का आना जाना चलता रहता है, मैं अपने आप से बतियाती रहती हूँ। फिर मुझे ऐसा लगता है कि बादल भी मेरे संवाद में शामिल हो जाते हैं, और बच्चों की तरह दौड़ते मेरा पीछा करते हैं। मैं खिलखिला उठती हूँ ,और उन्हे अपनी बातों में शामिल कर लेती हूँ।<br />आज मैं सोच रही हूँ सम्बन्धों के बारे में... समाज ने ना जाने कितने सम्बन्ध बनाए.. या फिर कहें तो उन्हे खानों में रख कर नाम दे दिए.. लेकिन क्या सम्बन्धों का कोटा खत्म हो गया?<br />मैंने बादलों से पूछा.. क्या तुम लोग भी इसी तरह सम्बन्धों को नाम देत हो और बाकी सम्बन्धों को खारिज कर देते हो?<br />उन्होंने कहा नहीं, हमारे आसमान में हर पल सम्बन्ध जगते हैं और बुझते हैं, जब एक परिन्दा हमारे बीच में से गुजरता है तो हम सन उसके पंखो से यह पता लगा लेते हैं कि कहाँ है हमारी यात्रा, परिन्दे के पंखो का हमारे जल कणों से समबन्ध उतना ही स्थिर है, जितना कि तुम लोगों का जमीन से..<br />मैंने कहा.. अरे कहाँ हम लोग जमीन से प्यार करते हीकहाँ हैं? हमेशा तुम्हारी तरह आसमान में दौड़ लगाने का सपना देखते रहते हैं<br />बादलों ने कहा‍.. तभी तभी तो तुम लोग खुश नहीं रहते ... जो होता है, उससे भागते हो और जो नहीं होता उसके सपने देखते हो,<br />मैने भी पलट कर कहा..तभी तो हम आदमी हैं... बादल नहीं...Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1164347097950572702006-11-24T09:41:00.000+04:002006-11-24T09:44:57.976+04:00स्मृति-8खिड़की से बाहर झाँकते हुए हम अपने भीतर झाँकने लगते हैं. दृश्य कुछ समय तो आकर्षित करते हैं, किन्तु ज्यों ही उनकी पुनरावृत्ति होने लगती है, हम अपने भीतर झाँकने लगते हैं, अपने से बतियाने लगते हैं। मेरे साथ तो अकसर ऐसा ही होता है, मैं बार बार अपने को झंझो॔ड़ती कहती हूँ अरे क्या सोच रही हो, इन दरख्तों से संवाद करो, इन बादलों को निहारों.. कालिदास ने हिमालय से निहारा, तुम रेल की खिड़की से निहारो... लेकिन मेँ बार बार अपने भीतर सरक जाती हूँ... बाहर सब का आना जाना चलता रहता है, मैं अपने आप से बतियाती रहती हूँ। फिर मुझे ऐसा लगता है कि बादल भी मेरे संवाद में शामिल हो जाते हैं, और बच्चों की तरह दौड़ते मेरा पीछा करते हैं। मैं खिलखिला उठती हूँ ,और उन्हे अपनी बातों में शामिल कर लेती हूँ।आज मैं सोच रही हूँ सम्बन्धों के बारे में... समाज ने ना जाने कितने सम्बन्ध बनाए.. या फिर कहें तो उन्हे खानों में रख कर नाम दे दिए.. लेकिन क्या सम्बन्धों का कोटा खत्म हो गया?मैंने बादलों से पूछा.. क्या तुम लोग भी इसी तरह सम्बन्धों को नाम देत हो और बाकी सम्बन्धों को खारिज कर देते हो?उन्होंने कहा नहीं, हमारे आसमान में हर पल सम्बन्ध जगते हैं और बुझते हैं, जब एक परिन्दा हमारे बीच में से गुजरता है तो हम सन उसके पंखो से यह पता लगा लेते हैं कि कहाँ है हमारी यात्रा, परिन्दे के पंखो का हमारे जल कणों से सम्बन्ध उतना ही स्थिर है, जितना कि तुम लोगों का जमीन से..मैंने कहा.. अरे कहाँ हम लोग जमीन से प्यार करते हीकहाँ हैं? हमेशा तुम्हारी तरह आसमान में दौड़ लगाने का सपना देखते रहते हैंबादलों ने कहा‍‍‍.. तभी तभी तो तुम लोग खुश नहीं रहते ... जो होता है, उससे भागते हो और जो नहीं होता उसके सपने देखते हो,मैने भी पलट कर कहा..तभी तो हम आदमी हैं... बादल नहीं...Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1164112883954262852006-11-21T16:40:00.000+04:002006-11-21T16:45:02.930+04:00स्मृति-7बाहर बरसात हो रही है, डिब्बे के भीतर लोगों ने शटर बन्द कर दिए हैं, मुझे याद आता है वह दिन जब मैंने केरल में कदम रख था, ‌और आते ही मुझ मरुस्थल की ऊँटनी का स्वागत किया था बरसात ने... मैं भीतर तक भींज गई थी, उन दिनों मैं बरसात में दौड़ लगाना चाहती थी, भीगना चाहती थी, पर नहीं कर पाई, क्यों कि बहु थी, और यह जानती थी कि बहुओं के लिए ऐसी बेशरमी सही नहीं। लेकिन फिर ऐसा वक्त आया कि बरसात में भीगने की उमंग ही मर गई। बरसात का मतलब हुआ, बच्चों के कपड़े ना सूखना, अचार मसालों में फफूंदी की परत जमना, रसोई घर के हर सामान का बेमुरब्बत से साथ छोड़ना आदि आदि। बरसात का एक अलग अर्थ भी सामने आया कि अब बच्चों को सर्दी जुखाम होगा, कि अब वायरल फीवर का किसी ना किसी को प्रकोप होगा़। अब यह बात भी नहीं रही कि ‍‍ .. अरे भई! बारीश हो रही है, गर्मागरम पकौड़े ही बना लिए जाएँ।<br />बारीश को पकौड़ों को साथ जोड़ लिया जाए तप दाल रोटी जैसे पकोड़े हर दिन बनाने पड़े्गे। इसलिए अब बारीश आती है चुपचाप लौट जाती है, बिना किसी स्वागत के, बिना किसी तरह के उल्लास के।<br />फिर भी बारीश हो रही है, उसका स्वागत नहीं तो निरादर तो ना करे.. मैं खिड़की के शटर को जरा सा ऊपर कर देती हूँ कि केवल कोहनी ही बाहर की हवा खा ले , मेरी कोहनी भर बरसात में भीगने लगती है.. कुछ तो जादू है बरसात में... बरसात अभी भी बरसात ह, चाहे हम खिड़कियाँ बन्द कर लें, चाहे हम भीगने का मजा ना ले... चाहे हम .. चाहे हम भूल जाए ...उसेRati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1164097909569152062006-11-21T12:30:00.000+04:002006-11-21T20:36:25.916+04:00स्मृति-6मुझे याद आ रही हैं, बीकानेर की अंधड़ भरी दुपहरियाँ, पत्थरों से भरे ऊँचे मकानों में उन दिनों एक बड़ा आँगन और पानी का हौज होना जरूरी होता था. गर्मियों भर उस हौज में एक विशालकाय मतीरा ( तरबूज ) तैरा करता था, हम बच्चे दिन भर में न जाने कितनी बार उसके पास जाते उसे छूते और मनाते कि वह लाल निकले, लाल नहीं तो कम से कम गहरा गुलाबी ही सही। बह भी जिबह के लिए तैयार बकरे की तरह हमारी बातें सुना करता होगा, और कभी- कभी तथास्तु भी कहा करता होगा। गर्मियों के दिनों सुबह सवेरे खाना पीना निपटा लिया जाता, बरामदों की चिकों को डाल दिया जाता, बड़े कमरे, जिस में दुपहरी बिताने का इंतजाम हो, उसे धो- पौंछ कर तैयार कर लिया जाता, खिड़कियों पर खस खस के टाटे ( यानी की मोटे पर्दे गिरा लिए जाते ) उन्हे पानी से तर कर लिया जाता। और हम बच्चे नहा धोकर पतली मलमल की फ्राक पहन कर गरमी से दो दो हाथ करने के लिए तैयार हो जाते। दिन में जितनी जोर से हवा चलती , कमरा उतना ही ठंडा होता। बात हवा तक हो तो ठीक है, लेकिन जब अंधड़ आता तो वाहे कितनी ही खिड़की दरवाजे बन्द करों रेत घर में घुस ही जाती। फिर तो उस शाम घर के हर एक सामान को पौंछना साफ करना विशेष काम होता। हम बच्चों के लिए तो यह काम भी मजेदार होता था। गर्मियों की रात को हम लोग छत पर सोया करते थै,शाम होते ही छत पर छिड़काव होता, पानी की किल्लत के कारण छिड़काव करने का विशेष तरीका हुआ करता था. आधी बाल्टी पानी में छत को तर कर लिया जाता । छिड़काव के बाद फिर छिड़काव.. जब छत की जमीन से भभके निकलने बन्द हो जाते तो चारपाइयाँ बिछा ली जातीं, और इन पर सफेद चादर, सफेद गिलाफ वाले तकिए बिछा कर पैताने एक रेशमी चादर के साथ मोटा खेस रख दिया जाता, बीकानेर की राते शुरू में तो गरम हुआ करतीं किन्तु आधी रात बीतते- बीतते ठण्डी होनी शुरु करती। सुबह होते होते तो खेस लपेटने की नौबत आ जाती, कभी- कभी रात को भी धूल भरा अंधड़ चलने लगता , बड़े लोग तो उठ कर नीचे चले जाते, लेकिन हम लोग मुँह कान लपेटे सोते रहते। सुबह होते तो हमारा हुलिया ही अलग होता, आँख नाक सब जगह धूल ही धूल , मुँह में अजीब सा रेतीला स्वाद आ जाता। बीकानेरी सेब भुजिये उन दिनों भी बहुत स्वादिष्ट हुआ, करते माँ कहा करती थी,-- "भई यह तो यहाँ की रेत का कमाल है, दिन रात अंधड़ चला करता है तो भुजियों में काफी कुछ रेत का अंश आ ही जाता है। फिर उन्हें स्वादिष्ट तो होना ही है। "रेत से जुड़ी और ना जाने कितनी बाते जेहन में उभरती हैं, आदमी लोग काम पर जाते तो घर की बहुएँ बड़े बड़े बर्तन भाँडे लेकर गली में आ बैठतीं। हर घर के सामने एक छोटी सी रेत की हौदी होती थी, जिसमें छनी हुई रेत भरी होती थी़। स्त्रियाँ पीतल के बर्तनो पर रेत मलती, पहली बार उका झूठन उतरता, दूसरी बार मे चिकनाऊ , तीसरी बार मलतीं तो बर्तन धूप से चमक जाते, और फिर उन्हे सूखे कपड़े से पौंछ कर रसोई घर में सजा लिया जाता था। इस तरह पानी की किल्लत के दिनों में पानी बचा लिया जाता था, लेकिन एक बात और थी, जिस पर लोगों का ध्यान ही नहीं जाता था। बरतन मलने का काम बीन्दनियों (बहुओं) का ही हुआ करता था। बर्तन मलनेकी प्रक्रिया बेहद लम्बी हुआ करती थी, और इस प्रक्रिया का सबसे अच्छा परिणाम यह था कि बहुओं को आपस हँसी- ठिठोली करने और बतियाने का मौका मिला जाता और वे तन से थकते हुए भी मन से खिल उठतीं।<br />उन दिनों रेत के ढ़ूहों को देखने जाने का रिवाज तो नहीं था, किन्तु जब कभी देखने का मौका मिलता तो कल्पना मरुस्थल की तरह पाँव पसार लेती थी़ अब मैं कैसे भुला सकती हूँ रेतीली खूबसूरती, उसके स्वाद और खुशबू को,,बेटी को कैसे समझाऊ?Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1164079275804663152006-11-21T07:20:00.000+04:002006-11-21T07:21:15.820+04:00स्मृति -5गाड़ी में बैठना हो तो बस, खिड़की वाली सीट पर, अब हर सप्ताह घर से निकलना है तो सैकण्ड क्लास से सफर करना ही पड़ेगा। बात सैकण्ड क्लास की नहीं है, आजकल लौटते वक्त तो लेडीज कम्पार्टमेन्ट में जाना पड़ता है। लेडीज कम्पार्टमेन्ट में सफर करना मुझे कुछ ऐसा लगा करता था , जैसा कि भेड़ बकरियों के बारे में बन्द कर दिया गया हो। लेकिन अब यह मजबूरी हो गया है ,। लेकिन केरल में एक बात खास है कि यहाँ के लोग, अमेरिका यूरोप वालों की तरह अपने आप बतियाना शुरु नहीं करते। बाते तभी होती हैं, यही कारण है कि सफर में जबरदस्ती का दखल नहीं होता है। अब पूरे 5-6 घण्टे खिड़की ‌और उसके बाहर भागती दुनिया अपने बस में हो जाती है। हरियाली, इतनी कि आँखे दुखने लगती हैं, हरे रंग की इतनी शेड्स कि लगता है कि बाहर हरा नहीं बल्कि ना जाने कितने रंग बिखरे पड़े हैं, जब चटख लाल रंग किसी पत्ते के पीछे से झाँकता है तो लगता है हरा तिलस्म टूट रहा है। यूँ तो हरियाली और पानी दोनों ही खूबसूरती का नजारा पेश करते हैं, किन्तु फिर भी मन कभी कभी हरियाली से ऊब जरूर जाता है। उस दिन बेटी से फोन पर बात हो रही थी। बेटी केरल में पैदा हुई, यहीं बड़ी हुई, इसलिए मन से यही की है। जब मैंने बताया कि खिड़की से हरियाली देख देख कर बोर होने लगी हूँ तो वह कहने लगी कि मुझे तो नारियल के दरख्त देखे ना जाने कितने दिन हो गए, मुझे उनकी याद आ रही है। लेकिन मैं तो राजस्थान की हूँ, मुझे तो रेतीली मिट्टी की याद आती है।<br />लोग कहेंगे कि क्या खूबसूरती है मिट्टी में जो हरिहाली से ऊब हो रही है.... नहीं भई ! मैं हरियाली से ऊब नहीं रही , बस मिट्टी की खूबसूरती को याद कर रही हूँ।Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1163392998798912352006-11-13T08:41:00.000+04:002006-11-13T08:43:18.800+04:00स्मृति‍‍-4छात्र जीवन में बड़ी हुलस होती थी , दुनिया नापने की, जहाँ घर के भीतर भी गिन कर कदम भरने की आज्ञा हो वहाँ दुनिया के बाहर कितने कदम भरे जा सकते हैं। उन दिनों घर से यूनीवर्सिटी तक जाने वाली बस मं बैठती तो ज्यादातर लम्बे रूट वाली बस में बैठती, खिड़की के बाहर से दौड़ती दुनिया बेहद आकर्धित करती थी। तभी मन ही मन भगवान से दुआ करती कि ..है ईश्वर मुझे इतनी लम्बी रेलगाड़ी में बिठा दे जो चलती रहे बस चलती रहे... पता है भगवान ने तथास्तु जरूर कहा होगा, तभी तो इस जगह बसी हूँ जहाँ से भारत के किसी भी कोने में जाने के लिए दो से तीन दिन तक गाड़ी में बैठना पड़ता है, ईश्वर का अचानक याद आया कि कहीं मैंने देने में कुछ कोताही तो नहीं बरत दी, तो यह निर्वासन, कि हर सोमवार को रेलगाड़ी में बैठो कम से कम छह घण्टे के लिए, और हर शुक्रवार को फिर गाड़ी में, वही छह सात घण्टे। छोटी बिटिया ने हँस कर फोन पर कहा.. माँ , भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है । अब देखो कितना लम्बा सफर मिल गया आपको, अब जब भी कुछ मांगों सोच- समझ कर माँगना।<br />किसी भी नई जगह का खुलना बुलबुलों के धीमे- धीमे बुझने जैसा होता है। पहले पहल बस फेन बुदबुदे, फिर कहीं जाकर असलियत। किसी ने आँखे मिलाई तो किसी ने आँखे चुराई। खाना नाश्ता सब ले लिया, जेल के केदी की तरह बिना सोचे समझे निगल भी लिया। खानपान और बोली आदमी को आदमी से अलग करने का सबसे बड़ा जरिया है। जो खाना आँते चबाती रही हैं, उस से अलग खाने में दुविधा तो होती है ही। घर थोड़े ही है कि जब मन हुआ चाय गुटका ली, जब मन हुआ कुछ खा लिया। हर पल घर याद आ रहा है, लेकिन नई जगह पैठने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगता।Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1163392852675083362006-11-13T08:27:00.000+04:002006-11-13T08:40:52.700+04:00स्मृति‍‍-3पिताजी कहा करते थे, चींटी की मौत आती है तो पर निकलने लगते हैं, मौत और पर के सम्बन्ध को मैं तब समझ ही नहीं पाती थी। उन दिनों पर का सम्बन्ध आजादी लगता था और मौत देह की आजादी, हालाँकि यह उक्ति हम लोगों को कभी नहीं भाई, किन्तु यहीं सोचा कि पिताजी का तात्पर्य यह था कि हम लोग अपनी सीमा में रहें। यानी कि उन नियमों की दहलीज को पार ना करें, जो हम लोगों के लिए बनाई गईं थीं। लेकिन इस नियम पालन की बाध्यता ने हमे इस लायक ही नहीं छोड़ा कि संसार की सच्चाइयों का समना कर सकें। 'पर' निकलने की परेशानी से तो बच गए, किन्तु संसार ‌और समाज को सह पाना जिन्दगी भर ना सीख पाए। मैं अपने घर से निकली हूं ,बहुत दूर नहीं , अपने आस- पास के तथाकथित समाज को जवाब देना मु्श्किल सा हो रहा है। क्या जरूरत है इस उम्र में यह सब करने की, अतीत की जुगाली करती , बुझीं बुझी सी महिलाएँ कहती हैं......। मैं पूछती नहीं कि भई जब आपकी युवा बेटियाँ नौकरी के लिए दूर- दराज जातीं हैं तब तो आप लोगों ने बड़े अंहकार से स्वीकार किया, किन्तु मेरे घर से निकल कर जरा दूर ही निकलने पर इतना बवाल क्यों? हालाँकि बवाल इस लिए नहीं कि उन्हें मेरी चिन्ता है, बल्कि इसलिए है कि मैं उनकी जैसी क्यों नहीं हूँ, क्यों कुछ कर गुजरने में लगी रहती हूँ। घर से दूर आना मेरे लिए पर निकलने का रोमांच नहीं, कुछ कर गुजरने की तमन्ना नहीं, बल्कि जीने की ओर एक नन्हीं सी कोशिश है। एक दबी इच्छा कि मैं उस जानकारी को बाँट सकूँ, जिसे मैंने अकेले ही ना जाने कितने बरसों में इकट्ठा किया है। साथ ही कोशिश है कि कृत्या, जिसे मैंने उतने ही लगन से पाला है , कुछ बड़ी हो सके, एक दिशा निर्धारित हो सके। कृत्या मेरी वेब पत्रिका है, जिसे निकालने के लिए मैंने अपनी जमा पूंजी लगा दी, और अब तक बिना किसी आर्थिक सहायता के आगे चलाना मुश्किल सा लगने लगा तो यह प्रस्ताव आया। मुझे लगा कि यह प्रस्ताव मेरे लिए नहीं बल्कि कृत्या के लिए हैं, मैं तो बस मजदूर हूं कलम की। असाम ‌और लद्दाख की यात्राओं में मैने बिहार आदि दूर दराज प्रदेशों से आए मजदूरों को देखा था, उनके अनकहे दर्द से भींज भींज गई थी, उनका विस्थापन ‌से मैं अपने विस्थापन को कैसे जोड़ सकती हूँ।Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1163392034032935472006-11-13T08:23:00.000+04:002006-11-13T08:27:14.033+04:00स्मृति‍‍--2पहले दिन होस्टल में पैर रखा, तो कमरे की दीवारों को घूर‍‍- घूर कर देखती बैठी रही. क्या इतना फरक होता है दीवारों में, घर की जो दीवारे कभी- कभी काटती थीं, वे ही हुलस - हुलस कर बुलाने लगीं। फिर उठी, बाजार गई, और एक गदिया, एक बाल्टी ले आई। पतली सी गदिया पर पीठ टिकाई तो रोना फूट पड़ा... अचानक छोटी बेटी की याद आ गई, 6 साल बिताए थे उसने होस्टल में... और जब उसे पता पड़ा कि शादी के बाद उसे कुछ दिन डाक्टर पति के साथ होस्टल में रहना पड़ेगा तो रो पड़ी थी, माँ मेरी जिन्दगी में बस होस्टल ही है क्या... कब मिलेगा मुझे घर... मैं उसे समझाती रही कि कुछ समय इंतजार करों, सब मिल जाएगा.. आज उसका दर्द मेरे सामने चूल्हे पर रखे दूध सा उफन उफन कर बह रहा था। किस तरह का विस्थापन झेलते हैं बच्चे, रहते हुए भी ना रहते हुए।Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1163149997519600182006-11-10T13:12:00.000+04:002006-11-13T08:22:43.856+04:00स्मृति ‍‍-- ‍‍एकजैसे किसी ने सेब के बीचो बीच में चाकू घुपा दिया हो, चाकू चल रहा है, लेकिन बस बीच में, बिना दो भाग में बाँटे, इस ओर को उस ओर से बचाता हुआ। हर बार इस ओर को उस ओर से संवाद के लिए चाकू की धार का सामना करना पड़ता है। निर्णय ‌उतना ही अप्रस्तावित था जितना कि प्रस्ताव। तीस साल में घर की शकल कितनी बादल गई, ईंट ईंट इकट्ठा कर के घर छाया, आठों दिशाएँ घर की दीवारें, आसमान टाँगा छत पर, पूरी ब्रह्माण्ड की मालकिन मैं अकेली, नन्हीं बेटियों से लेकर पति तक, सभी हुकुम मानने का अभिनय करते रहे... कि पहला पंछी उड़ चला, अपना अलग ब्रह्नाण्ड छाने। जितने हुलास और उल्लास के साथ बेटी को विदा किया, उतने ही कष्ट के साथ जुदाई को सहा... लगा कि दीवारे चरमरा जाएंगी, लगा कि फैंफड़ों में साँस आनी बन्द हो जाएगी, ... कुछ महिने भी नहीं बीते कि छोटी ने साजो-समान बाँधा होस्टल के लिए। हालाँकि कि मैं ही गई थी , उसे विदा करने, किन्तु लौटी तो लगा कि रीता घड़ा हूँ , जिसकी पेंदी के छेद से लगातार कुछ चूता जा रहा है। घर मरघट सा सुनसान हो गया... कभी‍- कभार कोई याद चली आती थी दफन होने के लिए... बरस पर बीतने लगे, कभी कदार बिटियाँ आ जातीं, घर की साँसे चलने लगतीं, नहीं तो हम दोनों होली दीवाली यूँ ही चुप्पे से बने रहते, लगते कि बच्चियाँ ही संवाद का सूत्र थीं, जब वह सूत्र ही नहीं रहा तो किस विषय पर बातचीत की जाए। समय ने मलहम का काम किया, दीवारे फिर से साँस लेने लगीं, छत के आसमान में फिर से तारे टिमटिमाने लगे। अब हम दोनों ने सोच लिया कि घर तो हमारा है, उन पखेरुओं का नहीं, उनकी नियति अलग घर बसाना थी,... बस इसी तरह हम चलने लगे, छूटे सिरे बटोर कर, ना जाने कितने धागे टूटे, न जाने कितने दोस्त बिछड़े किन्तु हम चल रहे थे। कि अचानक यह प्रस्ताव आया... दीमाग कह रहा था कि हाँ कह दो, मन कह रहा था कि नहीं.कृत्या निकाले डेड़ साल बीतने को हुआ, सारी जमा पूंजी खर्च हो रही थी, कोई आसार नजर नहीं आ रहा था। तभी कालडी की यूनिवर्सिटी से विजिटंग प्रोफेसर का यह आमन्त्रण.. प्रदीप ने ही कहा.. चली जाओ, तुम्हे छात्र मिलेंगे, लाइब्रेरी मिलेगी, लोग मिलेंगे, परदेस में दायरा बढ़ेगा.. बहुत बड़ा दिल है प्रदीप का.. मेरा अकेलापन समझते हैं। कालडि यानी की छह घण्टे की दूरी ट्रेन से, यानी कि सोमवार को जाना और शुक्रवार को आना.... हिम्मत बँधी , हाँ कह दी...Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1161949061552510042006-10-27T15:35:00.000+04:002006-10-27T15:37:41.566+04:00जिन्दगी से जुड़ाव या कटाव‍‍‍‍‍‍‍‍ - --- कविता के दायरे में?यदि हम कविता को सीधे- सीधे दो खण्डों में बाँटना चाहे‍‍--1- जिन्दगी से जुड़ाव की कविता, 2-जिन्दगी से कटाव की कविता, तो हमे यह भी सोचना एवं तलाशना पड़ेगा कि इन दो स्थितियों के बीच भी कोई कविता हो सकती है या नहीं। ऐसी स्थिति में कविता क्या होगी?, जुड़ाव में कटाव या फिर कटाव में जुड़ाव। कुछ विस्तार से कहे तो यहाँ कविता जिन्दगी से जुड़ी होते हुए भी अपना विचरण स्थान अलग- थलग रखे होगी या फिर विरोधी परिस्थिति में जिन्दगी की बात ना करते हुए भी जिन्दगी की बात कर रही होगी। अद्भुत बात यह है कि शिल्प एवं शैली की दृष्टि से जिन्दगी से कटाव की कविता एक विचित्र आकर्षण या सम्मोहन से भरी होती है , जबकि जिन्दगी से जुड़ी अधिकतर कविताएँ हमें धम्म से धरती पर डाल देती हैं। फिर बहस का मुद्दा है कि यदि कविता जिन्दगी की बात नहीं करेगी तो कैसे लोग, समाज या फिर मनुष्यता से जुड़ेगी। व्यवहार में यह देखा जाता है कि सामान्य जन उन गीतों या कविताओं को जल्द अपना लेते हैं जो भावना के सुखद लोक में ले जाने की क्षमता रखती है। यह भावलोक विशुद्ध काल्पनिक होते हुए भी रसोस्पत्ति मे सक्षम होता है, यथार्थ जिन्दगी से जुड़ी कविताएँ दिल को तभी छूती हैं जब पाठक या श्रोता उस अनुभव से गुजरने की क्षमता रखता हो। सवाल यह भी है, जिन्दगी शब्द अपने भीतर किस अर्थ को समाहित करती है, क्या यह आदमी की वह मल्कीयत है जिसमें वह अपने सुख- दुख, आशा -निराशा जैसे अनेक भावो के जमीन से जुड़ता है और समाज, लोक और प्रपंच का हिस्सा बनता हुआ जीते- जीते मरता है, मरते- मरते जीता है। जिन्दगी में जिन्दगी के ना होने का भाव इस तरह से जुड़ा होता है कि जिन्दगी कभी- कभी अपने अभाव का पर्याय सी बन जाती है। जब हम जिन्दगी से जुड़ाव की बात करते हैं तो भी हमारे सामने अनेक दिशाएँ खुल जाती हैं। जिन्दगी से जुड़ाव जिन्दगी के प्रति मोह या रागात्मकता है, जिसे भारतीय दर्शन नकारता रहा है। माया महा ठगिनी हम जानी की बात करते हुए ना जाने कितना सफर पार कर लिया गया। क्या यह जुड़ाव वही मोहात्मकता है जो परिवेश को वैसे ही सलेटी, नीला पीला रंग दे देती है जो उसकी जिन्दगी से काफी परे होता है। या फिर यह वह खुरदरापन है, जिसे हम और अधिक खुरदुरा बना कर पेश कर सकते हैं। शब्दों में इतनी शक्ति होती है कि सामान्य भावों को अधिक खुरदुरा या अधिक चमकदार रूप दिया जा सके। ऐसे में जिन्दगी पार्श्व मे जाने की संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है। क्यों कि शब्द चित्रों में जिन्दगी के रंग कहीं ना कहीं बदल जाते है, यही नहीं लेंस की तीव्रता और उपादेयता भी असर डाल सकती है। यही कारण है कि जिन्दगी का खुरदुरापन कविता में अजीब सी चमक लेकर उपस्थित हो जाता है। जब हम निराला के भिक्षुक को पढ़ते हैं तो भिक्षुक की दीनता के साथ शिल्प सौन्दर्य को भी नहीं नकार पाते है। जब हमारी आँखें भिक्षुक के दर्द से नम होतीं हैं तो शिल्प सौन्दर्य से चमक भी लाती हैं। जिन्दगी भी तो कुछ ऐसी ही है, जो दीखता है उसके भीतर बहुत कुछ होता है जो नहीं दीख पड़ता है। ----मैं केरलीय मछुआरिनों को देखती हूँ तो एक अजीब सी आजादी की गंध पाती हूँ, उनकी विचित्र लहराती चाल ‌और कसा बदन.. लापरवाही में सचेतन दिखावा -- कितना आकर्षक होता है, वर्णन नहीं किया जा सकता है। कभी यह भी सोचती हूँ कि किस पहली मछुआरिन ने इस बलखाती चाल की दीक्षा दी होगी? किसने उनकी ड्रेस कोड निर्धारित की होगी। लेकिन जब कभी उनके राग- विरागों से सामना होता है, तो करीब -करीब एक सा दर्द सामने आता है। आदमी मछुआरों का शराब पीना, जुआ खेलना और औरतों को मारना- पीटना, और उनकी कमाई को छीन लेना। फिर भी मैं उन पर कविता की एक पंक्ति भी नहीं लिख पाती । उनके चमकदार रूप को कलम की नोक पर रखूँ तो उनकी पीड़ा को कहाँ रखूँ। और उनकी पीड़ा को शब्द दूँ तो उनके मुक्त हावभावों, चलन , अंगसंचालन को कहाँ रखूँ? लिहाजा जिन्दगी से जुड़ना चाहते हुए नहीं जुड़ पाती हूँ।<br />आज हम समस्त भावनाओं को मात्र जिन्दगी से जोड़ कर उससे बचे सब को खारिज करना चाहें, यहीं नहीं हम जिन्दगी को भी जीने की तकलीफों, खुशियों गमों आदि तक ही केन्द्रित करना चाहें तो उन सब कल्पनाओं , भावनाओं का क्या होगा जो परोक्ष मे तो जिन्दगी से जुड़ीं है किन्तु परोक्ष में हमे जिन्दगी से दूर ले जाती हैं। वह सब शब्दावलि हमारे शब्दकोश में व्यर्थ हो जाएगी जो कल्पना को प्रतिमान देती है। यूँ तो काफी कुछ होता है जो अपने यथार्थ में भी काल्पनिक होता है, जिसे यथार्थ ना होते हुए भी यथार्थ मान लिया जाता है। जैसे कि माँ शब्द को लेकर जितना काल्पनिक चित्रण होता है उसकी सीमा ही नहीं, यथार्थ भी माँ शब्द को मिथक में परिवर्तित करता है। कोई भी गिरा से गिरा नारी पात्र माँ शब्द के दायरे में आते ही विचित्र लोक में अवस्थित कर दिया जाता हैं, जहाँ से केवल दिव्यता ही करीब होती है। यही नहीं मातृत्व को जिस तरह यथार्थ से जोड़ जाता है, उस वक्त तकलीफ दायक को जिस अपूर्व सौन्दर्य से मण्डित किया जाता है, वह यथार्थ के दायरे में कहीं नहीं आता, लेकिन उससे स्खलन को स्वीकारने में झिझक भी होती है।<br />कृत्रिमता की ओर गमन और प्रत्यागमन एक दूसरे से जुड़ी स्थितियाँ हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे कि कृत्रिम खाद से जमीन उर्वर और वनस्पति दानवाकार तो बनती गई, किन्तु जब उस दानव ने लोगों का पेट फोड़ना शुरु कर दिया, और जमीन का वन्ध्यापन टिकाऊ होने की स्थिति में आ गया तो पुनः प्राकृतिक स्वाद को याद किया जाने लगा। यूँ तो देखा जाए भाषा का लिप्यान्तर और लिपि का पुस्तकीय आकार भी कृत्रिमता है , किन्तु इसे विकास के दायरे में रखा जाता है। यदि ऐसा है तो नेट पर उपस्थित साहित्य को भी साहित्य के कक्ष में आसानी से स्थान मिलना चहिए था, जबकि ऐसा हुआ नहीं। यहाँ पर विकास के साथ- साथ सुविधा और अपनाये जाने की बात भी आ जाती है। यदि कृत्रिमता को साहित्य की लेंस से देखा जाए तो साहित्य में पूरी तरह से कृत्रिमता से बचना लगभग अंसभव है। साहित्य या कला स्वयं में सत्य का अनुकरण या प्रतिबिम्ब है, स्वयं सत्य नहीं। उसमें सत्य प्रतिभासित अवश्य हो सकता है। जब कृत्रिमता से बचना संभव है तो यथार्थ को पूरी तरह से प्रतिवादित करना कितना सहज होगा, यह विचारणीय है।<br />अब हम पुनः यथार्थ की कविता की ओर आते हैं, यथार्थ ना तो इतना खुरदरा होता है जितना कि कविता में लगता है , न ही इतना सुनहरा जितना कि दिखाई देता है। भयंकर से भयंकर यथार्थ अपने झेलने की स्थिति में भी अधिकतर सहनीय नहीं होता है। यानी कि जो उस यथार्थ के केन्द्र में हमेशा से है वह उससे हटने की कल्पना से खुश तो होगा किन्तु अपनी स्थिति को इतना नहीं भाग रहा होगा जितना कि सुविधा में रहने वाल चितेरा महसूस करेगा। बड़े बूढ़ों को कहते सुना है.. "जो रहे सो सहे , जो सुने वो डरे", यानी कि यथार्थ क चित्रण कुछ हद तक अयथार्थ हो जाता है, ऐसे में कविता में यथार्थ की भूमिका क्या होगी?<br />इसका अर्थ तो यह हुआ कि जब हम जिन्दगी की बाते ना कर के उसके आसपास या फिर कुछ दूर चक्कर लगाते हैं तो भी हम जिन्दगी की बात कर रहे होते हैं , और जब हम ठेठ जिन्दगी को शब्दों में उतार रहे होते हैं तो भी हम जिन्दगी से काफी दूर होते हैं। कविता ना तो जिन्दगी से पूरी तरह से कट पाती है और ना ही जिन्दगी से जुड़ पाती है। कहीं बीच में हमें जिन्दगी के आस पास मण्डराने देती है।<br /><br />रति सक्सेनाRati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1154779050563065442006-08-05T15:54:00.000+04:002006-08-05T15:57:30.573+04:00जुल लद्दाख!--528.6.2006 हमने केवल एक दिन के आराम की बात सोची थी , किन्तु दो दिन तक हम लोगों की तबियत काफी भारी रही, सिर में दर्द, उल्टियाँ, प्रदीप की तबियत तो इतनी खराब हो गई थी कि आर्मी के डाक्टर की दवा लेनी पड़ी, रात तक प्रदीप की तबियत सुधरी तो मेरे सिर मे इतना भयानक दर्द शुरु हुआ कि हम घूमना ही भूल गए, इस बीच ड्राइवर को कान्टेक्ट नहीं कर पाए, स्वाभाविक था कि वे दूसरी सवारी ले लेते। लेह में टैक्सी वालों की यूनियन बड़ी मजबूत है, सभी ड्राइवरों को उनकी इच्छा के अनुसार काम करना पड़ता है, वे भी इस बात का ख्याल रखते है कि किसी ड्राइवर को नुक्सान ना हो। नवाँग को फोन करने पर उन्होंने कहा कि वे किसी और पार्टी के साथ हैं, तो हमने फिर यूनिन के दफ्तर में फोन किया। थोड़ी देर में दोरजी नामक ड्राइवर हाजिर था। बात करने से मालूम पड़ा कि ये दोर जी सेना में काम करते हैं, घर की टैक्सी है, तो छुट्टियों में टैक्सी चलाते हैं। दोरजी पढ़े लिखे युवक थे। आज हमने लेह के पास के गोम्फाओं को देखने का ही मन बनाया था। जैसे हेमिस और शै गोम्फा। हैमिस गोम्फा का लद्दाख का सबसे बड़ा और शक्तिशाली गोम्फा माना जाता है। कहा जाता है कि प्रादेशिक राजनीति में इस गोम्फा के लामाओं की काफी भूमिका रहती है। यह पत्थरों और ईंटों से बना विशालकाय गोम्फा है। भवन के खम्बों और छतों मे लकड़ी की शहतीरों का भी काफी प्रयोग किया गया है। चटख रंगो के प्रयोग के कारण भवन , दीवारें , खम्बे आदि सभी बडे खूबसूरत लगते हैं। आर्थिक दृष्टि से भी इस गोम्फा को मजबूत माना जाता है। मन्दिर के बाहर बहुत बड़ा आँगन जैसा अहाता है। जब हम पहुँचे तो हमने देखा कि बरामदों में कुछ वृद्ध लामा वाद्य यन्त्र, जैसे कि विशाल नगाड़े, बड़ीं सी तुरही और थाली जैसे बड़े मंजीरे ताल लय में बजा रहे थे। कुछ बड़ी उम्र के लामा युवा लामाओं को ताल पर नृत्य करना सिखा रहे थे। वे लोग हैमिस उत्सव की तैयारी कर रहे थे जिसमें मुखौटे पहन कर लामा लोग नृत्य प्रस्तुत करते हैं। एक कोने पर कुछ स्त्रियाँ सफेदा की लकड़ी से शहतीर बना रही थीं। ये शहतीर छत बनाने के काम आते हैं। हैमिस गोम्फा भीतर से भी काफी सुन्दर है। इसमें असख्य खूबसूरत बौद्ध प्रतिमाएँ हैं, कई तरह के तंके हैं। एक तंकें में जन्म मृत्यु के बीच पूरे संसार को एक चक्र में दिखाया गया है। एक चित्र बहुत विचित्र लगा जिसमें एक देव के अंक में एक अप्सरा सी सुन्दरी लेटी है, जिसके हाथ में कोई पात्र है, यह चित्र बौद्ध परंपरा की दृष्टि से समझ में नहीं आया, क्यों कि आमतौर से बौद्ध विहारों में मन्दिरो के समान शृगार रस वाले चित्र नहीं होते हैं। एक मूर्ति का चेहरा बड़ा भयानक था, आँखे मानो उबली पड़ी थी। संभवतः वह काल का चित्र हो। बुद्ध की सौम्य मूर्ति के स्थान पर रौद्र भंगिमा कुछ विचित्र जरूर लगी। भावनाएँ, भंगिमाएँ मानव जीवन से जुड़ी होती है , वे किसी एक भाव से जुड़ी नहीं होतीं। अतः कोई भी दर्शन या धर्म मात्र एक भाव को जीवन का आधार नहीं बना सकता है। हैमिस के बाद हम शै गोम्फा गए, यह भी एक पहाड़ी पर बना है। हम लोग जब काफी ऊपर चढ़ गए तब किसी ने बतलाया कि गोम्फा बन्द है, क्यों कि भोजन का समय है। हम लोग भी भूखे थे, अतः गोम्फा खुलना का इंतजार किए बिना लौट आए। हम लौटने लगे तो सिन्धु नदी दिखाई दी, मन नहीं माना, लगा कि एक बार फिर पैर डुबो ले उस पावन जल में। तट पर गए तो पाया कि नदी में पहले की अपेक्षा पानी काफी ज्यादा था। संभवतः गर्मी से बरफ जल्दी पिघल रही थी, जिससे नदी का जल स्तर बढ़ता जा रहा था। आज नदी के पत्थर दिखाई तक नहीं दे रहे थे। दोरजी से मैंने कहा कि मैं लद्दाखी घर अन्दर से देखना चाहती हूँ। दोरजी ने कहा कि मैं आपको अपने घर ले चलता हूँ। हमने बिना झिझक उसकी बात मान ली। दोरजी का घर लेह के बीच में ही था। गलियों से होते हुए हम दोर जी के घर पहुँचे, एक खूबसूरत सा बगीचा, फिर सीढ़ियाँ चर कर घर। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि लद्दाख वैसे ही ऊँचाई पर है तो लोग मन्दिर और घर आदि भी ऊँचाई पर क्यों बनाते हैं। शायद जब बर्फ गिरती होगी, उन दिनों ऊचाई उन्हें थोड़ी बचाती होगी। हमे घर के भीतर ले जाया गया। लद्दाखी घरों में घर का प्रमुख भाग रसोई होती है, जो संभवतः दुनिया की बेतरहीन रसोई होती है। रसोई में दो या तीन और कालीन की पट्टियाँ बिछी होती है, जिस पर कम ऊँचाई वाली खूबसूरत नक्काशी दार मेजे लगी होती हैं। इन पर अधिकतर ड्रेगब बने होते हैं। ये ज्यादातर लाल और काले रंग की होती हैं। मेहमान का स्वागत मक्खन दार काली नमकीन चाय और मोमोस से किया जाता है। जब हम दोरजी के घर पहुँचे तो उबके घर कुच मेहमान आए हुए थे, शायद दूर के रिश्तेदार। सबका चेहरा खिला खिला था़ सभी ने हमे देख कर जोर से जुले कहा। उनके सामने बिना डन्डी वाले चाय के प्याले रखे हुए थे। किरण ने हमे बतलाया था कि यदि आप को कोई चाय इन खास प्यालों में परोसे तो बहुत धीरे पीजिए, और पूरी खत्म मत करिए। प्याले को पूरा खाली करना अच्छा नहीं माना जाता है। हम लोग भी एक टेबुल पर बैठ गए। दौर जी की बहन , पत्नी और माँ काम मे लगी थीं, रसोई के बीचोबीच खूबसूरत सा ओवन था, जिसपर भी नक्काशी थी। अल्मारी में तरह तरह के बर्तन इतनी खूबसूरती से जमाए गए थे कि लगता था कि घर ना हो शो रूम हो। हमारा परिचय दोर जी के पिता जी से करवाया गया। वे भी कभी आर्मी में थे, आजकल परम्परागत टेबुलों पर खुदाई का काम करते हैं। दोरजी भतीजी दिल्ली मे मेडिकल की पढ़ाई कर रही है, वह भी वहाँ मौजूद दी। उसकी खूबसूरती देखते ही बनती थी। थोड़ी देर में हमारे सामने घर के बने बिस्कुट रख दिए गए और प्याले में चाय दी जाने लगी। मेहमानों के साथ दो नन्हें बच्चे थे, और सभी लोग उनसे खेलने में व्यस्त थे। हम लोग धीरे धीरे चाय पीते रहे़ थोड़ी देर में हमारे सामने गरमागरम मोमोस आ गए। चलने से पहले हमें छाँग भी पीने का मौका मिल गया। जितनी देर हम बैठे रहे, लोगो को हँसते मुस्कुराते देखते रहे। सबसे विदा लेकर चले तो मन बड़ा खुश था। थोड़ी देर बाजार से कुछ सामान खरीदने के बाद हम लोग डेरे पर लौट आए। दूसरे दिन हमे नुब्रा वैली जाना था, जिसके लिए हमे विशेष परमिट की जरूरत थी। नुब्रा वेलि में कम से कम एक रात तो बितानी होती है। क्यों कि दूरिया इतनी है कि बिना रुके काम नहीं चल सकता। संजीव रोल्वा ने हमे बताया कि वे परमिट के लिए अपना कोई आदमी जरूर भेज देंगे, लेकिन मिलते मिलते देर हो सकती है। और ऐसा ही हुआ। दूसरे दिन हमे करीब १२ के परमिट मिल पाया। हमे डर था कि दोर जी किसी और सवारी को लेकर चला जाएगा और हमें फिर नए ड्राइवर से बात करनी पड़ेगी। 29.6.2006 नुब्रा वेलि के लिए हम लोग जरा देर से ही निकल पाए, इसलिए दोरजी को चिन्ता थी कि यदि हम खरदुंगा ला २ बजे तक नहीं पहुँचे तो हमे वापिस लौटा दिया जाएगा। सुरक्षा को ध्यान में रख कर सेना ने यह नियम बना दिया है कि यह ला दोपहर तक पार कर लिया जाना चाहिए। इसलिए खरदुँगा ला कम लोग चुपचाप बैठे रहे। दौर जी तेजी से गाड़ी खिंचे जा रहा था। और हम लोग पहाड़ों के नाजरों को परख रहे थे। नुब्रा वेलि लद्दाख ला सबसे खूबसूरत हिस्सा माना जाता है, क्यों कि यहाँ हरियाली अपेक्षाकृत ज्यादा है। साथ ही बरंफीले पहाड़ भी खूब नजर आते हैं। रास्ते भर हमें दूर से बर्फीली चोटियों वाली पर्वत शृ्खला दिखाई देती रही। खरदुंगा ला से पहले एक प्राकृतिक दरवाजा सा दिखाई देता है जिसे देख ऐसा लगता है मानों किसी ने पहाड़ को काट कर दरवाजा बनाया हो। जब हम खरदुंगा ला पहुँचे तो करीब 2 बज गए थे, किन्तु आगे जाने का परमिट मिल गया। हम ने चैन से खरदुंगा पर फोटों खींची, काफी पी , और आर्मी की दूकान से कुछ स्मृति चिन्ह भी खरीदे। लद्दाख में खास जगहों पर , जहाँ पर आर्मी के कैम्प हैं, इस तरह के स्मृति चिन्ह मिलते हैं, जिन पर स्थान विशेष का नाम खुदा होता है। खरदुंगा ला 18380 फीट की ऊँचाई पर स्थित है और सेना सुरक्षा की दृष्टि से इसका अपना महत्व है। शाम तक हम लोग दिस्तिक पहुँच गए थे। दिस्तिक बाकी लद्दाख से काफी अलग काफी हरा भरा स्थान है। जब पहाड़ और हरियाली मिल जाती है तो बेहद खूबसूरत हो जाती है। केरल में में जितनी हरियाली है, उतनी शायद ही किसी अन्य प्रान्त में होगी, किन्तु मुझे लगता है कि स्थान- स्थान की हरियाली में अन्तर होता है। रंगो की भी अपनी भाषा होती है। केरल में में जब अधिक बरसात होती है तो ऐसा लगता है कि बादल नारियल के दरख्तों के सिरे पर आकर उलझ गए हों, तब जमीन से आसमान तक एक अजीब सा साँवलापन छा जाता है। ऐसे में अन्तस विषाद रंग को धारण कर लेता है। मैं अक्सर सोचा करती हूँ कि यदि केरल में हरियाली के रंग पीले और लाल फूलों के छींटों से युक्त हो तो यह साँवलापन शायद कुच कम हो सके। जब मैं छत्तीस गढ़ गई थी तब बस्तर के जंगलों में पलाश खिल रहे थे, दरख्त लाल पत्तों से दहक रहे थे, उस वक्त मुझे छत्तीसगढ़ के जमीन के रंगों में रंगे दरख्त बेहद खूबसूरत लगे। यहाँ पर हरियाली पहाड़ों की जड़ पर खड़ी थी, इसलिए भूसर रंग को चटकीला बना रही थी। दिक्सित में हम " ओल्थांग " गेस्ट हाउस में ठहरे। यह पहाड़ी अँचल में एक खूबसूरत साफ सुथरी इमारत थी। एक स्मार्ट नेपाली लड़का बड़ी चतुराई से बात कर रहा था। हम लोग उस गेस्ट हाउस की खुबसूरत बगीचे का आनन्द लेने लगे। इसी बीच दोर जी अपनी बहन के साथ नमकीन चाय लेकर आ गया। डोरजी की बहन दिक्सित के सरकारी अस्पताल में नर्स थी। वह भी हमारे साथ लेह चलना चाहती थी, जिससे अपने बच्चों से मिल सके। लद्दाख में एक जगह से दूसरी जगह जाना इतना आसान जो नहीं है। दूसरे दिन सुबह सवेरे हम आसपास की खूबसूरती और फिजा की ठंडक का आनन्द लेते रहे, ७ बजे तक दौर जी बहन के साथ हाजिर थे। हम होटल से खाना पैक करवा कर आगे की यात्रा को चल दिए। सबसे पहले हम हुन्दर गए। यहाँ पर एक गोम्फा है, जो अभी काफी जीर्णशीळ हालत में है, किन्तु कला की दृष्टि से अपूर्व है। गोम्फा कितना भी छोटा हो मूर्तियों की भव्यता देखने योग्य होती है। यह गोम्फा अधिकतर लकड़ी का बना था, वहीं जमीन से ऊपर उठा हुआ सा। इसे खोलने के लिए भी हमें लामा को खोजना पड़ा। यहाँ बुद्ध की बड़ी खूबसूरत प्रतिमा के दर्शन हुए। मैंने एक बात देखी है कि हर गोम्फा में बुद्ध और अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएँ हैं , किन्तु सभी प्रतिमाएँ अपना अलग अर्थ और अस्तित्व रखती हैं, यहाँ लामा ने हम लोगों का चाय का प्रस्ताव भी रखा। लेकिन हमे आगे जाना था। हम लोग दिस्तिक कस्बे के बाजार से होकर हुन्दर के उस भाग की ओर गए जहाँ पर दो कूबड़ वाले ऊँट प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि जब सिकंदर आक्रमण के बाद लौट रहा था तो उसके कुछ सिपाही और ऊँट पीछे छूट गए। वे ऊँट ही सँख्या में बढ़ते- बढ़ते इतने हो गए कि आज इन ऊँटों की सवारी हुन्दर का एक बड़ा आकर्षण मानी जाती है। ऊँट जितना सुन्दर दिखता है, उसकी सवारी उतनी ही कठिन होती है। वह घोड़े की तरह स्थिर नहीं चलता, उसकी पूरी देह ऐसे हिचकोले खाती है मानो हम समुद्र पर जहाजी सफर कर रहे है , जब वह उठता या बैठता है तो लगता है कि मानों हम किसी विशालकाय लहर के ऊपर से गुजर गए हों। 15 मिनिट की सवारी के उन्होंने 100 रुपये लिए , हमे मजा तो आया किन्तु पन्द्रह मिनिट भी काफी भारी लगे। जब तब लगता कि गिर जाएँगे। आखिरकार सिकन्दर की सेना के वंशज ऊँट थे, इतने आसान कैसे होते?ऊँट की सवारी के बाद हम लोग फिर दिस्तिक गए, यहाँ पर हमे गोम्फा में जाना था। यह पहाड़ी पर बना हुआ था, जिसपर चढ़कर गोम्फा तक पहुँचना हमारे लिए इतना आसान नहीं था। काफी चढ़ाई के बाद जब हम गोम्फा पहुँचे तो पता चला कि गोम्फा का हर भवन के लिए अलग अलग सीढ़ियाँ बनी हैं। प्रमुख मन्दिर काली के समकक्ष देवी का है, जिसमें रौद्र मुद्रा में मूर्ति थी। एक अन्य कक्ष में तो अनेक मूर्तियों को ढ़क रखा था, बताया गया कि वे मूर्तियाँ रौद्र ञंगिमा की हैं जिसे साधारण आदमी देख भी नहीं सकता, केवल मन्दिर उत्सव के वक्त उनका लेहरा खोल दिया जाता है। यह गोम्फा करीब 350 वर्ष पुराना है, और यहाँ अभी भी काम चल रहा है। गोम्फा देखने में तो उतना वक्त नहीं लगता जितना कि ऊपर चढ़ने में लगता है। यहाँ उतरने चढ़ने में प्रदीप की तबियत काफी खराब हो गई थी, शायद ऊँट की सवारी का भी असर रहा होगा। रास्ते में कई गोम्फा थे, जिसके बारे मे दोर जी ने कहा कि यदि हम चाहे तो देख सकते हैं। लेकिन हम अब सीढ़ियाँ चढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। इसके बाद हम गर्म पानी के झरने के पास गए, यहाँ पर नहाने के कक्ष बने हुए हैं, जहाँ पाइप से गरम पानी का आनन्द उठाया जा सकता है। हम लोग थके जरूर थे, किन्तु नहाने का आनन्द जरूर लिया, मै कुछ ऊपर तक गई, जहाँ पर प्रपात का पानी इकट्ठा होता था । मैंने देखा कि यहाँ की जमीन और पत्थर लाल , पीले कई रंगों के हो गए थे। शायद इस गरम धारा वाले जल में कई खनिज पदार्थ आते होंगे, जिसका प्रभाव मिट्टी और पत्थर पर भी पड़ा। मैंने यादगार की तौर पर कुछ पत्थर उठा किए। लौटते वक्त एक दो महत्वपूर्ण गोम्फा रास्ते में पड़े, किन्तु प्रदीप को उल्टियाँ शुरु हो गई तो हमने लौटने का सोचा, लौटने के रास्ते पर बर्फ बिल्कुल सामने थी। कई पहाड़ों पर तो सड़क तक बिछी थी, मानो कि दूब हो, बरढ भी तरह तरह की होती है, जब यह पहाड़ से चूती है तो कभी कभी काँच के खिलौने की तरह आकृति बना लेती है। कभी पर बिल्कुल कच्ची, जैसे कि चुस्की बनाने के लिए कस दी गई हो, कभी ऐसी लगती है कि केक पर आइसिंग चढ़ी हो। दूर से देखने पर कुछ पहाड़ बर्फ से पूरी तरह ढ़के नजर आए तो कुछ पर बरफ इस तरह फैली हुई थी जैसे कि चाकलेट के केक पर आइसिंग। हम श्योक की तरफ से लौट रहे थे, इसलिए हमें बर्फ के विभिन्न रूप देखने को मिल रहे, हर क्षण पहाड़ चेहरा बदल रहे थे, फिजा काफी ठंडी थी। लग ही नहीं रहा था कि हम लेह की गर्मी झेल कर आएँ है। रास्ते में श्योक नदी मिली, जो दोनों घाटियों के बीच बहती है। कहते हैं कि सर्दियों में यह जम जाती है और लोग पैदल चल कर पार कर लेते है। यहीं पर हमे याक और कई घुमक्कड़ जाति के लोग भी मिले, उनके सफेद तन्तुओं और उनकी जिन्दगी झाँकना संभव तो नहीं हो सका, लेकिन मैंने उनके घुमक्कड़पन को, और अल्पता में सुख प्राप्ति वाले स्वभाव को मन ही मन प्रणाम किया। क्या हम किसी भी सुविधा को छोड़ सकते हैं? नहीं, मानो हमने अपनी आदमीयत के उपर मशीनी आवरण पहन लिया हो। वापिस खरदुंगा वेलि में पहुँचे तो शाम हो गई थी, अचानक मौसम काफी बदल गया था। जरा सा बरसाती झौंका आया और बर्फ टपाटप गिरने लगी। मैंने खरदुंगा की चोटी पर बने गोम्फा पर चढ़ने की भी कोशिश की, लेकिन बर्फ पर पाँव फिसलने लगे, अन्ततः दोरजी की सहायता से मैं ऊपर चढ़ पाई, मैंने देखा कि वहाँ कंकड़ के कई ढ़ेर से हैं, मेरे पूछने पर दोरजी ने बतलाया कि लोग मान्यता पूरी करने के लिए इस तरह की ढेरियाँ बनाते हैं। जितना चढ़ना मुश्किल नहीं था, उतना उतरना मुश्किल हो गया। खरदुंगा पार करते करते मन में आश्वासन था कि चलो सभी रंग देख लिए लद्दाख के, गर्मी , हरियाली , बर्फ और सूखापन..., बिल्कुम लामा नृत्य की तरह , प्रकृति मुखौटे बदलती है, तरह- तरह की भाव भंगिमा दिखाती है। आदमी उसका आनन्द कम लेता है, शिकायत ज्यादा करता है। लदाद्ख से इतना तो सीखा जा सकता है कि आनन्द हमारे बिल्कुल करीब है, यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसको कैसे अपना बनाते हैं। आज की यात्रा लेह की अन्तिम बड़ी यात्रा थी, परसों हमे जम्मू जाना था, जहाँ नेट पत्रिका कृत्या का वार्धिक मनाया जाना था। अगले दिन एक जुलाई थी, और कृत्या को अपलोड करने का दिन, पूरे 13 महिनों में एक बार भी कृत्या को अपलोड करने में देरी नहीं हुई। कृत्या के अंग्रेजी और हिन्दी दोनो खण्डों को मैंने केरल में ही अपलोड कर दिया था। केवल इँडेक्स पेज लोड करना था, जिससे से नया अंक लोगो के लिए खुल जाए। हम लोग लेह के बाजार में इंटर नेट की दूकाने देखने लगे। एक दूकान में घुस कर हमने बताया कि हम अपने लेपटाप से कनेक्शन चाहते हैं। उन्होंने इसका इंतजाम कर दिया, मैंने पहले करेक्शन किए लिंक्स को चढ़ाना शुरु किया। यहाँ नेट बेहद धीमा था, किन्तु काम हो रहा था। लेकिन इंडेक्स पेज चढ़ा ही नहीं। अजीब सी समस्या, एफ टी पी फाइल दिखा रही थी कि पेज लोद हुआ है पर नेट पर पुराना लिंक ही आ रहा था। शायद उनके नेट सिस्टम मे खराबी थी। कमे काफी वक्त लग गया और काम नहीं हुआ। धमाका तो जब हुआ जब हमने पैमेन्ट की बात की, पता चला कि लद्दाख में एक मिनिट के लिए नेट का उपयोग करने के २ रुपये लगते हैं। दीमाग भन्ना गया... लूट की भी हद होती है। दूकानदार चण्डीगर का था, किन्तु रोना यही कि ..साहब साल में दो महिने का बिजिनेस ही तो होता है, नहीं कमाए तो क्या करे। यह बात किसी लद्दाखी के मुँह से सुनती तो बुरा नहीं लगता,लेकिन यहाँ मन जरूर खट्टा हो गया। सोचा कि खाना खा आते हैं, फिर कोशिश करेंगे़ खाना खाने एक होटल में घुसे, होटल ढाबे की शक्ल का था, कोई श्रीनगर का आदमी चला रहे था। यहाँ चीजों के दाम हद से ज्यादा थे, एक पराँठे की कीमत 20 रुपये। कृत्या लोड ना हो पाने के कारण मन तो परेशान था ही यहाँ पर यह धाँधली देख मन झुँझला उठा और मेरी होटल वाले से बहस हो गई। मेरा कहना यही था कि यदि इस होटल का रखरखाव पाँच सितारा होटल जैसा होता तो मैं बेशक इतना पैसा देने को तैयार हो जाती, किन्तु इस तरह ट्यूरिस्ट को लूटना व्यापार नहीं कहा जा सकता। खेर हमने किसी तरह खाना खाया और बाहर आए। इस बार हमने फिर से कृत्या के इन्डेक्स पेज लोड करने की कोशिश की, किनतु सफलता नहीं मिली। अब तक हमने 350 रुपयेखर्च कर दिए थे, किन्तु कृत्या लोड नहीं हुई। मैंने परेशान होकर तिरुवनन्तपुरम में बैजू को फोन किया, बैजू ने मुझे कृत्या लोड करना सिखाया था। और समस्या बताते हुए गुजारिश कि वे केरल से इडेक्स पेज चढ़ा दे। हमने मेल में सारी सूचनाएँ भी दे दी थीं। अब हम पैदल ही लेह के बाजार में चक्कर लगाते हुए लौटने की तैयारी करने लगे। देखा तो लेह का प्रमुख बाजार में हर चीज बेहद महंगी थी, लेकिन गलियों में घुस कर जो बाजार आए, वहाँ चीजे अपेक्षाकृत सस्ती थी। पिछले दिनों में हमने किरण के साथ कुछ शापिंग कर ली थी। इसलिए ज्यादा कुछ नहीं खरीदना था। शाम को लौटी तो मन उदास था, यदि कृत्या लोड नहीं हुई तो जम्मू में क्या दिखाया जाएगा?क्या सारी मेहनत बेकार चली जाएगी? .. इतने अच्छे दिन बीते हैं, क्या हम कड़वाहट को लेकर घर लोटेंगे, हे बुद्ध, मैने तो तुम्हे प्रणाम किया है, हमेशा ही, फिर ऐसा क्यों?शाम को हमने फिर बैजू को फोन किया तो उन्होंने कहा कि अभी तक उनके पास कोई मेल ही नहीं आया है। हमने फोन पर ही पासवर्ड आदि बताया, करीब 20 मिनिट बाद फोन किया तो बैजू ने कहा कि इंडेक्स पेज चढ़ गया है। समस्या तो उन्हें भी समझ में नहीं आई, उन्होंने बस एफ. टी पी फाइल से लोड कर रिलोड कर दिया, और काम हो गया। हमने चैन की सांस ली और जम्मू में अग्निशेखर को फोन किया। अगले दिन जब हम एयरपोर्ट पहुँचे तो एक दो कर्मचारी स्त्रियों ने पास आकर कहा...जुले..एक ने पूछा, मैडम , हमारा लद्दाख कैहा लगा, मैंने जवाब दिया बिल्कुल आपकी मुस्कान जैसा..और हम सब हँस दिए हवाई जहाज में बैठ कर मैंने कहाः--<br /> जुले लद्दाख,<br />देखो मैंने तुम्हारे पत्थर लिए हैं, वापिस जरूर बुलाना<br />घाटियाँ बोली जुले,<br />आसमान बोला जुले,<br />हवाई जहाज के पंख उड़ते- उड़ते<br />जुले…. जुले कहते गए<br />जुले- जुले -<br />जुल लद्दाख!Rati Saxenahttp://www.blogger.com/profile/10244023283094472640noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11462467.post-1154778863397433222006-08-05T15:49:00.000+04:002006-08-05T15:54:23.403+04:00लद्दाख ---चार25.6.2006 आज यात्रा काफी जल्दी शुरू हो गई क्यों कि हमे सुदूर पर्वतों में बसी पैंगाग स्तो यानी की झील देखने जाना था। करीब छह बजे हमे डेरे से निकलना था। आज की यात्रा में किरण औरसंजीव के साथ उनका चार साल का गोलमटोल बेता गोलू भी था। गोलू पर्वतीय माता पिता का बेटा है तो चेहरे पर पर्वतीय भोलापन तो स्वाभाविक है, उसकी आवाज बड़ी मधुर थी, वह बोलता है तो ऐसा लगता है मानों उसकी आवाज बाहर निकलने की जगह भीतर की ओर जा रही है। चहचह करती सी मधुर आवाज से वह दिल खींच लेता है। किरण की उम्र मेरी बड़ी बेटी जितनी ही होगी, लेकिन वह बहुत संभल कर धीरे- धीरे बाते किया करती है,उम्र का अदब बनाए हुए एक अच्छी दोस्त की तरह। यह विशेषता काफी कम लोगों में होती है। संजीव रोल्वा स्मार्ट और अदबदार सेना के आफीसर हैं। इसलिए उन लोगों के साथ यात्रा करना हम लोगों के लिए बड़ा सुखकारी हुआ। रात के आराम के बाद सुबह मैं तरोताजा थी । हम लोग काफी सवेरे ही घर से निकल गए, सुबह के समय शहर खूबसूरत लगता है, अधनींदा सा, आँखे मल कर उठता सा...लेकिन लेह की तो बात ही अलग, सूरज जरूर में चढ़ आया था, लेकिन शहर के चेहरे पर अभी आलस्य का अछूतापन बाकी था। नवाँग बेहद तेज गाड़ी चलाते थे, कुछ ही हम सड़क के उस छोर पर थे जहाँ से लेह शहर दिखाई दे रहा था। उपर से लेह एक बड़े से गाँव की तरह ही दिखाई दे रहा था, दूर- दूर मकान, सामान्य साज सज्जा किन्तु एक अछूता सा सौन्दर्य... इसी बीच किरण ने बताया कि उसकी मौसी और चाचा का घर लेह में ही है, और वे ईसाई हैं। मुझे जरा आश्चर्य हुआ, मैंने पूछा कि मैं यही सोचती थी कि तुम कुल्लू मनाली की हो। उसने जवाब दिया –" हाँ अभी तो हम वहीं के हैं, दरअसल मेरे पूर्वज लेह छोड़कर कुल्लू मनाली चले आए थे, उन्होंने तो अपना धर्म नहीं बदला , लेकिन जो लोग लद्दाख मे रह गए, उन्होंने जरूर अपना धर्म बदल लिया।" मैंने उससे विस्तार में कुछ नहीं पूछा, पर सोचा कि हो सकता है कि विस्थापन का कारण लद्दाख के दुर्दिन हों, जो लोग अपनी अस्मिता को बचा ले जाना चाहते थे, वे अपेक्षाकृत नीचे प्रदेश में चले गए और जो जमीन को छोड़ना नहीं चाहते होंगे उन्हे अपनी पहचान बदलनी पड़ी। अब मुझे समझ में आया कि किरण क्यों इतनी सौम्य है। संजीव ने बताया कि यह देखिए नीचे, यह एक गाँव की शुरुआत है, यह मीलो मीलो तक चलता चला जाता है, यह एशिया का सबसे बड़ा गाँव माना जाता है। मैंने नीचे झाँक कर देखा, निसन्देह एक खूबसूरत गाँव था, इस तरह के दृष्य मैंने मात्र पुस्तकों में देखे थे। यहाँ गाँवों में मकान एक दूसरे से सटे नहीं होते है, एक मकान और उसके आसपास सीढ़ियों के आकार में कटे कई खेत , कहीं पर कुछ गाय , गधा आदि कुछ जानवर भी । करीब करीब सभी मकानो के छत की ऊपरी डोली पर घास के पूले और गोबर के छाने सटे हुए इस तरहसे रखे हुए थे कि लग रहा था कि यह सजावट का कोई तरीका है। संभवतः यह ईंधन जमा करने का प्राकृतिक तरीका होगा, घास के पूलों के कारण गर्मियों में छत अधिक गरम नहीं होगी और घास सूख भी पाएगी। इन पहाड़ी प्रदेशों में लोगों को सर्दियों के दिनों के लिए भोजन बचा कर रखना पड़ता है, क्यों कि तब लद्दाख मे केवल एक रंग नजर आता है, वह है सफेद। संजीव रोल्वा बता रहे थे कि इस वक्त जो पहाड़ हमे सिर से ऊपर दिख रहें वे सब कुछ देर बाद निगाह के नीचे आ जाएँगे। हम गोल गोल चक्कर दार सड़कों से गुजरते ऊपर चढ़ने लगे। क्यों कि कार मे ज्यादा लोग थे, इसलिए समय बड़ी आसानी से गुजर रहा था। संजीव उन दिनों को याद कर रहे थे जब उनकी पोस्टिंग लद्दाख के बार्डर एरिया में हुई थी। कुछ देर में हमें बर्फीली चोटिया दिखाई देने लगीं और पहाड़ों की चोटियाँ हमारी आँखों के सीमा स्तर तक आ गईं। अब हम चाँगला के करीब पहुँच गए थे़ हवा में खुनक बढ़ गई थी, मरुस्थल में जन्में मेरे जैसे के लिए बर्फ एक कल्पना होती है, बर्फ को इतना करीब देख कर मजा आ रहा था। यहाँ पर बौद्ध गोम्फा के साथ साथ एक शिव मन्दिर भी था। सेना के जवानों की इस मन्दिर पर बड़ी आस्था है। संजीव ने कहा कि मैडम धीरे धीरे जाइये, क्यों कि इस ऊँचाई पर सीढ़ी चढ़ने से साँस फूल जाती है। उन्होंने सेना के जवान का वाकया सुनाया कि कैसे वह दौड़ कर सीढ़ी चढ़ गया और आखिरी सीढ़ी पर पहुँचते ही ढेर हो गया। यह बात मैं भी महसूस कर रही थी कि लद्दाख में सीढ़ी चढ़ना काफी मुश्किल लगता है, कुछ सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद ही साँस फूलने लगती है। मन्दिर में दर्शन करने के बाद हम पहाड़ पर बिछी बर्फ पर चढ़ने की कोशिश करने लगे, डर भी लग रहा था कि कहीं पैर ना फिसल जाए। गोलू पहाड़ी मेमने की तरह खटखट करके चढ़ गया । लेकिन जब उसने मम्मी को बर्फ पर चढ़ते देखा तो मम्मी की चिन्ता में लग गया,.. मम्मी .. संभल कर आना, वह जोर से चिल्लाया और किरण की तरफ भागा चला आया, रास्ते में जरा सा हिस्सा था जहाँ बर्फ टूट गई थी, गोलू का पाँव फिसला और गोलू धड़ाम...अब तो गोलू जी का रोना काफी लम्बा खिंच गया, क्यों कि नाखून के पास जरा सा खून भी झलक आया था। चंगला ला समुद्र से 17800 फीट की ऊँचाई पर है। यहाँ पर सेना के जवान तैनात रहते है जो हर आने वाले को चाय पेश करते हैं। पास ही सौगात के सामान की दूकान भी थी। सेना का यह रूप देखकर अच्छा लगा। चारों तरफ बरफ बिछी थी, मन बारबार बर्फ की ओर लपकता रहा। संजीव और ड्राइवर दोनों ने बतलाया कि अभी आगे बहुत अच्छी बरफ आने वाली है, वही लुत्फ उठाइए। वास्तब में थोड़ी देर में ऐसी जगह आई जहाँ पर बर्फ इस तरह से जमी थी कि बैठने की खोह सी बन गई, बर्फ के पास जाने पर ठण्ड का अहसास नहीं होता है। हम लोग बारी- बारी से बर्फ की खोह में बैठकर फोटो खिंचवाने लगे। गोलू जी बर्फ को देख कर अपनी चोट को भुला बैठे। थोड़ी दूर पर रास्ते में पहाड़ी जानवर जैसे कि भेड़ें , गधे, घोड़े आदि चरते दिखाई दिए। पहाड़ों में शहरों से अलग कुछ घुमक्कड़ जातियाँ भी रहती हैं जिन्हें दुनिया से कोई मतलब ही नहीं होता। हमे रास्ते में एक दो जगह दो चार टेन्ट वाले समुदाय दिखाई पड़े, पता चला कि ये वे घुमक्कड़ लद्दाखी है जो हर मौसम चलते रहते हैं। भेड़ की ऊन के बने लम्बे चोगे , सिर पर स्कार्फ जैसा वस्त्र और घुटने तक जूते, बस इतने से उनकी हर मौसम में रक्षा हो जाती है। कभी कभार वे लद्दाखी मैदान में उतरते हैं और पहाड़ी जड़ी बूटिया या कुछ पत्थर आदि बेच कर मतलब का सामान ले आते हैं। उनका संसार बस पहाड़ का उताव चढ़ाव होता है, जिन्दगी के उताव चढ़ाव से वे बिल्कुल भी वाकिफ नहीं होते हैं। एक अजीब सी शान्ति में जीते हैं ये लोग, किन्नरों की तरह अपने आप में जीते हुए। न बेजान चीजों का जमघट , ना ही उनसे उत्पन्न बोरियत, बस शान्ति ही उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य। थोड़ी देर में हम तंगत्से में संजीव रोल्वा के केम्प में पहुँच गए जहाँ हम लोगो के लिए नाश्ते का इंतजाम था। हम लोग फाइबर ग्लास हट में जा बैठे, संजीव जी के पलटन के जवानों ने गरमागरम आलू के पराँठों का इंतजाम कर रखा था। बिस्कुट आदि तो साथ थे ही। हम लोगों ने जम कर नाश्ता किया और आगे चल दिए। अब हम उन पहाड़ों से ऊपर थे जिनपर चल कर आए थे। कुछ दूर बार संजीव ने कहा मैडम आप आँखे बन्द कर लीजिए और तभी खोलिए जब मैं कहूँ। हमने बिना किसी प्रतिवाद के आँखे मून्द ली। जब आँखे खोली तो एक नीलम के नगीने को पहाड़ों के बीच जड़ा पाया। जी हाँ हम लोग पेंगांग त्सो पहुँच गए थे। और पहाड़ों के बीच एक नीली कच्च झील अठखेलियाँ कर रही थी। इतना नीला रंग? शायद हम फोटो में देखते तो यही सोचते कि फोटो का कमाल है। संजीव ने कहा : मैंने इसीलिए तो आप लोगों से आँख बन्द करने को कहा जिससे आप पूरी झील को एक साथ देखें, तभी इसे भीतर तक महसूस कर पाएँगी। संजीव स्वयं चित्रकार हैं इसलिए रंग के प्रति इतने अनुभूति रखते हैं। पैंगाग झील का चालीस प्रतिशत भाग भारत में है और 60 प्रतिशत चीन अधिकृत तिब्बत में है। यह एकदम खारी है और बहुत ही गहरी है। सामरिक महत्व के कारण इस पर नौका यात्रा करना मना है, किन्तु संजी